सोनम वांगचुक का 23वाँ दिन और घटता वज़न — 'शांत लद्दाख' की फ़ाइल से दिल्ली क्यों भाग रही है?
सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर अनशन 23वें दिन भी जारी है, वज़न 6 किलो घटा, तबीयत बिगड़ी। आज तक के अनुसार CJP और कई दलों ने समर्थन दिया। लद्दाख को सिक्स्थ शेड्यूल में शामिल करने की माँग केंद्र के लिए कूटनीतिक-सामरिक उलझन बन गई है।
छह किलो वज़न। यह किसी डाइट प्लान की उपलब्धि नहीं, यह एक 58 साल के आदमी के शरीर की क़ीमत है जो 23 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूखा बैठा है — सिर्फ़ इसलिए कि उसके लद्दाख की फ़ाइल पर दिल्ली की किसी कुर्सी ने कलम नहीं उठाई। आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक़ सोनम वांगचुक की तबीयत लगातार बिगड़ रही है, ऑक्सीजन लेवल चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है, और CJP का प्रदर्शन अब 23वें दिन में दाख़िल हो चुका है।
लेकिन असली सवाल यह नहीं कि वांगचुक कितने दिन और टिकेंगे। असली सवाल यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सरकार एक शांतिप्रिय, गांधीवादी विरोध पर चुप्पी क्यों साधे बैठी है — जबकि लद्दाख की सामरिक अहमियत का ज़िक्र वही सरकार चीन के ख़िलाफ़ हर फ़ोरम पर करती है।
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सिक्स्थ शेड्यूल: वो ताला जिसकी चाबी दिल्ली को असहज करती है
संविधान की छठी अनुसूची — यानी सिक्स्थ शेड्यूल — मूलतः पूर्वोत्तर के जनजातीय इलाक़ों के लिए बनाया गया था। मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा और असम के कुछ हिस्सों में यह लागू है। इसके तहत स्वायत्त ज़िला परिषदें बनती हैं जिन्हें ज़मीन, जंगल और स्थानीय संस्कृति पर विधायी अधिकार मिलता है। लद्दाख की माँग यही है: कि उसकी 2.74 लाख की छोटी-सी आबादी को अपनी ज़मीन, नौकरियों और पर्यावरण पर वो सुरक्षा मिले जो अनुच्छेद 370 के दौर में मौजूद थी।
2019 में जब अनुच्छेद 370 हटा और जम्मू-कश्मीर का बँटवारा हुआ, तो लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया — बिना विधानसभा के। उस वक़्त लद्दाखियों ने जश्न मनाया था। लेकिन पाँच साल बाद तस्वीर पलट गई: कोई विधानसभा नहीं, कोई जनजातीय संरक्षण नहीं, और बाहरी कंपनियों-ठेकेदारों के आने से ज़मीन और रोज़गार पर ख़तरे का डर गहरा हो गया।
चीन वाला एंगल — दिल्ली की असली चुप्पी यहाँ छिपी है
लद्दाख सिर्फ़ बर्फ़ीले पहाड़ों और पैंगॉन्ग झील की सेल्फ़ियों का नाम नहीं। यह वो ज़मीन है जहाँ LAC पर चीन से आँख-में-आँख डालकर भारतीय सेना खड़ी है। गलवान, देपसांग, डेमचोक — ये नाम किसी को याद दिलाने की ज़रूरत नहीं। और ठीक यही वजह है कि दिल्ली सिक्स्थ शेड्यूल पर ख़ामोश है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है: केंद्र को डर है कि स्वायत्त ज़िला परिषद को ज़मीन पर वीटो मिला तो सीमावर्ती इलाक़ों में सेना की ज़मीन-अधिग्रहण क्षमता, सड़क निर्माण और रणनीतिक इंफ़्रास्ट्रक्चर धीमा हो सकता है। यानी लद्दाख की लोकतांत्रिक माँग और भारत की सामरिक ज़रूरत के बीच एक ऐसी टकराहट है जिसे कोई मंत्री माइक पर बोलने को तैयार नहीं।
विपक्ष का सहानुभूति-कार्ड, और सत्ता की गणित
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार कई विपक्षी नेताओं ने वांगचुक से मुलाक़ात कर समर्थन दिया है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त देखें: लद्दाख लोकसभा की एक सीट है। जनसंख्या इतनी कम कि कोई भी राष्ट्रीय दल इसे चुनावी तौर पर 'ज़रूरी' नहीं मानता। विपक्ष के लिए यह एक सस्ता नैतिक मंच है — कैमरे के सामने सहानुभूति, कोई राजनीतिक लागत नहीं। और सत्तापक्ष के लिए? चुप रहना सबसे सुरक्षित दाँव — क्योंकि 'हाँ' बोलने से सामरिक उलझन, और 'ना' बोलने से गांधीवादी प्रतिरोध पर बल-प्रयोग का 'ऑप्टिक्स'।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फ़ुसफ़ुसाहट यह है कि गृह मंत्रालय ने लद्दाख पर एक कमेटी बनाई तो थी, लेकिन उसकी सिफ़ारिशें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। कारण? ट्रेड हलकों में चर्चा है कि रक्षा मंत्रालय ने सिक्स्थ शेड्यूल लागू करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई — विशेषकर सीमावर्ती ज़मीन-अधिग्रहण के संदर्भ में। एक वरिष्ठ नौकरशाह से जुड़ी चर्चा यह भी है कि केंद्र एक 'हल्का संस्करण' — जैसे कि बोडो टेरिटोरियल काउंसिल मॉडल — पर विचार कर रहा है, जिसमें ज़मीन-अधिकार सीमित रहें लेकिन सांस्कृतिक स्वायत्तता मिले। हालाँकि सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है।
(यह खंड सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
आगे क्या? — वो तीन बिंदु जो अगले हफ़्ते तय करेंगे
पहला: वांगचुक की सेहत अगर और गिरी, तो सरकार को जबरन अस्पताल ले जाने या बातचीत शुरू करने में से एक चुनना होगा — दोनों की राजनीतिक क़ीमत भारी है। दूसरा: अगर विपक्ष ने इसे संसद तक खींचा — और गर्मियों का सत्र क़रीब है — तो सरकार को सदन में जवाब देना पड़ेगा जहाँ अब तक वह सफलतापूर्वक इस मसले को टालती आई है। तीसरा: LAC पर कोई भी नई चीनी हलचल इस पूरी बहस को 'राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम स्थानीय अधिकार' के ध्रुवीकरण में बदल सकती है।
एक आदमी 23 दिनों से भूखा बैठा है — उसकी माँग न अलगाववादी है, न हिंसक, न असंवैधानिक। वो बस यह कह रहा है कि जो सुरक्षा मेघालय और मिज़ोरम को मिली है, वो लद्दाख को भी मिले। दिल्ली का जवाब? एक ठंडी, बेआवाज़ चुप्पी। सवाल यह है: जिस लद्दाख के नाम पर सरकार चीन से टकराती है, उसी लद्दाख के लोगों से बात करने में इतनी हिचक क्यों?
आरोपों और मांगों पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है।
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप और मांगें नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक अदालत का निर्णय न हो, अप्रमाणित मानी जाएँगी; न्यायालय के अधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- सोनम वांगचुक का अनशन 23वें दिन पहुँचा, 6 किलो वज़न घटा — आज तक की रिपोर्ट के अनुसार तबीयत चिंताजनक
- लद्दाख सिक्स्थ शेड्यूल की माँग मूलतः जनजातीय ज़मीन-संरक्षण का संवैधानिक अधिकार है जो 370 हटने के बाद छिना
- दिल्ली की चुप्पी का मूल कारण सामरिक है — LAC पर सेना के ज़मीन-अधिग्रहण में स्वायत्त परिषद से अड़चन का डर
- विपक्ष का समर्थन नैतिक मंच है लेकिन लद्दाख की एक लोकसभा सीट किसी दल के लिए चुनावी रूप से निर्णायक नहीं
- अगला मोड़: वांगचुक की सेहत, संसद सत्र और LAC पर चीनी हलचल — तीनों में से कोई भी समीकरण पलट सकता है
आँकड़ों में
- सोनम वांगचुक का वज़न 23 दिनों में 6 किलो घटा — आज तक
- लद्दाख की आबादी लगभग 2.74 लाख — सबसे कम जनसंख्या वाले केंद्र शासित प्रदेशों में
- 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाखी नेता सोनम वांगचुक, CJP (कॉकरोच जनता पार्टी/सिटिज़न्स जॉइंट पार्टी) और विपक्षी नेता
- क्या: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (सिक्स्थ शेड्यूल) में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग पर अनिश्चितकालीन अनशन — जो 23वें दिन में प्रवेश कर गया
- कब: अनशन 23वें दिन जारी — आज तक की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार
- कहाँ: नई दिल्ली का जंतर-मंतर, जो लद्दाख से करीब 1,000 किलोमीटर दूर है
- क्यों: 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को विधानसभा, भूमि-संरक्षण और जनजातीय स्वायत्तता का कोई वैधानिक ढाँचा नहीं मिला; स्थानीय आबादी को ज़मीन-रोज़गार छिनने का डर है
- कैसे: वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे हैं, CJP ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी रखा, कई विपक्षी नेताओं ने मुलाक़ात और सार्वजनिक समर्थन दिया — आज तक के अनुसार
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सिक्स्थ शेड्यूल क्या है और लद्दाख इसकी माँग क्यों कर रहा है?
संविधान की छठी अनुसूची जनजातीय इलाक़ों को स्वायत्त ज़िला परिषदें देती है जिन्हें ज़मीन, जंगल और संस्कृति पर विधायी अधिकार मिलता है। लद्दाख चाहता है कि 370 हटने से गई भूमि-सुरक्षा इस रास्ते वापस मिले।
सोनम वांगचुक कितने दिनों से अनशन पर हैं और उनकी सेहत कैसी है?
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार वांगचुक 23वें दिन अनशन पर हैं, उनका वज़न 6 किलो घट चुका है और ऑक्सीजन लेवल गिर रहा है।
केंद्र सरकार लद्दाख को सिक्स्थ शेड्यूल में शामिल क्यों नहीं कर रही?
विश्लेषकों के अनुसार केंद्र को डर है कि स्वायत्त परिषद LAC पर सेना के ज़मीन-अधिग्रहण और इंफ़्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अड़चन बन सकती है — यह एक सामरिक दुविधा है।
क्या विपक्ष ने सोनम वांगचुक का समर्थन किया है?
हाँ, आज तक के अनुसार कई विपक्षी नेताओं ने जंतर-मंतर पर वांगचुक से मिलकर समर्थन दिया है, हालाँकि लद्दाख की एक लोकसभा सीट के कारण इसकी चुनावी लागत सीमित है।