सोनम वांगचुक 17 दिन से भूखे — दिल्ली को डर लद्दाख का नहीं, लिथियम और कश्मीर डोमिनो का है?
सोनम वांगचुक की 17 दिन की भूख हड़ताल पर केंद्र की चुप्पी दो अघोषित कारणों से है — लद्दाख को छठी अनुसूची देने से कश्मीर-हिमाचल-उत्तराखंड में समान मांगें उठने का डर, और लद्दाख के अरबों डॉलर के लिथियम भंडारों पर कॉर्पोरेट दावों में संवैधानिक अड़चन खड़ी होने की आशंका।
सात किलो वज़न कम हो चुका है। होंठ सूखे हैं, आँखें धँसी हैं, लेकिन आवाज़ में वही ठंडी कठोरता है जो लद्दाख की हवा में होती है। सोनम वांगचुक — जिन्हें मीडिया 'लद्दाख का गांधी' कहता है — जंतर मंतर पर 17वें दिन भी बैठे हैं, और उनका एक ही सवाल है: 'सरकार से पूछिए कि वो सुनने से क्यों इनकार कर रही है।' हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वांगचुक ने अनशन ख़त्म करने से साफ़ इनकार कर दिया है, और उनकी सेहत तेज़ी से गिर रही है।
लेकिन असली सवाल यह नहीं कि वांगचुक कब तक टिकेंगे। असली सवाल यह है: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने ही एक नागरिक को मरने के क़रीब पहुँचने दे रहा है — और बात भी नहीं कर रहा। इसके पीछे की वजह न तो संविधानिक जटिलता है, न प्रशासनिक अड़चन। इंडिया हेराल्ड ने पहले ही विश्लेषण किया था कि यह चुप्पी कितनी गहरी है — अब उसकी जड़ों को और गहरा खोदने का वक़्त है।
माँग क्या है — और इतनी 'ख़तरनाक' क्यों?
वांगचुक दो बातें माँग रहे हैं: लद्दाख को छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत लाना, जिससे जनजातीय आबादी को अपनी ज़मीन, संस्कृति और प्रशासन पर अधिकार मिले; और लद्दाख के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा, यानी अपनी विधानसभा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो वादा था कि स्वायत्तता आएगी। छह साल बीत गए — न विधानसभा मिली, न संवैधानिक सुरक्षा।
ऊपर से देखें तो यह लगता है कि सरकार बस 'व्यस्त' है या 'विचाराधीन' रख रही है। लेकिन सियासी गलियारों में फुसफुसाहट कुछ और कहती है।
पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे का असली खेल
डोमिनो इफ़ेक्ट का भूत: दिल्ली दरबार में जो बात खुलकर कोई नहीं कहता, वह यह है कि लद्दाख को छठी अनुसूची देने का मतलब सिर्फ़ एक क्षेत्र का फ़ैसला नहीं है। यह एक 'कश्मीर डोमिनो' खड़ा करता है। अगर लद्दाख को जनजातीय स्वायत्तता मिली, तो कश्मीर घाटी के गुज्जर-बकरवाल समुदाय तुरंत वही माँगेंगे। उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र, हिमाचल के लाहौल-स्पीति — सब कतार में लग जाएँगे। केंद्र जानता है कि संविधान के इस दरवाज़े को एक बार खोला तो बंद करना मुश्किल होगा। (यह इंडस्ट्री/सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट सरकारी स्थिति नहीं।)
लिथियम कनेक्शन — अरबों डॉलर की चुप्पी: 2023 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने लद्दाख के रियासी ज़िले में 59 लाख टन लिथियम के भंडार की पुष्टि की थी — भारत का अब तक का सबसे बड़ा लिथियम रिज़र्व। यह वही लिथियम है जो इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी स्टोरेज और भारत के ग्रीन एनर्जी सपने की रीढ़ है। अब सोचिए — अगर छठी अनुसूची लागू हो गई, तो जनजातीय परिषदों को ज़मीन पर वीटो मिलेगा। कोई भी खनन लाइसेंस स्थानीय सहमति के बिना नहीं मिलेगा। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि बड़े कॉर्पोरेट घराने जो लिथियम खनन में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह 'स्वायत्तता' सबसे बड़ी अड़चन बनेगी।
इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यही है कि दिल्ली की चुप्पी न 'लापरवाही' है, न 'प्रशासनिक देरी' — यह एक जानबूझकर की गई रणनीतिक चुप्पी है, जिसमें कश्मीर-प्रीसिडेंट का डर और कॉर्पोरेट-मिनरल लॉबी की दिलचस्पी दोनों आपस में गुँथे हुए हैं।
समर्थन की बाढ़ — लेकिन सरकार पर असर कितना?
इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि वांगचुक का वज़न 7 किलो से अधिक गिर चुका है और डॉक्टर चिंतित हैं। जंतर मंतर पर छात्र कार्यकर्ताओं ने समानांतर अनशन शुरू किया है — हिंदुस्तान टाइम्स अनुसार। अभिनेत्री शबाना आज़मी ने इंडिया टुडे को बताया, 'भारत को आपकी ज़रूरत है,' और वांगचुक से अनशन ख़त्म करने की अपील की। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, अभिनेता ओमी वैद्य और ज़ीनत अमान ने भी खुला समर्थन दिया। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि अरुंधति रॉय से लेकर महुआ मोइत्रा तक, कई विपक्षी नेताओं ने वांगचुक के साथ एकजुटता दिखाई — जबकि अरविंद केजरीवाल ने भी सार्वजनिक समर्थन दिया।
लेकिन यहीं एक और परत है जो BJP के कैलकुलेशन को समझने के लिए ज़रूरी है। जैसे ही विपक्षी चेहरे जुड़ते हैं, सत्ता पक्ष के लिए नैरेटिव बदलना आसान हो जाता है — 'यह लद्दाख का आंदोलन नहीं, विपक्ष का टूलकिट है।' सियासी गलियारों में यही रणनीति चर्चा में है: वांगचुक की माँग को उसकी ज़मीनी वैधता से काटकर 'राजनीतिक षड्यंत्र' का रंग देना। यह ठीक वही फ़ॉर्मूला है जो किसान आंदोलन में आज़माया गया था।
आगे क्या — और दिल्ली कब तक टालेगी?
आने वाले दिनों में तीन चीज़ें देखने लायक हैं। पहला: अगर वांगचुक की सेहत और बिगड़ी, तो सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले सकता है — जैसा अतीत में इरोम शर्मिला के मामले में हुआ। दूसरा: विपक्ष इसे मानसून सत्र में संसद के फ़र्श पर ले जाने की तैयारी में है — अगर ऐसा हुआ, तो सरकार को कम से कम औपचारिक जवाब देना पड़ेगा। तीसरा: लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) के चुनाव आने वाले हैं — और अगर इस मुद्दे ने ज़मीनी आकार लिया, तो BJP का लद्दाख में वोट बेस सीधे दबाव में आएगा।
सवाल अब सिर्फ़ वांगचुक के शरीर की ताक़त का नहीं है। सवाल यह है: क्या दिल्ली के दरबार में बैठे लोग एक 58 साल के इंजीनियर को इसलिए मरने देंगे क्योंकि उसकी माँग मान लेने से कॉर्पोरेट बैलेंस शीट पर सवाल उठेंगे और पड़ोसी राज्यों में संवैधानिक 'संक्रमण' फैलेगा? जवाब जो भी हो — यह भारत के लोकतंत्र की उस परीक्षा का दिन है जो किसी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाई जाती।
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों से लिए गए हैं और जब तक कोई अदालत फ़ैसला न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- लद्दाख को छठी अनुसूची देने से कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल में 'डोमिनो इफ़ेक्ट' का डर — दिल्ली की चुप्पी का सबसे बड़ा अघोषित कारण।
- 59 लाख टन लिथियम रिज़र्व — जनजातीय स्वायत्तता मिलने पर कॉर्पोरेट खनन को स्थानीय वीटो का सामना करना होगा।
- विपक्षी समर्थन BJP को 'टूलकिट' नैरेटिव का मौक़ा देता है — ठीक किसान आंदोलन वाला फ़ॉर्मूला।
- LAHDC चुनाव नज़दीक — ज़मीनी दबाव बढ़ने पर BJP का लद्दाख वोट बेस ख़तरे में।
आँकड़ों में
- सोनम वांगचुक का वज़न 17 दिन में 7 किलो से अधिक घटा — इंडिया टुडे
- लद्दाख में 59 लाख टन लिथियम भंडार — जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (2023)
- 2019 से 6 साल बीते — लद्दाख को न विधानसभा मिली, न छठी अनुसूची
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: लद्दाखी जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा माँग रहे हैं।
- क्या: जंतर मंतर पर 17 दिन से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी; वज़न 7 किलो से अधिक घटा — हिंदुस्तान टाइम्स अनुसार।
- कब: जून 2026, हड़ताल का 17वाँ दिन — इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट।
- कहाँ: दिल्ली का जंतर मंतर; छात्र कार्यकर्ता समानांतर अनशन पर — हिंदुस्तान टाइम्स।
- क्यों: 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को कोई विधानसभा, कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिली; जनजातीय ज़मीन और रोज़गार खतरे में।
- कैसे: वांगचुक ने दिल्ली मार्च, उपवास और राजनीतिक गठबंधन बनाकर दबाव बढ़ाया; केंद्र ने अब तक कोई औपचारिक वार्ता प्रस्ताव नहीं रखा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल की मुख्य माँगें क्या हैं?
वांगचुक लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत लाने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग कर रहे हैं, जिससे जनजातीय आबादी को ज़मीन, रोज़गार और स्वशासन का अधिकार मिले। इंडियन एक्सप्रेस अनुसार यह माँग 2019 से लंबित है।
लद्दाख में लिथियम का भूख हड़ताल से क्या संबंध है?
2023 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने लद्दाख में 59 लाख टन लिथियम भंडार की पुष्टि की। अगर छठी अनुसूची लागू हो, तो जनजातीय परिषदों को ज़मीन पर वीटो मिलेगा — जिससे कॉर्पोरेट खनन प्रभावित होगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह केंद्र की चुप्पी का एक बड़ा अघोषित कारण है।
केंद्र सरकार ने वांगचुक की माँगों पर क्या जवाब दिया है?
अब तक कोई औपचारिक वार्ता प्रस्ताव सामने नहीं आया है। हिंदुस्तान टाइम्स अनुसार वांगचुक ने कहा, 'सरकार से पूछिए कि वो सुनने से क्यों इनकार कर रही है।' केंद्र की ओर से इस विषय पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।