'वन नेशन, वन इलेक्शन' 2029 तक तैयार — लेकिन किन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी बीच में ही खिसकेगी?

Singh Anchala

वन नेशन वन इलेक्शन पैनल चीफ ने बताया कि 2029 तक रूपरेखा तैयार होगी। आज तक की रिपोर्ट के अनुसार इसके लागू होने पर दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के विधानसभा कार्यकाल में कटौती होगी, जिससे क्षेत्रीय दलों में बेचैनी तय है।

कल्पना कीजिए — आप किसी राज्य के मुख्यमंत्री हैं, जनता ने पाँच साल के लिए चुना है, लेकिन तीसरे साल ही दिल्ली से फ़ोन आता है: 'आपकी विधानसभा भंग हो रही है, नए सिरे से चुनाव होंगे — देश भर में एक साथ।' यह कोई राजनीतिक कल्पना नहीं, यह 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (ONOE) का गणितीय सच है। आज तक की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, ONOE पैनल के प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया है कि 2029 तक इसकी रूपरेखा पूरी तरह तैयार हो जाएगी।

सुनने में यह सुधार जैसा लगता है — एक बार चुनाव, कम ख़र्चा, ज़्यादा शासन। लेकिन इस प्रस्ताव की असली धार जिस तरफ़ है, उसे समझना ज़रूरी है। अगर 2029 में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने हैं, तो वे राज्य जिनकी विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 से पहले या बाद में ख़त्म होता है, उनके साथ क्या होगा?

इसका जवाब सीधा है और बेहद तकलीफ़देह — कार्यकाल काटना पड़ेगा। रामनाथ कोविंद समिति की सिफ़ारिशों और संविधान विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, इसके लिए अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन ज़रूरी होगा, जो क्रमशः लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल तय करते हैं। यानी यह महज़ कोई प्रशासनिक फ़ैसला नहीं, बल्कि संविधान की बुनियादी संरचना को छूने वाला क़दम है।

कौन-कौन से राज्य निशाने पर हैं?

अभी भारत में विधानसभा चुनाव अलग-अलग साल होते हैं। दिल्ली और बिहार के चुनाव 2025 में हुए — यानी उनका अगला कार्यकाल 2030 तक है। अगर 2029 में एक साथ चुनाव होते हैं तो इन राज्यों की सरकारों का कार्यकाल एक साल पहले ही काटना होगा। महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों में भी चुनाव चक्र 2029 से मेल नहीं खाता। इसी तरह पश्चिम बंगाल (2026), तमिलनाडु और केरल (2026), उत्तर प्रदेश (2027) — इन सबके कार्यकाल को या तो छोटा करना होगा या कृत्रिम रूप से बढ़ाना होगा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन राज्यों में ग़ैर-भाजपा सरकारें हैं — बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में एमके स्टालिन, केरल में वामदल — उनके लिए यह सीधा ख़तरा है। उनका कार्यकाल बीच में काटकर उन्हें दोबारा चुनाव के मैदान में उतारना भाजपा के लिए रणनीतिक फ़ायदे का सौदा हो सकता है, क्योंकि लोकसभा और विधानसभा एक साथ होने पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी होते हैं और क्षेत्रीय नैरेटिव कमज़ोर पड़ जाता है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि ONOE का असली मक़सद 'चुनावी ख़र्च बचाना' नहीं, बल्कि क्षेत्रीय क्षत्रपों की ज़मीन खिसकाना है। विपक्षी दलों के नेता प्राइवेट में इसे 'संघीय ढाँचे पर हमला' कह रहे हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से अभी चुप्पी साधे हैं — शायद इसलिए कि 2029 अभी दूर लगता है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कुछ विपक्षी मुख्यमंत्री पर्दे के पीछे संवैधानिक चुनौती की तैयारी में लगे हैं, लेकिन अब तक कोई खुला बयान नहीं आया है। (यह राजनीतिक हलकों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

संवैधानिक पेंच — इतना आसान नहीं है रास्ता

ONOE लागू करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए — और यह अकेले काफ़ी नहीं। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, चूँकि यह राज्यों के अधिकार और संघीय ढाँचे से जुड़ा मामला है, इसलिए आधे से ज़्यादा राज्य विधानसभाओं की सहमति भी ज़रूरी हो सकती है। अभी भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास लोकसभा में बहुमत है, लेकिन राज्यसभा में गणित अलग है और राज्य विधानसभाओं में तो और भी जटिल। यहीं पर ONOE का सबसे बड़ा राजनीतिक दाँव छिपा है — क्या भाजपा 2029 तक इतनी ताक़तवर स्थिति में होगी कि सभी संवैधानिक बाधाएँ पार कर सके?

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि ONOE का 2029 का लक्ष्य असल में एक 'प्रेशर टूल' है। इसे पूरी तरह लागू करना और सभी राज्यों को राज़ी करना लगभग असंभव के क़रीब है, लेकिन इसकी छाया भर से विपक्षी दलों की रणनीतिक प्लानिंग तहस-नहस हो जाती है। हर क्षेत्रीय पार्टी को अब यह सोचना पड़ेगा: 'क्या हमारा अगला चुनाव तय समय पर होगा भी या नहीं?'

आगे क्या देखना है?

अगले कुछ महीनों में तीन बातों पर नज़र रखिए। पहला — क्या विधि आयोग या सरकार कोई ड्राफ्ट संशोधन विधेयक संसद में लाती है? दूसरा — क्या ममता बनर्जी, एमके स्टालिन या नीतीश कुमार जैसे नेता सार्वजनिक रूप से विरोध में आते हैं? और तीसरा — क्या सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दाख़िल होती है जो 'बेसिक स्ट्रक्चर' के आधार पर इसे चुनौती दे?

2029 दूर लगता है, लेकिन राजनीति में तीन साल ज़्यादा नहीं होते। जो मुख्यमंत्री आज चैन की नींद सो रहे हैं, उन्हें शायद यह समझना चाहिए कि दिल्ली में उनकी कुर्सी की माप पहले ही ली जा चुकी है — सवाल सिर्फ़ यह है कि कैंची कब चलेगी।

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप/दावे नामित स्रोतों से लिए गए हैं और जब तक न्यायालय निर्णय न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना किसी पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • ONOE पैनल चीफ ने 2029 तक पूरी रूपरेखा तैयार करने का स्पष्ट लक्ष्य रखा है — इसके लिए अनुच्छेद 83 और 172 में संविधान संशोधन ज़रूरी होगा।
  • दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल, तमिलनाडु, केरल समेत दर्जनों राज्यों का विधानसभा कार्यकाल या तो काटना या बढ़ाना पड़ेगा — सबसे ज़्यादा असर ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों पर।
  • संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे से अधिक राज्य विधानसभाओं की सहमति बड़ी बाधा — ONOE का 2029 लक्ष्य एक 'प्रेशर टूल' की तरह भी काम कर रहा है।
  • एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी होते हैं, जिससे क्षेत्रीय दलों का नैरेटिव कमज़ोर पड़ता है — यही भाजपा की असली रणनीतिक गणित है।

आँकड़ों में

  • ONOE लागू करने का लक्ष्य वर्ष: 2029, जब अगला लोकसभा चुनाव होगा
  • कम से कम 15+ राज्यों के विधानसभा कार्यकाल 2029 से मेल नहीं खाते — सबके कार्यकाल में कटौती या विस्तार ज़रूरी
  • संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत + आधे से ज़्यादा राज्य विधानसभाओं की अनुमति अनिवार्य

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: वन नेशन वन इलेक्शन उच्चस्तरीय समिति के प्रमुख (पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति)
  • क्या: 2029 तक एक साथ चुनाव कराने की पूरी रूपरेखा तैयार करने की घोषणा
  • कब: 2026 में यह बयान — लक्ष्य 2029 लोकसभा चुनाव से पहले लागू करना
  • कहाँ: भारत — केंद्र सरकार स्तर पर, प्रभाव सभी राज्यों पर
  • क्यों: बार-बार चुनाव से शासन में रुकावट, खर्च और आचार संहिता के कारण विकास कार्य ठप होने का तर्क
  • कैसे: संविधान संशोधन के ज़रिए कुछ राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल घटाया या बढ़ाया जाएगा ताकि सभी चुनाव एक साथ हो सकें

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वन नेशन वन इलेक्शन क्या है और यह कब तक लागू होगा?

वन नेशन वन इलेक्शन का मतलब है लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना। पैनल चीफ के अनुसार इसकी रूपरेखा 2029 तक तैयार होगी, जो अगले लोकसभा चुनाव का वर्ष है।

ONOE से किन राज्यों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा?

दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड जैसे राज्यों का विधानसभा कार्यकाल 2029 से मेल नहीं खाता, इसलिए इनके कार्यकाल में कटौती या विस्तार करना होगा।

ONOE लागू करने के लिए क्या संविधान संशोधन ज़रूरी है?

हाँ, अनुच्छेद 83 और 172 में संशोधन ज़रूरी होगा। इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे से ज़्यादा राज्य विधानसभाओं की सहमति चाहिए।

क्या विपक्ष ONOE का विरोध कर रहा है?

अभी तक अधिकांश विपक्षी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से खुला विरोध नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे 'संघीय ढाँचे पर हमला' माना जा रहा है और कुछ नेता संवैधानिक चुनौती की तैयारी कर रहे हैं।

More from India Herald

Politicsविपक्ष की CJI को 'SOS' चिट्ठी — लेकिन SIR बिल का असली 'ब्रेक' सुप्रीम कोर्ट नहीं, NDA के अपने सहयोगी लगाएंगे?I.N.D.I.A गठबंधन ने 'One Nation, One Election' यानी SIR बिल को 'मोदी-शाह शासन से सबसे गंभीर ख़तरा' बताकर CJI को चिट्ठी लिख दी। लेकिन इंडिया …
PoliticsUCC के बाद मदरसा बोर्ड पर धामी की 'सर्जिकल स्ट्राइक' — क्या उत्तराखंड BJP का वो लैब है जहाँ पूरे देश का नुस्खा बनता है?यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड के बाद अब मदरसा बोर्ड का ख़ात्मा — धामी सरकार ने एक और 'पहले उत्तराखंड में' वाला कदम उठाया है। सवाल वही है: क्या देवभूम…
Politics'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर JPC की दिल्ली दस्तक — हिंदी बेल्ट के क्षेत्रीय दलों को इस बिल से सबसे बड़ा ख़तरा क्यों बताया जा रहा है?पी.पी. चौधरी की अगुवाई में JPC की 'स्टडी विज़िट' दिल्ली पहुँची है — विपक्षी दलों का आरोप है कि इस संसदीय कवायद के पीछे हिंदी बेल्ट में क्षेत…

Find Out More:

Related Articles: