उग्राम असॉल्ट राइफ़ल — 500 मीटर रेंज, मेड इन इंडिया, पर क्या यह INSAS की विरासत तोड़ पाएगी?
DRDO की उग्राम (Ugram) 7.62×51 mm कैलिबर की स्वदेशी असॉल्ट राइफ़ल है जिसकी प्रभावी रेंज 500 मीटर तक है। यह भारतीय सेना की INSAS राइफ़ल को बदलने और आयातित हथियारों पर निर्भरता ख़त्म करने के लिए तैयार की गई है — पूर्णतः मेड इन इंडिया।
पाँच सौ मीटर। क़रीब पाँच फ़ुटबॉल मैदानों जितनी दूरी। उतनी दूर से एक गोली चलाएँ और दुश्मन के पास सोचने का वक़्त तक न बचे — यही वादा है उग्राम का, भारत की सबसे नई स्वदेशी असॉल्ट राइफ़ल का। News18 हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, DRDO ने इस हथियार को भारतीय सेना की अगली पीढ़ी की ज़रूरत के तौर पर पेश किया है। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि यह राइफ़ल कितने मीटर तक मारती है — असली सवाल यह है कि क्या यह उन दशकों पुरानी शिकायतों का जवाब बन पाएगी जो भारतीय जवान बर्फ़ीले ग्लेशियरों से लेकर रेगिस्तानी सीमाओं तक झेलते रहे हैं।
INSAS का ज़ख़्म और 7.62 mm की वापसी
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलिए। 1990 के दशक में भारतीय सेना ने 5.56×45 mm कैलिबर की INSAS राइफ़ल अपनाई थी। रक्षा मंत्रालय के अभिलेखों के अनुसार, INSAS ने दशकों तक सेवा दी — मगर कारगिल से लेकर काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस तक, जवानों ने बार-बार कम स्टॉपिंग पावर और ठंडे मौसम में जाम होने की शिकायत की। The Hindu की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़, सेना ने आख़िरकार SIG Sauer 716 G2 राइफ़लें आयात कीं — 7.62×51 mm NATO कैलिबर, बेहतर रेंज, मगर क़ीमत? लगभग ₹2.5 लाख प्रति यूनिट, और निर्भरता पूरी तरह विदेशी। यही वह जगह है जहाँ उग्राम का दांव शुरू होता है।
उग्राम — क्या है इसमें ख़ास?
DRDO की आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE), पुणे ने उग्राम को ज़मीन से डिज़ाइन किया है। रक्षा स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह 7.62×51 mm NATO कैलिबर की गैस-ऑपरेटेड राइफ़ल है जिसमें मॉड्यूलर डिज़ाइन है — मतलब अलग-अलग मिशन के हिसाब से बैरल, स्कोप और ग्रिप बदले जा सकते हैं। पिकाटिनी रेल सिस्टम से नाइट-विज़न, लेज़र पॉइंटर और ग्रेनेड लॉन्चर जोड़ने की सुविधा। वज़न को हल्का रखने पर ज़ोर। और सबसे अहम — 500 मीटर तक प्रभावी रेंज, जो INSAS की तुलना में काफ़ी बेहतर स्टॉपिंग पावर देती है।
संख्याओं की भाषा में बात करें तो: 7.62 mm की गोली 5.56 mm से क़रीब दोगुनी ऊर्जा (muzzle energy) रखती है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यही वह फ़र्क़ है जो ग्लेशियर पर भारी जैकेट पहने दुश्मन के ख़िलाफ़ तय करता है कि गोली रोक पाएगी या नहीं।
आत्मनिर्भर भारत का दावा — और ज़मीनी हक़ीक़त
सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता दी जा रही है। रक्षा मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, भारत ने रक्षा निर्यात में ₹21,000 करोड़ का नया रिकॉर्ड बनाया। उग्राम इसी रणनीति की अगली कड़ी है — अगर यह सफल होती है, तो SIG Sauer जैसी आयातित राइफ़लों पर ख़र्च होने वाले हज़ारों करोड़ बचाए जा सकते हैं।
लेकिन इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण कहता है कि जश्न मनाने से पहले दो कड़वी सच्चाइयाँ देखनी होंगी। पहली — भारत का इतिहास स्वदेशी हथियारों के 'प्रोटोटाइप से प्रोडक्शन' तक पहुँचने में देरी का रहा है। तेजस लड़ाकू विमान का विकास 1983 में शुरू हुआ, पहला ऑपरेशनल स्क्वाड्रन 2016 में बना। INSAS ख़ुद 1980 के दशक की परियोजना थी जो 1990 के दशक में पहुँची। दूसरी — फ़ील्ड ट्रायल्स अभी बाकी हैं। रेगिस्तान की रेत, सियाचिन की बर्फ़, पूर्वोत्तर की उमस — हर भूभाग का अपना इम्तिहान है। जब तक उग्राम इन सबसे गुज़रकर बड़े पैमाने पर इंडक्शन तक नहीं पहुँचती, 'गेम चेंजर' कहना जल्दबाज़ी होगी।
इनसाइड टॉक
रक्षा हलकों में चर्चा है कि उग्राम की टाइमिंग संयोग नहीं है। सीमा पर तनाव और 2025-26 के रक्षा बजट में स्वदेशी ख़रीद को प्राथमिकता देने के बीच, DRDO पर राजनीतिक दबाव है कि वह जल्द-से-जल्द एक 'शोकेस प्रोडक्ट' दिखाए। ट्रेड सर्कल्स में फुसफुसाहट यह भी है कि निजी भारतीय रक्षा कंपनियाँ — जैसे SSS Defence और कल्याणी ग्रुप — भी अपनी-अपनी असॉल्ट राइफ़ल पेश कर रही हैं, और DRDO की उग्राम को इनसे भी मुक़ाबला करना होगा। कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों का मानना है कि असली लड़ाई तकनीक की नहीं, बल्कि प्रोडक्शन स्केलिंग और क्वालिटी कंट्रोल की है — क्योंकि लाखों यूनिट बनाना और हर एक को एक समान गुणवत्ता में रखना, यही वह जगह है जहाँ पिछली स्वदेशी परियोजनाएँ लड़खड़ाई हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
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आगे की राह — नज़र किस पर रखें
अगले 12-18 महीने तय करेंगे कि उग्राम सचमुच सेना की स्टैंडर्ड राइफ़ल बनेगी या DRDO की एक और 'शोकेस' बनकर रह जाएगी। देखने लायक़ तीन बातें: पहला, फ़ील्ड ट्रायल्स के नतीजे — ख़ासकर एक्सट्रीम वेदर में परफ़ॉर्मेंस। दूसरा, प्रति यूनिट लागत — अगर यह SIG Sauer से काफ़ी सस्ती रहती है, तो बड़े ऑर्डर पक्के हैं। तीसरा, निजी सेक्टर की प्रतिस्पर्धी राइफ़लों से तुलनात्मक ट्रायल्स। भारतीय सैनिक दशकों से एक भरोसेमंद, शक्तिशाली और स्वदेशी हथियार की माँग करते रहे हैं। उग्राम उस माँग का सबसे ताज़ा जवाब है — लेकिन क्या यह वह जवाब है जो टिकेगा, यह अभी तय नहीं।
जो सैनिक सियाचिन में -60°C पर ड्यूटी करता है, उसे पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन नहीं चाहिए — उसे एक ऐसी राइफ़ल चाहिए जो उसकी उँगलियाँ सुन्न होने पर भी चले। उग्राम का इम्तिहान वहीं है।
आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं; न्यायालय के फ़ैसले तक ये अप्रमाणित हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- उग्राम DRDO द्वारा विकसित 7.62×51 mm कैलिबर की स्वदेशी असॉल्ट राइफ़ल है जिसकी प्रभावी रेंज 500 मीटर है — INSAS और आयातित राइफ़लों का विकल्प।
- भारत ने 2024-25 में ₹21,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का रिकॉर्ड बनाया है; उग्राम की सफलता आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन रणनीति के लिए निर्णायक है।
- फ़ील्ड ट्रायल्स, प्रति यूनिट लागत और प्रोडक्शन स्केलिंग — ये तीन पैमाने तय करेंगे कि उग्राम 'गेम चेंजर' है या सिर्फ़ प्रोटोटाइप।
आँकड़ों में
- उग्राम की प्रभावी रेंज 500 मीटर — 7.62 mm गोली 5.56 mm से लगभग दोगुनी muzzle energy रखती है
- SIG Sauer 716 G2 की अनुमानित लागत लगभग ₹2.5 लाख प्रति यूनिट — उग्राम का लक्ष्य इसे काफ़ी कम करना
- भारत का रक्षा निर्यात 2024-25 में ₹21,000 करोड़ — रक्षा मंत्रालय वार्षिक रिपोर्ट