वॉशिंगटन सुंदर — बल्लेबाज़ या गेंदबाज़? गंभीर की कोचिंग में 'रोल कंफ्यूज़न' क्या टीम इंडिया की ऑलराउंडर पॉलिसी का असली संकट है?
गौतम गंभीर की कोचिंग में वॉशिंगटन सुंदर को कभी नंबर-8 बल्लेबाज़ बनाया गया, कभी स्पिन विकल्प, कभी पावरप्ले बॉलर — मगर एक तय भूमिका कभी नहीं मिली। रवि अश्विन ने ख़ुद स्वीकार किया कि 'नई टीम मैनेजमेंट' आने के बाद सुंदर की रोल क्लैरिटी ख़त्म हुई। यह एक खिलाड़ी नहीं, पूरी ऑलराउंडर पॉलिसी का संकट है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: वॉशिंगटन सुंदर — भारतीय ऑलराउंडर, और हेड कोच गौतम गंभीर
- क्या: गंभीर की कोचिंग में सुंदर को स्पष्ट भूमिका न मिलना और ऑलराउंडर पॉलिसी पर सवाल उठना
- कब: 2024-25 सीज़न से लेकर 2026 तक, गंभीर के कोच बनने के बाद
- कहाँ: टीम इंडिया — टेस्ट, ODI और T20I तीनों फ़ॉर्मेट में
- क्यों: कोचिंग स्टाफ़ ऑलराउंडरों की भूमिका तय करने में असमर्थ, रवि अश्विन के मुताबिक 'नई मैनेजमेंट' के बाद रोल क्लैरिटी गायब हुई
- कैसे: हर सीरीज़ में सुंदर का बैटिंग ऑर्डर और बॉलिंग कोटा बदलता रहा, जिससे न बल्ले से न गेंद से लगातार प्रदर्शन संभव हुआ
वॉशिंगटन सुंदर का रोल कंफ्यूज़न गौतम गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया के ऑलराउंडर संकट का सबसे तीखा उदाहरण है। एक मैच में नंबर 8 पर भेजो, अगले में ओपनिंग स्पेल दिलाओ, तीसरे में बेंच पर बिठा दो — और फिर पूछो कि 'मैच विनिंग परफ़ॉर्मेंस क्यों नहीं आती?' यह सवाल सुंदर से नहीं, उस सिस्टम से पूछा जाना चाहिए जो उसे हर बार एक नए रोल में धकेलता है।
रवि अश्विन ने ख़ुद इस संकट को शब्द दिए हैं। उन्होंने कहा कि 'नई टीम मैनेजमेंट आने के बाद सुंदर की रोल क्लैरिटी ख़त्म हो गई।'
गंभीर के कोच बनने से पहले सुंदर की पहचान साफ़ थी — बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों के ख़िलाफ़ पावरप्ले में ऑफ़-स्पिन, और निचले क्रम में काम की पारी खेलने वाला बल्लेबाज़। यह भूमिका सीमित थी, लेकिन स्पष्ट थी। दिलचस्प बात यह है कि ख़ुद सुंदर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर को क्रेडिट दिया था कि उनकी बैटिंग में सुधार गंभीर की वजह से आया।
समस्या की जड़ गंभीर की उस फ़िलॉसफ़ी में है जहाँ हर ऑलराउंडर को 'फ्लेक्सिबल' होना चाहिए। सुनने में अच्छा लगता है — 'सिचुएशनल क्रिकेट', 'एडैप्टेबिलिटी'। लेकिन जब फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब यह हो कि खिलाड़ी को पता ही नहीं कि उसकी टीम में प्राथमिक ज़िम्मेदारी क्या है, तो यह 'स्मार्ट क्रिकेट' नहीं, कोचिंग की विफलता है। अश्विन का रोल बदला — टेस्ट में पहले स्पेशलिस्ट स्पिनर, फिर धीरे-धीरे हाशिए पर। जडेजा को कभी नंबर 5 बल्लेबाज़ बनाया गया, कभी तीसरा स्पिनर। और सुंदर? उन्हें तो हर सीरीज़ में नए सिरे से अपनी उपयोगिता साबित करनी पड़ी।
विक्रांत गुप्ता जैसे वरिष्ठ क्रिकेट पत्रकारों ने सुंदर और प्रसिद्ध कृष्णा दोनों के मामले में गंभीर की रणनीति पर तीखे सवाल उठाए हैं। जब वैभव सूर्यवंशी जैसे 16 साल के डेब्यूटेंट को मौक़ा दिया जा रहा है, तो सुंदर जैसे अनुभवी ऑलराउंडर का क्या? क्या उनकी कीमत सिर्फ़ 'बैकअप' की है?
सवाल सिर्फ़ सुंदर का नहीं है। सवाल यह है कि गंभीर के तहत टीम इंडिया में ऑलराउंडर का मतलब क्या है? IPL में हर फ्रेंचाइज़ी अपने ऑलराउंडर का रोल पहले दिन तय करती है — प्राइमरी बॉलर जो बैट कर सकता है, या प्राइमरी बैट्समैन जो कुछ ओवर दे सकता है। लेकिन राष्ट्रीय टीम में यह बुनियादी फ़ैसला लंबित है। नतीजा? सुंदर का टेस्ट एवरेज और T20I इकोनॉमी रेट दोनों पिछले डेढ़ साल में गिरे हैं — क्योंकि जो खिलाड़ी अपनी भूमिका लेकर अनिश्चित है, वह न बल्ले से आज़ाद होकर खेल सकता है, न गेंद से।
अजित आगरकर की चयन समिति भी इस उलझन में बराबर की भागीदार है। सोशल मीडिया पर कई क्रिकेट विश्लेषकों ने आगरकर की 'सिलेक्शन पॉलिटिक्स' पर सवाल उठाए हैं — श्रेयस अय्यर के साथ लंबे मतभेद और सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट से हटाने जैसे फ़ैसले इसकी मिसाल हैं। जब सिलेक्टर और कोच दोनों के बीच ऑलराउंडर की परिभाषा ही अलग-अलग हो, तो खिलाड़ी किसकी सुने?
गंभीर के कोचिंग कार्यकाल में टीम इंडिया ने कई ऐसे 'नए रिकॉर्ड' बनाए हैं जो पहले कभी नहीं बने। यह आलोचना सिर्फ़ हार-जीत की नहीं, बल्कि उस अप्रोच की है जो प्रतिभा को पहचानती तो है, लेकिन उसे सही जगह रखने में चूकती है। सुंदर के पास टैलेंट है — उनका घरेलू क्रिकेट रिकॉर्ड, उनकी IPL में लगातार उपयोगिता, और बड़े मौकों पर टेस्ट में की गई पारियाँ इसका सबूत हैं। लेकिन प्रतिभा तभी फलती-फूलती है जब उसे पता हो कि बगीचे में उसकी क्यारी कौन-सी है।
श्रेयस अय्यर की कप्तानी पर भी सवाल उठ रहे हैं, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि असली दोष कप्तान का नहीं, बल्कि उस 'बैटिंग यूनिट' और 'बॉलिंग प्लान' का है जो कोच-सिलेक्टर मिलकर तैयार करते हैं।
आने वाली सीरीज़ में सुंदर का भविष्य इस बात पर टिका है कि क्या गंभीर ऑलराउंडरों के लिए एक स्पष्ट 'रोल मैट्रिक्स' बनाते हैं या नहीं। अगर हर मैच में भूमिका बदलती रही, तो सुंदर अकेले नहीं गिरेंगे — उनके साथ भारत का वह पूरा ऑलराउंडर बेंच गिरेगा जिसे कभी दुनिया का सबसे गहरा माना जाता था। सवाल यह नहीं कि सुंदर कितने अच्छे हैं — सवाल यह है कि क्या यह सिस्टम किसी भी ऑलराउंडर को अच्छा रहने देगा?
आँकड़ों में
- गंभीर के कोचिंग कार्यकाल में टीम इंडिया ने कई अभूतपूर्व नकारात्मक रिकॉर्ड बनाए — विश्लेषकों के अनुसार
- सुंदर का टेस्ट एवरेज और T20I इकोनॉमी रेट दोनों पिछले डेढ़ साल में गिरावट पर रहे
मुख्य बातें
- रवि अश्विन ने स्वीकार किया कि 'नई टीम मैनेजमेंट' आने के बाद वॉशिंगटन सुंदर की रोल क्लैरिटी ख़त्म हो गई
- गंभीर की कोचिंग में अश्विन, जडेजा और सुंदर — तीनों ऑलराउंडरों की भूमिका बार-बार बदली गई
- सुंदर को कभी नंबर 8 बल्लेबाज़, कभी पावरप्ले स्पिनर, कभी बेंच प्लेयर बनाया गया — एक तय रोल कभी नहीं मिला
- विक्रांत गुप्ता समेत कई वरिष्ठ पत्रकारों ने गंभीर की ऑलराउंडर रणनीति पर सवाल उठाए
- अजित आगरकर की चयन नीति पर भी 'सिलेक्शन पॉलिटिक्स' के आरोप — श्रेयस अय्यर प्रकरण इसकी मिसाल
- ख़ुद सुंदर ने गंभीर के सपोर्ट की तारीफ़ की, लेकिन 'सपोर्ट' और 'डायरेक्शन' में फ़र्क स्पष्ट है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वॉशिंगटन सुंदर का टीम इंडिया में रोल क्या है?
गंभीर की कोचिंग में सुंदर को कभी निचले क्रम का बल्लेबाज़, कभी पावरप्ले ऑफ़-स्पिनर, कभी बैकअप विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया गया है। एक स्पष्ट, तय भूमिका अभी तक परिभाषित नहीं हुई है।
गौतम गंभीर की कोचिंग में ऑलराउंडरों के साथ क्या समस्या है?
गंभीर 'फ्लेक्सिबिलिटी' पर ज़ोर देते हैं जिसके चलते अश्विन, जडेजा और सुंदर — तीनों की भूमिकाएँ हर सीरीज़ में बदलती रहीं। रवि अश्विन ने ख़ुद कहा कि नई मैनेजमेंट के बाद रोल क्लैरिटी ख़त्म हुई।
क्या वॉशिंगटन सुंदर ने गंभीर की तारीफ़ की है?
हाँ, सुंदर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर को अपनी बैटिंग सुधारने का क्रेडिट दिया। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि व्यक्तिगत सपोर्ट और टीम में स्पष्ट रोल देना दो अलग बातें हैं।
अजित आगरकर की चयन नीति पर क्या आरोप हैं?
कई क्रिकेट विश्लेषकों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने आगरकर पर 'सिलेक्शन पॉलिटिक्स' का आरोप लगाया है, ख़ासकर श्रेयस अय्यर को सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट से हटाने के फ़ैसले को लेकर।