E20 पर सरकार का U-टर्न — गन्ना किसानों का 'ग्रीन सपना' तोड़ने वाली लॉबी कौन?
सरकार ने E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को टालकर ऑइल कंपनियों और ऑटो लॉबी को राहत दी है। तहसीन पूनावाला ने इसे जनता की पहली जीत बताया, लेकिन गन्ना किसानों के लिए यह बड़ा झटका है — एथेनॉल की माँग घटने से UP-बिहार की चीनी मिलें और उनसे जुड़े लाखों किसान सीधे प्रभावित होंगे।
एक रुपये का पेट्रोल सस्ता करने के लिए एक पूरी फ़सल का भविष्य दाँव पर लग सकता है — यही E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग विवाद की असली कहानी है। सरकार ने पेट्रोल में 20 फ़ीसदी एथेनॉल मिलाने का अपना महत्वाकांक्षी E20 लक्ष्य आगे बढ़ाने से हाथ खींच लिए हैं, और इस U-टर्न के पीछे जो ताक़तें काम कर रही हैं, वे दिल्ली की बैठकों में बैठी हैं — लखनऊ या पटना के गन्ने के खेतों में नहीं।
राजनीतिक टिप्पणीकार तहसीन पूनावाला ने इसे 'जनता की पहली जीत' बताते हुए E0 और E10 विकल्प उपलब्ध कराने की माँग रखी है।
पूनावाला का तर्क उपभोक्ता के नज़रिये से ठीक है — E20 ईंधन से कई गाड़ियों के इंजन की वारंटी ख़तरे में थी, माइलेज घट रहा था, और पम्प पर 'शुद्ध पेट्रोल' का विकल्प था ही नहीं। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है — और वह पहलू UP के लखीमपुर, बिहार के चंपारण और महाराष्ट्र के कोल्हापुर के उन लाखों गन्ना किसानों का है, जिन्हें बताया गया था कि एथेनॉल उनके गन्ने का 'सोना' बना देगा।
गन्ना किसान को मिला था क्या वादा?
2014 के बाद से केंद्र सरकार ने एथेनॉल ब्लेंडिंग को 'ग्रीन एनर्जी मिशन' के रूप में पेश किया। भारतीय चीनी मिल संघ (ISMA) के आँकड़ों के अनुसार, 2013-14 में जहाँ एथेनॉल ब्लेंडिंग मात्र 1.5 फ़ीसदी थी, वहीं 2023-24 तक यह 12 फ़ीसदी से ऊपर पहुँच गई। इस दौर में गन्ना किसानों को बताया गया कि एथेनॉल की बढ़ती माँग उनके गन्ने की क़ीमत बढ़ाएगी, भुगतान समय पर होगा, और चीनी मिलों का घाटा कम होगा। कई मिलों ने एथेनॉल डिस्टिलरी में सैकड़ों करोड़ का निवेश किया — यह सब E20 लक्ष्य के भरोसे।
U-टर्न के पीछे कौन सी लॉबी?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस फ़ैसले के पीछे तीन अलग-अलग ताक़तें एक साथ काम कर रही हैं — और तीनों का गन्ना किसान से कोई लेना-देना नहीं। पहली, ऑटोमोबाइल कंपनियों की लॉबी — जिनके लिए E20 कम्पैटिबल इंजन बनाना ख़र्चीला था। India Today की रिपोर्ट के अनुसार, उपभोक्ताओं की शिकायतें बढ़ रही थीं कि E20 ईंधन से माइलेज 6-8 फ़ीसदी तक गिर रहा है। दूसरी, ऑइल मार्केटिंग कंपनियाँ (IOC, BPCL, HPCL) जिनके लिए एथेनॉल प्रोक्योरमेंट और ब्लेंडिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत बढ़ती जा रही थी। तीसरी — और सबसे कम चर्चित — अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑइल लॉबी, क्योंकि हर फ़ीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब है कच्चे तेल की माँग में कमी।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 2024 लोकसभा चुनावों के बाद सरकार ने E20 पर 'पुनर्विचार' शुरू कर दिया था, क्योंकि शहरी मतदाता — ख़ासकर कार-मालिक मध्यवर्ग — माइलेज और इंजन की शिकायतें लेकर सोशल मीडिया पर मुखर हो रहा था। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय और कृषि मंत्रालय के बीच इस मुद्दे पर गहरा मतभेद था — एक तरफ़ ऑइल कंपनियाँ चाहती थीं कि ब्लेंडिंग रुके, दूसरी तरफ़ कृषि मंत्रालय जानता था कि यह गन्ना बेल्ट में राजनीतिक ज़लज़ला ला सकता है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
UP-बिहार गन्ना बेल्ट पर असली मार
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है। NITI Aayog की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 5 करोड़ से ज़्यादा गन्ना किसान परिवार हैं, जिनमें अकेले UP में लगभग 45 लाख किसान गन्ने पर निर्भर हैं। E20 लक्ष्य ने इन किसानों को एक वैकल्पिक बाज़ार दिया था — अब अगर एथेनॉल की माँग घटती है, तो चीनी मिलों पर एथेनॉल खपाने का दबाव कम होगा, और मिलें फिर से वही पुरानी कहानी दोहराएँगी: गन्ने का बक़ाया महीनों तक न चुकाना। 2025-26 सीज़न में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर किसानों का बक़ाया ही हज़ारों करोड़ रुपये था।
क्या 'ग्रीन फ्यूल' का सपना ख़त्म?
ब्राज़ील — जो एथेनॉल ब्लेंडिंग में दुनिया का सबसे सफल मॉडल है — वहाँ E27 अनिवार्य है और फ़्लेक्स-फ्यूल गाड़ियाँ आम हैं। भारत ने ब्राज़ील का रास्ता अपनाने का दावा किया था, लेकिन जब शहरी उपभोक्ता ने शिकायत की, तो सरकार ने गाँव के गन्ना किसान की बजाय शहर के कार-मालिक की सुनी। यह चुनावी गणित है — शहरी मध्यवर्ग की नाराज़गी वोट बदलती है, गन्ना किसान की नाराज़गी को 'बक़ाया भुगतान' के वादे से शांत किया जा सकता है, कम-से-कम अगले चुनाव तक।
आने वाले दिनों में देखने लायक़ यह होगा कि क्या सरकार E15 जैसा बीच का रास्ता अपनाती है, या E20 को पूरी तरह ठंडे बस्ते में डाल देती है। अगर एथेनॉल प्रोक्योरमेंट प्राइस में कटौती होती है — जो ऑइल कंपनियाँ चाहती हैं — तो कई नई डिस्टिलरियाँ बंद हो सकती हैं, और गन्ना किसान फिर उसी जगह लौट जाएगा जहाँ 2014 से पहले था: चीनी की गिरती क़ीमतों और बक़ाया भुगतान के बीच फँसा हुआ।
तहसीन पूनावाला जब E0/E10 उपलब्धता को 'जनता की जीत' कहते हैं, तो वे शहर की जनता की बात कर रहे हैं। गाँव की जनता — जिसका गन्ना खेत में खड़ा है — उसकी हार अभी शुरू हुई है। असली सवाल यह नहीं कि E20 रुका या चला — सवाल यह है कि जब सरकार 'ग्रीन एनर्जी' का सपना बेचती है, तो उसकी क़ीमत कौन चुकाता है, और जब वह सपना टूटता है, तो ज़मीन पर कौन गिरता है?
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मुख्य बातें
- सरकार ने E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को टालकर ऑइल कंपनियों और ऑटो लॉबी को राहत दी — लेकिन 5 करोड़ से ज़्यादा गन्ना किसान परिवारों के लिए यह बड़ा झटका है
- तहसीन पूनावाला ने इसे 'जनता की पहली जीत' बताया और E0/E10 विकल्प की माँग रखी — लेकिन यह 'जीत' शहरी उपभोक्ता की है, गन्ना किसान की नहीं
- ऑटोमोबाइल लॉबी, ऑइल मार्केटिंग कंपनियाँ और अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑइल हित — तीन ताक़तें एक साथ E20 के ख़िलाफ़ काम कर रही थीं
- अगर एथेनॉल माँग घटी तो UP-बिहार की चीनी मिलें किसानों का गन्ना बक़ाया चुकाने में और देर करेंगी — 2025-26 में पहले ही बक़ाया हज़ारों करोड़ था
- ब्राज़ील में E27 अनिवार्य है, भारत E20 पर भी पीछे हट गया — 'ग्रीन फ्यूल' नीति की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल
आँकड़ों में
- भारत में 5 करोड़ से ज़्यादा गन्ना किसान परिवार — NITI Aayog
- एथेनॉल ब्लेंडिंग 2013-14 में 1.5% से बढ़कर 2023-24 में 12% से ऊपर पहुँची — ISMA
- E20 ईंधन से गाड़ियों की माइलेज 6-8% तक गिरने की उपभोक्ता शिकायतें — India Today
- UP में लगभग 45 लाख गन्ना किसान सीधे प्रभावित होने की आशंका
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्र सरकार, तहसीन पूनावाला, ऑइल मार्केटिंग कंपनियाँ, गन्ना किसान, चीनी मिल मालिक
- क्या: E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को आगे बढ़ाने से सरकार ने पीछे हटने का संकेत दिया; पूनावाला ने E0/E10 उपलब्धता की माँग की
- कब: जून 2026 में यह नीतिगत बदलाव सामने आया
- कहाँ: पूरे भारत में, विशेषकर UP, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना बेल्ट में
- क्यों: ऑटोमोबाइल कंपनियों की इंजन-कम्पैटिबिलिटी चिंताएँ, ऑइल कंपनियों का ब्लेंडिंग-लागत विरोध, और उपभोक्ता शिकायतें — इन सबने सरकार पर दबाव बनाया
- कैसे: सरकार ने E20 मैंडेट की टाइमलाइन को टाला और E0/E10 विकल्प की माँग को स्वीकार करने की दिशा में संकेत दिए
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
E20 एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है?
E20 का मतलब है पेट्रोल में 20 फ़ीसदी एथेनॉल मिलाना। एथेनॉल मुख्यतः गन्ने से बनाया जाता है। सरकार ने 2025 तक E20 लागू करने का लक्ष्य रखा था जो अब टल गया है।
E20 रुकने से गन्ना किसानों पर क्या असर होगा?
एथेनॉल की माँग घटने से चीनी मिलों की अतिरिक्त आय कम होगी, जिससे किसानों के गन्ना बक़ाया भुगतान में और देरी हो सकती है। NITI Aayog के अनुसार 5 करोड़ से ज़्यादा गन्ना किसान परिवार प्रभावित हो सकते हैं।
तहसीन पूनावाला ने E20 पर क्या कहा?
तहसीन पूनावाला ने सरकार के E20 से पीछे हटने को 'जनता की पहली जीत' बताया और माँग की कि E0 और E10 विकल्प पम्प पर उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि उपभोक्ता को चुनने का अधिकार मिले।
ब्राज़ील में एथेनॉल ब्लेंडिंग कितनी है?
ब्राज़ील में E27 (27% एथेनॉल) अनिवार्य है और फ़्लेक्स-फ्यूल गाड़ियाँ आम हैं। भारत ने ब्राज़ील मॉडल अपनाने का दावा किया था, लेकिन E20 पर ही पीछे हट गया।