80 हज़ार करोड़ का बजट, फिर भी मुंबई सड़कों पर मरती है — हर भारतीय शहर को डराने वाला 'BMC पैटर्न' क्या है?

Singh Anchala

BMC मुंबई का सालाना बजट 80,000 करोड़ रुपये से अधिक है — कई राज्यों से भी बड़ा — फिर भी मुंबई में बार-बार पुल गिरते हैं, सड़कें धँसती हैं, मानसून में जानें जाती हैं। असली बीमारी बजट की कमी नहीं, बल्कि ठेका-कमीशन-ठेकेदार की वह व्यवस्थागत सड़ांध है जो हर भारतीय नगर निगम का 'BMC पैटर्न' बन चुकी है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: BMC (बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) — भारत की सबसे बड़ी और सबसे अमीर नगर निगम
  • क्या: 80,000 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट के बावजूद मुंबई में इन्फ्रास्ट्रक्चर हादसे — पुल ढहना, सड़क धँसना, बाढ़ में मौतें — बार-बार होते रहे हैं
  • कब: 2024-2026 के बीच कई बड़े हादसे; BMC का बजट 2025-26 में 80,000 करोड़+ है
  • कहाँ: मुंबई, महाराष्ट्र — और यही पैटर्न दिल्ली, लखनऊ, पटना सहित तमाम भारतीय शहरों में दोहराया जाता है
  • क्यों: ठेका-कमीशन-ठेकेदार की तिकड़ी, पूंजीगत खर्च बनाम राजस्व खर्च का विकृत अनुपात, ऑडिट और जवाबदेही तंत्र की नाकामी — CAG और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार
  • कैसे: बजट का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक खर्च और रिपीट-रिपेयर ठेकों में जाता है, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर वास्तविक पूंजी निवेश कम रहता है, और ठेकों की गुणवत्ता जाँच कमज़ोर रहती है — BMC ऑडिट रिपोर्ट्स और CAG के अनुसार

एक आँकड़ा याद रखिए: 80,000 करोड़ रुपये। यह किसी राज्य का बजट नहीं — यह एक शहर की नगर निगम का सालाना बजट है। BMC मुंबई दुनिया की सबसे अमीर म्युनिसिपल बॉडीज़ में गिनी जाती है। इस रकम से गोवा, मणिपुर और मेघालय — तीनों राज्यों का बजट मिलाकर भी छोटा पड़ जाए। फिर भी, मुंबई में हर मानसून ज़िंदगियाँ निगलता है, पुल बिना चेतावनी गिरते हैं, और सड़कें ऐसे धँसती हैं जैसे नीचे की ज़मीन ने हार मान ली हो।

सवाल बजट का नहीं है। सवाल उस पैसे का है जो खर्च होने के बाद भी ज़मीन पर कहीं दिखता नहीं।

बजट जितना बढ़ा, हादसे उतने बढ़े — यह विरोधाभास कैसे?

BMC का बजट पिछले एक दशक में लगभग दोगुना हुआ है। 2015-16 में यह क़रीब 37,000 करोड़ था, और 2025-26 में यह 80,000 करोड़ से ऊपर पहुँच गया — BMC के बजट दस्तावेज़ों और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग के अनुसार। लेकिन इसी दौरान मुंबई ने 2017 का एलफ़िंस्टन पुल हादसा देखा जिसमें 23 लोग कुचले गए, 2019 में अंधेरी में फ़ुट ओवरब्रिज ढहा, CST पुल गिरा, और लगभग हर साल मानसून में दीवारें और इमारतें ढहने से दर्जनों मौतें हुईं — मीडिया रिपोर्ट्स और NDTV के अनुसार।

CAG की ऑडिट रिपोर्ट्स ने बार-बार एक बात रेखांकित की है: BMC का पूंजीगत व्यय (capital expenditure) — यानी वह पैसा जो नई सड़कें, नाले, पुल और स्थायी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जाना चाहिए — कुल बजट का एक चौथाई से भी कम रहता है। बाक़ी कहाँ जाता है? प्रशासनिक खर्चों, वेतन, और उन 'रिपेयर ठेकों' में जो हर साल उसी सड़क को, उसी नाले को, उसी पुल को दोबारा ठीक करते हैं — ताकि अगले साल फिर ठेका निकल सके।

'ठेका-कमीशन-ठेकेदार' — वह तिकड़ी जो बजट खाती है

मुंबई के नगरसेवकों और बीएमसी अधिकारियों के बीच ठेकों को लेकर जो गतिशीलता है, उसे समझना ज़रूरी है। द हिंदू और टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने कई बार ख़ुलासा किया है कि BMC के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर ठेके बार-बार उन्हीं कुछ कंपनियों को मिलते हैं। सड़क बनाने का ठेका मिलता है, सड़क बनती है, मानसून में टूट जाती है, फिर रिपेयर का ठेका मिलता है — उसी कंपनी को। यह 'रिपीट-रिपेयर मॉडल' BMC की सबसे बड़ी बीमारी है।

सियासी गलियारों में यह बात खुलकर कही जाती है कि मुंबई का हर बड़ा ठेका एक 'कमीशन चेन' से गुज़रता है — पार्षद, ज़ोनल ऑफ़िसर, कॉन्ट्रैक्टर। इस चेन में हर कड़ी अपना हिस्सा लेती है, और जब ठेका ज़मीन पर पहुँचता है, तो 80,000 करोड़ के बजट वाली सड़क की गुणवत्ता 8,000 करोड़ वाली लगती है। मुंबई में बस पलटी, विधानसभा में हंगामा — लेकिन UP-बिहार की स्कूल बसों का 'फिटनेस' कौन जाँच रहा है? — यह सवाल सिर्फ़ बसों का नहीं, पूरे शहरी शासन तंत्र का है।

पॉलिटिकल पल्स — वह सच जो कोई कैमरे पर नहीं कहता

मुंबई की सियासी हलकों में एक कड़वा मज़ाक चलता है: "BMC का बजट बढ़ाओ, ठेकेदार की गाड़ी बदल जाती है।" राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BMC पर दशकों तक शिवसेना का एकछत्र राज रहा, फिर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन, फिर महाविकास अघाड़ी — लेकिन ठेकों का 'इकोसिस्टम' कभी नहीं बदला। सत्ता बदलती है, ठेकेदार वही रहते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की एक पड़ताल के अनुसार, BMC के शीर्ष 20 ठेकेदारों में से 15 पिछले दो दशकों से लगातार ठेके जीतते आ रहे हैं — सत्ता में चाहे कोई भी रहा हो।

ट्रेड हलकों में चर्चा यह भी है कि 2024 के बाद से महाराष्ट्र में महायुति सरकार के आने के बाद BMC पर जो प्रशासकीय नियंत्रण चल रहा है (निर्वाचित निकाय भंग है), उसमें ठेकों की 'क्लियरेंस स्पीड' बढ़ी है — लेकिन क्वालिटी ऑडिट और नहीं। यह एक और ख़तरनाक संकेत है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

'BMC पैटर्न' — मुंबई की बीमारी, लेकिन मरीज़ हर शहर

यहाँ वह बात जो सबसे ज़्यादा डराती है: मुंबई कोई अपवाद नहीं है। दिल्ली की MCD का बजट भी बढ़ता गया, लेकिन 2024-25 में भी दिल्ली की सड़कों पर गड्ढों से मौतें हुईं — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार। लखनऊ नगर निगम में ड्रेनेज प्रोजेक्ट बार-बार उसी कंपनी को अलॉट हुए और बाढ़ हर साल आई — दैनिक भास्कर की रिपोर्ट। पटना में 2023-24 में नगर निगम ने सड़क मरम्मत पर करोड़ों खर्च दिखाए, लेकिन मानसून के पहले हफ़्ते में ही सड़कें उखड़ गईं — हिंदुस्तान अख़बार के अनुसार।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है: यह 'BMC पैटर्न' असल में भारतीय शहरी शासन का डीएनए बन चुका है। बजट बढ़ता है → ठेके बढ़ते हैं → कमीशन बढ़ता है → गुणवत्ता घटती है → हादसा होता है → जाँच बैठती है → रिपोर्ट दबती है → अगला बजट और बड़ा आता है। यह चक्र तब तक नहीं टूटेगा जब तक ठेकों की स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिटिंग अनिवार्य न हो, और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक न हो। लेकिन ऐसा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी भी पार्टी में नहीं दिखती — क्योंकि हर पार्टी इसी इकोसिस्टम की लाभार्थी है।

आगे क्या होगा — आने वाले मानसून का असली इम्तिहान

मुंबई में 2026 का मानसून क़रीब है। हर साल की तरह BMC ने 'प्री-मानसून तैयारी' का ऐलान किया है — नालों की सफ़ाई, पंपिंग स्टेशन की जाँच, फ़्लड गेट्स का निरीक्षण। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक BMC का निर्वाचित निकाय बहाल नहीं होता और नगरसेवक जनता को जवाब देने की स्थिति में नहीं आते, तब तक यह तैयारी कागज़ी रहेगी।

आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ यह होगा: क्या महाराष्ट्र सरकार BMC चुनाव कराने का कोई संकेत देती है? क्या विपक्ष — कांग्रेस और उद्धव शिवसेना — इस मुद्दे को विधानसभा में उठाकर प्रशासकीय BMC की जवाबदेही तय कर पाते हैं? और सबसे ज़रूरी — क्या मानसून की पहली बड़ी बारिश के बाद भी मुंबई में वही हादसे दोहराए जाएँगे जो हर साल होते हैं?

अगर इतिहास कोई गवाह है, तो जवाब आप पहले से जानते हैं।

80,000 करोड़ का बजट मुंबई को नहीं बचा पाता — क्योंकि पैसा वहाँ जा ही नहीं रहा जहाँ जाना चाहिए। असली सवाल यह नहीं कि बजट कितना बड़ा है — असली सवाल यह है कि वह बजट ज़मीन पर पहुँचते-पहुँचते कितना सिकुड़ जाता है। और जब तक यह सवाल हर भारतीय शहर का हर नागरिक अपने नगर निगम से नहीं पूछता, तब तक हम सब उसी BMC पैटर्न में फँसे रहेंगे — जहाँ बजट का आँकड़ा बढ़ता जाता है, और ज़िंदगियों का आँकड़ा भी।

यहाँ बताए गए आरोप और दावे नामित स्रोतों से उद्धृत हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • BMC मुंबई का 2025-26 बजट: 80,000 करोड़ रुपये से अधिक — BMC बजट दस्तावेज़/इंडियन एक्सप्रेस
  • BMC का पूंजीगत खर्च कुल बजट का 25% से कम — CAG ऑडिट रिपोर्ट
  • BMC के शीर्ष 20 ठेकेदारों में 15 पिछले 20 वर्षों से लगातार ठेके जीतते रहे — हिंदुस्तान टाइम्स पड़ताल
  • 2017 एलफ़िंस्टन हादसा: 23 मौतें — मीडिया रिपोर्ट्स

मुख्य बातें

  • BMC मुंबई का बजट 80,000 करोड़+ है — गोवा, मणिपुर, मेघालय तीनों राज्यों के बजट से भी बड़ा — लेकिन पूंजीगत खर्च कुल बजट का एक चौथाई से कम रहता है (CAG ऑडिट रिपोर्ट)
  • 'रिपीट-रिपेयर मॉडल': सड़क बनती है, टूटती है, फिर उसी कंपनी को रिपेयर का ठेका मिलता है — टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार शीर्ष 20 ठेकेदारों में 15 दो दशकों से वही हैं
  • यह सिर्फ़ मुंबई की बीमारी नहीं — दिल्ली MCD, लखनऊ और पटना नगर निगमों में भी यही 'BMC पैटर्न' दोहराया जाता है
  • BMC का निर्वाचित निकाय भंग है, प्रशासकीय नियंत्रण में ठेकों की 'क्लियरेंस स्पीड' बढ़ी लेकिन क्वालिटी ऑडिट नहीं — जवाबदेही का संकट गहराया है
  • स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट अनिवार्य और सार्वजनिक होने तक यह चक्र नहीं टूटेगा — लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी पार्टी में नहीं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

BMC मुंबई का बजट 2025-26 में कितना है?

BMC मुंबई का बजट 2025-26 में 80,000 करोड़ रुपये से अधिक है — यह गोवा, मणिपुर और मेघालय जैसे कई राज्यों के बजट से भी बड़ा है। BMC के बजट दस्तावेज़ों और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार।

BMC में ठेकों को लेकर क्या समस्या है?

CAG ऑडिट और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार BMC में 'रिपीट-रिपेयर मॉडल' चलता है — सड़क बनती है, टूटती है, फिर उसी कंपनी को रिपेयर ठेका मिलता है। शीर्ष ठेकेदार दो दशकों से वही हैं।

BMC पैटर्न क्या है और यह अन्य शहरों में कैसे दोहराया जाता है?

BMC पैटर्न वह चक्र है जिसमें बजट बढ़ता है लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर गुणवत्ता नहीं बढ़ती — ठेका-कमीशन-ठेकेदार तिकड़ी बजट का बड़ा हिस्सा खा जाती है। दिल्ली MCD, लखनऊ और पटना नगर निगमों में भी यही पैटर्न दिखता है — दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान रिपोर्ट्स के अनुसार।

BMC के निर्वाचित निकाय की क्या स्थिति है?

BMC का निर्वाचित निकाय 2022 से भंग है और प्रशासकीय नियंत्रण में चल रहा है। चुनाव की तारीख़ अभी तय नहीं है, जिससे जनता के प्रति सीधी जवाबदेही का संकट गहरा हुआ है।

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