भारत में 40% बच्चे बीमार पड़ने पर स्कूल जाते हैं — क्या विद्या की वैद्यम् सिर्फ़ नारा है?

Raj Harsh

भारत में लगभग 40% स्कूली बच्चे किसी न किसी स्वास्थ्य समस्या — एनीमिया, कुपोषण या आँखों की कमज़ोरी — के साथ क्लास में बैठते हैं। WHO और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार सेहत और शिक्षा का यह रिश्ता सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ किया गया संकट है।

एक सरकारी स्कूल की सुबह की लाइन। राष्ट्रगान के बाद बच्चे क्लास की ओर भागते हैं — पर ग़ौर से देखिए: हर तीसरे बच्चे की आँखें धँसी हुई हैं, पाँचवाँ बच्चा सिकुड़कर बेंच पर बैठता है क्योंकि पेट में दर्द है, और कोने वाली लड़की बोर्ड पर लिखा सीधा पढ़ नहीं पा रही क्योंकि उसे चश्मे की ज़रूरत है जो मिला ही नहीं। यह दृश्य किसी एक ज़िले का नहीं — यह बिहार से राजस्थान तक, यूपी से झारखंड तक हज़ारों स्कूलों की रोज़ाना कहानी है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आँकड़े एक कड़वी सच्चाई सामने रखते हैं: 5 से 14 साल के भारतीय बच्चों में एनीमिया की दर 40% से ऊपर है। इसका सीधा मतलब — ख़ून में हीमोग्लोबिन की कमी, जिससे एकाग्रता टूटती है, याददाश्त कमज़ोर पड़ती है, और क्लास में बैठा बच्चा शरीर से हाज़िर मगर दिमाग़ से ग़ैरहाज़िर रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2024 की अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा है कि एनीमिया और कुपोषण बच्चों की संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive ability) को स्थायी रूप से कम कर सकते हैं — यानी नुक़सान सिर्फ़ आज का नहीं, ज़िंदगी भर का है।

अब इसे दूसरे नंबर से जोड़ें: द लैंसेट चाइल्ड एंड एडोलेसेंट हेल्थ में प्रकाशित शोध के मुताबिक़ भारत के ग्रामीण इलाक़ों में हर चौथे बच्चे का BMI उम्र के हिसाब से कम है — यानी वे कुपोषित हैं। ये बच्चे जब परीक्षा देते हैं तो मुक़ाबला उन शहरी बच्चों से होता है जिन्हें तीनों वक़्त का पूरा खाना, साफ़ पानी और डॉक्टर की सुविधा मिलती है। विद्या की दौड़ में बराबरी का दावा करना तब तक बेमानी है जब तक सेहत की शुरुआती लाइन ही बराबर न हो।

सरकार की तरफ़ से योजनाएँ हैं — और कम नहीं हैं। आयुष्मान भारत स्कूल हेल्थ प्रोग्राम और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के तहत हर बच्चे की सालाना स्क्रीनिंग का वादा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार RBSK के तहत देशभर में लगभग 90,000 मोबाइल हेल्थ टीमें तैनात हैं। काग़ज़ पर यह इम्तिहान पास है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और कहती है।

CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की 2023-24 की ऑडिट रिपोर्ट कई राज्यों में RBSK की ख़ामियों पर उँगली उठाती है: कहीं टीमों में नर्स ही नहीं, कहीं उपकरण ख़राब पड़े हैं, कहीं स्क्रीनिंग डेटा भरा तो गया पर फ़ॉलो-अप ज़ीरो। एक अनुमान के मुताबिक़ ग्रामीण स्कूलों में 60-65% बच्चों की सालाना स्वास्थ्य जाँच या तो होती ही नहीं या कागज़ी खानापूर्ति होती है। नतीजा — बच्चा बीमार पड़ता है, कुछ दिन स्कूल नहीं आता, पीछे छूट जाता है, और एक दिन ड्रॉपआउट की सूची में नाम जुड़ जाता है।

और अब एक ऐसा पहलू जो सबसे ज़्यादा अनदेखा है: मानसिक स्वास्थ्य। NIMHANS (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान) के सर्वेक्षण और UNICEF इंडिया की 2021 रिपोर्ट बताती है कि 10-19 साल के भारतीय किशोरों में हर सातवाँ किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है — चिंता, अवसाद, परीक्षा का डर, साइबरबुलिंग। लेकिन भारत के 99% सरकारी स्कूलों में कोई काउंसलर नहीं है। बच्चे को बता दिया जाता है "मन लगाकर पढ़ो" — जबकि उसका मन पढ़ाई में लगने की हालत में ही नहीं है।

इन सबके बीच इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट पॉलिसी-रीड यह है कि 'विद्या की वैद्यम्' — यानी शिक्षा ही असली उपचार — का नारा तब तक खोखला रहेगा जब तक वैद्यम् (सेहत) को विद्या (शिक्षा) की पूर्व-शर्त नहीं माना जाता। जब तक हर स्कूल में एक ट्रेंड हेल्थ वर्कर, हर ब्लॉक में एक फ़ंक्शनल RBSK टीम, और हर ज़िले में स्कूल काउंसलिंग सिस्टम ज़मीन पर खड़ा नहीं होता — तब तक NEP 2020 के 'होलिस्टिक डेवलपमेंट' का सपना एक और पॉलिसी डॉक्यूमेंट बनकर रह जाएगा।

आने वाले महीनों में यह मसला और तीखा होगा। 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्कूल हेल्थ के लिए अलग आवंटन की माँग कई सांसदों ने उठाई है। अगर सरकार RBSK को सिर्फ़ रिन्यू करती है बिना ऑडिट-आधारित सुधार के, तो अगले NFHS (NFHS-6, जिसका फ़ील्डवर्क 2025-26 में शुरू हुआ) के नतीजे और शर्मनाक आएँगे। दूसरी तरफ़, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों ने स्कूल हेल्थ क्लीनिक का पायलट मॉडल शुरू किया है — अगर ये सफल रहे तो बाक़ी राज्यों पर दबाव बढ़ेगा।

असली सवाल यह है: क्या हम बच्चों को सिर्फ़ स्कूल भेज रहे हैं, या सीखने की हालत में भेज रहे हैं? जिस देश में मिड-डे मील से करोड़ों बच्चों की भूख मिटाई गई, वहाँ एनीमिया, दृष्टि दोष और मानसिक स्वास्थ्य को स्कूल की दहलीज़ पर रोकना इतना मुश्किल क्यों है? यह सवाल हर उस माँ-बाप का है जो सुबह बच्चे को बस्ता थमाकर सोचता है कि काम हो गया — जबकि असली काम तो शुरू ही नहीं हुआ।

यह रिपोर्ट पत्रकारिता है, चिकित्सकीय सलाह नहीं; किसी भी स्वास्थ्य चिंता के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • NFHS-5 के अनुसार 5-14 साल के भारतीय बच्चों में एनीमिया की दर 40% से अधिक है — यह सीखने की क्षमता को स्थायी रूप से प्रभावित करता है
  • RBSK की 90,000 मोबाइल टीमें काग़ज़ पर मौजूद हैं लेकिन CAG ऑडिट के अनुसार ग्रामीण स्कूलों में 60-65% बच्चों की असल स्क्रीनिंग नहीं हो पाती
  • UNICEF इंडिया के मुताबिक़ 10-19 साल के हर सातवें किशोर को मानसिक स्वास्थ्य सहायता चाहिए, लेकिन 99% सरकारी स्कूलों में काउंसलर ही नहीं
  • जब तक सेहत को शिक्षा की पूर्व-शर्त नहीं माना जाता, NEP 2020 का 'होलिस्टिक डेवलपमेंट' का वादा अधूरा रहेगा

आँकड़ों में

  • NFHS-5: 5-14 आयु वर्ग में एनीमिया दर 40%+
  • RBSK के तहत लगभग 90,000 मोबाइल हेल्थ टीमें तैनात (केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय)
  • UNICEF India: 10-19 आयु वर्ग में हर 7वाँ किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त
  • ग्रामीण स्कूलों में अनुमानित 60-65% बच्चों की सालाना स्वास्थ्य स्क्रीनिंग नहीं होती (CAG ऑडिट संदर्भ)

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