कश्मीर के स्कूलों में 'पाकिस्तानी नैरेटिव' वाली किताबें — समग्र शिक्षा की आड़ में कौन चला रहा था ये खेल?

Singh Anchala

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने समग्र शिक्षा अभियान के जम्मू कार्यालय और नोएडा स्थित पब्लिशर के ठिकानों पर छापे मारे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, सरकारी स्कीम के तहत छपी किताबों में कथित तौर पर 'पाकिस्तानी नैरेटिव' और देशविरोधी सामग्री पाई गई, जिसके बाद यह कार्रवाई हुई।

कल्पना कीजिए — एक सरकारी स्कूल का बच्चा अपनी पाठ्यपुस्तक खोलता है और उसमें जो नक्शा छपा है, वह भारत का नहीं, पाकिस्तान का नैरेटिव बयान करता है। यह किसी काल्पनिक परिदृश्य की बात नहीं — जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों में समग्र शिक्षा अभियान के तहत बँटी किताबों में यही ज़हर मिलाया गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने समग्र शिक्षा के जम्मू कार्यालय और नोएडा स्थित पब्लिशर के ठिकानों पर एक साथ तलाशी ली है।

सवाल सीधा है: केंद्र सरकार की एक फ़्लैगशिप शिक्षा योजना के ज़रिए देशविरोधी सामग्री बच्चों तक कैसे पहुँची? और इसके पीछे महज़ लापरवाही है — या कोई सोचा-समझा डिज़ाइन?

क्या था किताबों में — 'पाकिस्तानी नैरेटिव' का मतलब

News18 की रिपोर्ट के मुताबिक़, इन किताबों की जांच में पाया गया कि उनमें 'पाकिस्तानी नैरेटिव' से मेल खाती सामग्री शामिल थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन किताबों में कश्मीर के इतिहास और भूगोल को ऐसे पेश किया गया जो भारत की संप्रभुता और संवैधानिक स्थिति के विपरीत है। यह मामला तब सामने आया जब स्थानीय शिक्षकों और सतर्क नागरिकों ने इन किताबों की सामग्री पर आपत्ति जताई।

अब ज़रा सोचिए — यह कोई फ़ुटपाथ पर बिकने वाली गुमनाम किताब नहीं थी। यह भारत सरकार की समग्र शिक्षा अभियान योजना के तहत, सरकारी बजट से, सरकारी टेंडर प्रक्रिया से छपी और सरकारी स्कूलों में बँटी किताब थी। हर कड़ी सरकारी है — फिर भी ज़हर पहुँचा।

नोएडा कनेक्शन — टेंडर किसने दिया, किसने जांचा?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, पुलिस ने जम्मू के समग्र शिक्षा कार्यालय के साथ-साथ नोएडा (उत्तर प्रदेश) में उस पब्लिशिंग फ़र्म के ठिकानों पर भी छापे मारे जिसने ये किताबें छापी थीं। यह दोहरी कार्रवाई एक साथ होना बताती है कि पुलिस इसे महज़ एक स्थानीय चूक नहीं, बल्कि एक नेटवर्क के तौर पर देख रही है।

असली सवाल यहाँ है: समग्र शिक्षा जैसी केंद्र-प्रायोजित योजना में किताबों की ख़रीद एक मल्टी-लेयर प्रक्रिया से गुज़रती है — प्रस्ताव, तकनीकी मूल्यांकन, सामग्री समीक्षा, और फिर मंज़ूरी। अगर नोएडा के किसी पब्लिशर ने देशविरोधी सामग्री वाली किताब छापी, तो वह टेंडर प्रक्रिया में कैसे क्वालिफ़ाई हुआ? सामग्री की समीक्षा किसने की? और सबसे अहम — किसने हरी झंडी दी?

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि यह मामला सिर्फ़ एक पब्लिशर की 'ग़लती' नहीं है। ट्रेड हलकों और शिक्षा विभाग के अंदरूनी सूत्रों की चर्चा है कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत किताबों की ख़रीद में पहले से ही 'शॉर्टकट' लिए जाते रहे हैं — सामग्री की गहरी समीक्षा को कई बार 'टाइमलाइन प्रेशर' का हवाला देकर टाला गया। कुछ सूत्रों का कहना है कि ऐसे टेंडर में तकनीकी बिड पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, कंटेंट ऑडिट पर बहुत कम। यह ब्यूरोक्रेटिक ख़ामी है या जानबूझकर बनाया गया लूपहोल — यही वह सवाल है जो अब जांच एजेंसियों के सामने है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

ब्यूरोक्रेसी की नाकामी या कुछ और?

इस पूरे प्रकरण को इंडिया हेराल्ड ने जिस कोण से ख़ंगाला, वह यह है कि असली ख़तरा सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि उस सिस्टम में है जिसने इन्हें बच्चों तक पहुँचने दिया। समग्र शिक्षा अभियान भारत सरकार की सबसे बड़ी शिक्षा योजनाओं में से एक है — इसके तहत स्कूलों का निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण, और पाठ्यसामग्री का वितरण होता है। जब इतने बड़े ढाँचे में एक पब्लिशर देशविरोधी सामग्री घुसा सकता है, तो यह सिस्टम की विश्वसनीयता पर ही सवाल है।

News18 की रिपोर्ट के अनुसार, किताबों की जांच में 'पाकिस्तानी नैरेटिव' जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं। अगर यह साबित होता है, तो यह सिर्फ़ एक प्रकाशन की ग़लती नहीं — बल्कि एक सुनियोजित प्रयास का हिस्सा हो सकता है। हालाँकि, अभी तक पब्लिशर या समग्र शिक्षा कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

आगे क्या — सिस्टम बदलेगा या सिर्फ़ FIR दर्ज होगी?

अब सबसे अहम सवाल आगे का है। अगर जांच सिर्फ़ इस एक पब्लिशर और इस एक बैच तक सीमित रहती है, तो यह मामला एक और 'शो-एक्शन' बनकर रह जाएगा। असली बदलाव तब होगा जब समग्र शिक्षा अभियान के तहत पूरे देश में बँटने वाली पाठ्यसामग्री का कंटेंट ऑडिट हो — न सिर्फ़ जम्मू-कश्मीर में, बल्कि हर उस राज्य में जहाँ यह योजना चलती है।

राजनीतिक गणित भी साफ़ है — जम्मू-कश्मीर में जहाँ एक तरफ़ केंद्र सरकार 'नॉर्मलाइज़ेशन' का दावा करती है, वहीं ऐसी घटनाएँ उस दावे की नींव हिला देती हैं। विपक्ष के लिए यह मौक़ा है सरकार की 'शिक्षा सुधार' नीति पर निशाना साधने का, और सत्ता पक्ष के लिए यह ज़रूरत है तेज़ और पारदर्शी कार्रवाई की — वरना 'देशविरोधी किताबें सरकारी बजट से छपीं' का नैरेटिव उनके लिए बेहद भारी पड़ेगा।

आने वाले दिनों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह जांच ऊपर तक जाती है — टेंडर कमेटी के सदस्यों, सामग्री-समीक्षा करने वाले अधिकारियों, और अंतिम मंज़ूरी देने वाले ब्यूरोक्रेट्स तक — या सिर्फ़ नोएडा के एक पब्लिशर पर रुककर ख़त्म हो जाती है। अगर जवाबदेही सिर्फ़ सबसे निचली कड़ी पर आकर ठहर गई, तो समझ लीजिए — सिस्टम ने एक और बार ख़ुद को बचा लिया।

बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में ज़हर घोलना किसी भी लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक हमला है — क्योंकि गोली का घाव दिखता है, लेकिन ज़हन में बोया गया ज़हर दशकों बाद फल देता है। सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं कि किताबें कौन छाप रहा था — सवाल यह है कि सरकारी तंत्र के भीतर वह दरवाज़ा कहाँ खुला है जिससे होकर यह ज़हर अंदर आया, और क्या उसे बंद करने की सचमुच राजनीतिक इच्छाशक्ति है?

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मुख्य बातें

  • जम्मू-कश्मीर पुलिस ने समग्र शिक्षा अभियान के जम्मू कार्यालय और नोएडा के पब्लिशर पर एक साथ छापे मारे — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
  • सरकारी योजना के तहत छपी किताबों में कथित 'पाकिस्तानी नैरेटिव' और देशविरोधी सामग्री पाई गई — News18 के अनुसार।
  • टेंडर प्रक्रिया में सामग्री समीक्षा (कंटेंट ऑडिट) की गंभीर कमी उजागर हुई — यह ब्यूरोक्रेटिक ख़ामी सिस्टमिक सवाल खड़े करती है।
  • अभी तक पब्लिशर या समग्र शिक्षा कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
  • असली परीक्षा यह है कि जांच सिर्फ़ पब्लिशर तक सीमित रहती है या टेंडर कमेटी और मंज़ूरी देने वाले अधिकारियों तक पहुँचती है।

आँकड़ों में

  • समग्र शिक्षा अभियान भारत सरकार की सबसे बड़ी केंद्र-प्रायोजित शिक्षा योजनाओं में से एक है जो देशभर के सरकारी स्कूलों में पाठ्यसामग्री वितरण करती है — News18 के अनुसार।
  • जम्मू और नोएडा — दो अलग-अलग राज्यों में एक साथ छापे मारे गए, जो पुलिस द्वारा इसे एक नेटवर्क के तौर पर देखे जाने का संकेत है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: जम्मू-कश्मीर पुलिस, समग्र शिक्षा अभियान (जम्मू कार्यालय), और नोएडा स्थित एक पब्लिशिंग फ़र्म — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
  • क्या: पुलिस ने समग्र शिक्षा कार्यालय जम्मू और नोएडा के पब्लिशर के ठिकानों पर एक साथ तलाशी ली — आरोप है कि सरकारी योजना के तहत छपी किताबों में देशविरोधी और 'पाकिस्तानी नैरेटिव' वाली सामग्री थी — News18 के अनुसार।
  • कब: 2026 में, ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार — टाइम्स ऑफ़ इंडिया।
  • कहाँ: जम्मू (समग्र शिक्षा कार्यालय) और नोएडा (उत्तर प्रदेश) में पब्लिशर के परिसर — टाइम्स ऑफ़ इंडिया।
  • क्यों: किताबों में कथित तौर पर भारत-विरोधी सामग्री और पाकिस्तान-समर्थक नैरेटिव पाया गया, जिसे शिक्षा विभाग की मंज़ूरी से सरकारी स्कूलों तक पहुँचाया गया — News18 के अनुसार।
  • कैसे: समग्र शिक्षा अभियान के तहत टेंडर प्रक्रिया से नोएडा के पब्लिशर को अनुबंध मिला, जिसने ये किताबें छापीं; इन्हें बिना पर्याप्त समीक्षा के सिलेबस में शामिल किया गया — News18 और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

समग्र शिक्षा अभियान क्या है और इसके तहत किताबें कैसे छपती हैं?

समग्र शिक्षा अभियान भारत सरकार की केंद्र-प्रायोजित शिक्षा योजना है जो स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों को कवर करती है। इसके तहत पाठ्यसामग्री टेंडर प्रक्रिया से चुने गए पब्लिशर्स द्वारा छापी जाती है — News18 के अनुसार।

जम्मू-कश्मीर के स्कूलों की किताबों में 'देशविरोधी' सामग्री क्या थी?

News18 के अनुसार, इन किताबों में 'पाकिस्तानी नैरेटिव' से मेल खाती सामग्री पाई गई — कश्मीर के इतिहास और भूगोल को भारत की संवैधानिक स्थिति के विपरीत पेश किया गया।

नोएडा के पब्लिशर पर छापा क्यों मारा गया?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, नोएडा स्थित पब्लिशिंग फ़र्म ने समग्र शिक्षा अभियान के तहत टेंडर पाकर ये विवादित किताबें छापी थीं, जिसके चलते पुलिस ने जम्मू और नोएडा दोनों जगह एक साथ तलाशी ली।

इस मामले में आगे क्या कार्रवाई हो सकती है?

जांच का दायरा यह तय करेगा कि कार्रवाई कितनी गहरी होती है — अगर टेंडर कमेटी, सामग्री-समीक्षक और मंज़ूरी अधिकारी भी जांच में आते हैं तो सिस्टमिक सुधार संभव है, वरना यह एक और सतही कार्रवाई बनकर रह जाएगी।

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