अंतरिक्ष में 'बम' रखने की होड़ फिर शुरू — ISRO शांति पर है, पर मोदी को 'स्पेस शील्ड' क्यों चाहिए?
1967 की Outer Space Treaty अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने पर रोक लगाती है, लेकिन चीन-रूस-अमेरिका पारंपरिक अंतरिक्ष हथियारों पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत का ISRO शांतिपूर्ण मिशनों पर केंद्रित है, मगर बदलती भू-राजनीति मोदी सरकार को 'स्पेस डिफेंस' पॉलिसी पर स्पष्ट रुख लेने को मजबूर कर रही है।
एक संधि — 1967 में लिखी गई, जब इंसान ने चाँद पर पैर भी नहीं रखा था — आज पूरी दुनिया की अंतरिक्ष सुरक्षा की बुनियाद है। Outer Space Treaty, जिस पर भारत समेत 114 देशों के दस्तख़त हैं, अंतरिक्ष में परमाणु हथियार तैनात करने पर रोक लगाती है। लेकिन यहाँ एक छेद है — और उस छेद से तीन महाशक्तियाँ अपनी मिसाइलें घुसा रही हैं।
द हिंदू की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष नीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि यह संधि 'पारंपरिक' हथियारों — यानी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल, किनेटिक-किल व्हीकल, लेज़र ब्लाइंडर्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर सिस्टम — पर चुप है। और इसी चुप्पी का फ़ायदा उठाकर चीन, रूस और अमेरिका ने ऑर्बिट को एक नया युद्धक्षेत्र बना दिया है।
ज़रा आँकड़ों पर नज़र डालिए: अमेरिका की Space Force का सालाना बजट 2026 में 30 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.5 लाख करोड़) को पार कर गया — यह ISRO के पूरे बजट का लगभग 18 गुना है। चीन की PLA Strategic Support Force ने पिछले पाँच वर्षों में 50 से अधिक सैन्य-ग्रेड सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनमें कई की क्षमता दूसरे देशों के उपग्रहों को निष्क्रिय करने की मानी जाती है। रूस ने 2021 में अपने ही पुराने सैटेलाइट को ASAT मिसाइल से उड़ाकर एक सीधा संदेश दिया — 'हम तैयार हैं।'
और भारत? भारत ने 2019 में Mission Shakti के ज़रिए अपनी ASAT क्षमता साबित की थी — 300 किलोमीटर ऊँचाई पर एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराकर। उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'अंतरिक्ष महाशक्ति' बनने का ऐलान बताया। लेकिन उसके बाद? सात साल बीत गए, और भारत ने न तो कोई स्पेस डिफेंस कमांड बनाया, न कोई स्पष्ट अंतरिक्ष सैन्य सिद्धांत (स्पेस डॉक्ट्रिन) सार्वजनिक किया।
पॉलिटिकल पल्स
दिल्ली के रक्षा गलियारों में इन दिनों एक दिलचस्प फुसफुसाहट है। सूत्रों के मुताबिक़ Defence Space Agency (DSA), जो 2019 में बनाई गई थी, को पूर्ण Defence Space Command में अपग्रेड करने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय के भीतर कई बार घूम चुका है — लेकिन हर बार विदेश मंत्रालय की 'शांतिपूर्ण अंतरिक्ष उपयोग' वाली लाइन से टकराकर रुक जाता है। एक वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक की टिप्पणी थी — "ISRO की छवि 'मंगलयान' वाली है, उस पर 'मिसाइल' का ठप्पा लगाना कोई मंत्री अपने सिर नहीं लेना चाहता।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन सच्चाई यह है कि LAC पर चीन के सैटेलाइट-आधारित निगरानी तंत्र ने भारतीय सेना की ज़मीनी तैनाती को बेहद पारदर्शी बना दिया है। भारत के पास फ़िलहाल सीमित इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) सैटेलाइट हैं, और कोई ज्ञात 'स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस' (SSA) नेटवर्क नहीं है जो वास्तविक समय में दुश्मन के ऑर्बिटल एसेट्स को ट्रैक कर सके। द हिंदू ने इस विषय पर लिखा है कि भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं में नागरिक और सैन्य उपयोग के बीच की दीवार अब टिकाऊ नहीं रही।
संधि की कमज़ोरी — और मोदी की दुविधा
Outer Space Treaty का अनुच्छेद IV कहता है कि चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों का उपयोग 'केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों' के लिए होगा, और कोई भी देश अंतरिक्ष में 'सामूहिक विनाश के हथियार' नहीं रखेगा। लेकिन 'पारंपरिक हथियार' — जैसे एंटी-सैटेलाइट मिसाइल, को-ऑर्बिटल किलर, या इलेक्ट्रॉनिक जैमर — इस दायरे में नहीं आते। यह वही ग्रे ज़ोन है जिसमें चीन ने 2007 में अपना पहला ASAT परीक्षण किया और अमेरिका ने 2008 में।
मोदी सरकार की दुविधा साफ़ है: एक तरफ़ भारत UN Committee on the Peaceful Uses of Outer Space (COPUOS) में सक्रिय है और हमेशा 'शांतिपूर्ण उपयोग' की वकालत करता रहा है। दूसरी तरफ़, 2020 के गलवान संकट के बाद से चीन के साथ सैन्य तनाव ने एक कड़वी सच्चाई सामने रखी है — अगर आपके पास अंतरिक्ष में अपने उपग्रहों की रक्षा करने की क्षमता नहीं है, तो ज़मीन पर आपकी पूरी सैन्य कम्युनिकेशन चेन एक झटके में तबाह हो सकती है।
इस बिसात को इंडिया हेराल्ड का रीड गहराई से पकड़ता है: मोदी सरकार का असली कैलकुलेशन चुनावी नहीं, रणनीतिक है। 2024 के आम चुनाव जीतने के बाद तीसरे कार्यकाल में सरकार के पास वह राजनीतिक पूँजी है जो Mission Shakti के बाद ख़र्च नहीं की गई। अगर कभी Defence Space Command की औपचारिक घोषणा होनी है, तो 2026-27 का यह विंडो सबसे उपयुक्त है — 2029 के चुनावों से पर्याप्त दूर, और चीन के बढ़ते ख़तरे के चलते विपक्ष के लिए विरोध करना कठिन।
आगे क्या — कौन सी चाल चलेगा भारत?
कई संकेत एक दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं। पहला: ISRO और DRDO के बीच 'डुअल-यूज़ टेक्नोलॉजी' पर सहयोग बढ़ा है — ख़ासकर हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल और रीयूज़ेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) जैसी परियोजनाओं में, जिनका सैन्य उपयोग स्पष्ट है। दूसरा: भारत ने हाल ही में अमेरिका के साथ Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA) के तहत भू-स्थानिक ख़ुफ़िया डेटा साझा करने की व्यवस्था को मज़बूत किया है — यह सीधे तौर पर अंतरिक्ष-आधारित सैन्य निगरानी से जुड़ा है।
तीसरा और सबसे अहम: भारत ने अभी तक चीन-रूस समर्थित 'Prevention of an Arms Race in Outer Space' (PAROS) प्रस्ताव पर स्पष्ट रुख नहीं लिया है — न पूरी तरह समर्थन, न विरोध। यह कूटनीतिक उभयपक्षीयता जानबूझकर है — भारत अपने विकल्प खुले रख रहा है।
लेकिन विकल्प खुले रखने की भी एक सीमा होती है। जिस रफ़्तार से चीन LEO (लो अर्थ ऑर्बिट) में अपना सैटेलाइट-कॉन्स्टेलेशन खड़ा कर रहा है, भारत के पास 'प्रतीक्षा और निगरानी' (wait and watch) की रणनीति के लिए बहुत कम समय बचा है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अगले दो-तीन वर्षों में भारत को या तो अपना SSA नेटवर्क खड़ा करना होगा, या किसी बहुपक्षीय गठबंधन — जैसे Quad के अंतरिक्ष सहयोग ढाँचे — में शामिल होकर यह क्षमता हासिल करनी होगी।
असली सवाल यह नहीं है कि भारत अंतरिक्ष में हथियार रखेगा या नहीं — असली सवाल यह है कि जब बाक़ी सब रख चुके होंगे, तो भारत की शांतिपूर्ण छवि उसकी ढाल बनेगी या बेड़ी?
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मुख्य बातें
- 1967 की Outer Space Treaty अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों पर रोक लगाती है, लेकिन पारंपरिक सैन्य हथियारों पर मौन है — यही 'ग्रे ज़ोन' आज की अंतरिक्ष हथियार होड़ की जड़ है
- अमेरिका की Space Force का बजट ISRO के बजट से लगभग 18 गुना है — यह अंतर भारत की अंतरिक्ष सुरक्षा चुनौती को रेखांकित करता है
- भारत ने 2019 में Mission Shakti से ASAT क्षमता साबित की, पर सात साल बाद भी कोई स्पष्ट स्पेस डिफेंस डॉक्ट्रिन सार्वजनिक नहीं
- मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का 2026-27 का विंडो Defence Space Command की घोषणा के लिए राजनीतिक रूप से सबसे अनुकूल समय हो सकता है
- भारत अभी तक चीन-रूस समर्थित PAROS प्रस्ताव पर स्पष्ट रुख से बचा है — कूटनीतिक लचीलापन बनाए रखने के लिए
आँकड़ों में
- अमेरिका की Space Force का 2026 बजट 30 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.5 लाख करोड़) को पार — ISRO के बजट का लगभग 18 गुना
- चीन की PLA Strategic Support Force ने पिछले 5 वर्षों में 50 से अधिक सैन्य-ग्रेड सैटेलाइट लॉन्च किए
- Outer Space Treaty पर 114 देशों के हस्ताक्षर, लेकिन पारंपरिक अंतरिक्ष हथियारों पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं
- भारत का Mission Shakti ASAT परीक्षण 2019 में 300 किमी ऊँचाई पर सफल — लेकिन उसके बाद कोई सार्वजनिक स्पेस डिफेंस डॉक्ट्रिन नहीं
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत सरकार, ISRO, रक्षा मंत्रालय, और प्रतिद्वंद्वी अंतरिक्ष शक्तियाँ — चीन (PLA Strategic Support Force), रूस और अमेरिका (US Space Force)
- क्या: 1967 की Outer Space Treaty के ढाँचे के बावजूद अंतरिक्ष में सैन्य हथियारों की होड़ तेज़ हो रही है, जिससे भारत पर 'स्पेस डिफेंस' नीति बनाने का दबाव बढ़ा
- कब: 2026 में — जब अमेरिका ने Space Force का बजट बढ़ाया और चीन ने एंटी-सैटेलाइट क्षमताओं का विस्तार किया
- कहाँ: वैश्विक स्तर पर, प्रभाव भारत की LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) और हिंद-प्रशांत रणनीति पर
- क्यों: Outer Space Treaty में पारंपरिक हथियारों पर स्पष्ट रोक नहीं है, इसलिए बड़ी ताकतें इस 'ग्रे ज़ोन' का फ़ायदा उठा रही हैं — द हिंदू के अनुसार भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता
- कैसे: चीन और रूस ने UN में अंतरिक्ष हथियार-रोधी प्रस्ताव का इस्तेमाल रणनीतिक ढाल की तरह किया, जबकि अमेरिका ने Space Force के ज़रिए ऑर्बिटल सैन्य बुनियादी ढाँचा खड़ा किया — भारत 2019 के Mission Shakti ASAT परीक्षण के बाद अभी तक अगला कदम तय नहीं कर पाया
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Outer Space Treaty 1967 क्या है और इसमें क्या प्रतिबंध है?
Outer Space Treaty 1967 एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिस पर भारत समेत 114 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। यह अंतरिक्ष में सामूहिक विनाश के हथियार (परमाणु/जैविक/रासायनिक) रखने पर रोक लगाती है, लेकिन पारंपरिक हथियारों — जैसे एंटी-सैटेलाइट मिसाइल — पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
भारत का Mission Shakti क्या था और उसके बाद क्या हुआ?
Mission Shakti 2019 में भारत का ASAT (एंटी-सैटेलाइट) परीक्षण था, जिसमें 300 किमी ऊँचाई पर एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया गया। इससे भारत चौथा देश बना जिसने यह क्षमता साबित की। हालाँकि, उसके बाद भारत ने कोई स्पष्ट स्पेस डिफेंस कमांड या सार्वजनिक सैन्य अंतरिक्ष सिद्धांत नहीं बनाया।
चीन की अंतरिक्ष सैन्य क्षमता भारत के लिए ख़तरा क्यों है?
चीन की PLA Strategic Support Force ने पिछले पाँच वर्षों में 50 से ज़्यादा सैन्य सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जो LAC पर भारतीय सेना की तैनाती की निगरानी कर सकते हैं। भारत के पास फ़िलहाल सीमित ELINT सैटेलाइट और कोई ज्ञात रियल-टाइम SSA नेटवर्क नहीं है, जिससे सैन्य संचार चेन कमज़ोर रहती है।
क्या भारत अंतरिक्ष में हथियार तैनात करेगा?
अभी तक भारत की आधिकारिक नीति शांतिपूर्ण अंतरिक्ष उपयोग की है। लेकिन ISRO-DRDO का डुअल-यूज़ टेक्नोलॉजी सहयोग, BECA के तहत अमेरिका के साथ भू-स्थानिक डेटा साझाकरण, और PAROS प्रस्ताव पर अस्पष्ट रुख — ये सब संकेत हैं कि भारत अपने विकल्प खुले रख रहा है।