नैनीताल में दो साल से टूटी सड़क, 11 गाँव कटे — 'देवभूमि' में मानसून हर बार क्यों बन जाता है प्रशासन का इम्तिहान?

Singh Anchala

नैनीताल के सात नंबर क्षेत्र में दो साल पहले टूटी सड़क आज तक नहीं बनी, जिससे 11 गाँव पूरी तरह कटे हुए हैं। ताज़ा बारिश ने स्थिति और बिगाड़ दी है। News18 हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया — यह उत्तराखंड के पहाड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यापक विफलता की कहानी है।

ग्यारह गाँव। दो साल। एक टूटी सड़क। और एक प्रशासन जो गहरी नींद में है — यह नैनीताल की कहानी है, लेकिन असल में यह पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर का पोस्टमॉर्टम है। News18 हिंदी की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, नैनीताल ज़िले के सात नंबर क्षेत्र में लगभग दो साल पहले टूटी सड़क आज तक नहीं बनी, और ताज़ा मानसूनी बारिश ने इन 11 गाँवों को फिर से पूरी तरह काट दिया है।

सोचिए — दो साल। 730 दिन। इतने में तो दिल्ली में पूरा फ्लाईओवर खड़ा हो जाता है, लेकिन नैनीताल की पहाड़ियों में एक सड़क की मरम्मत का काम शुरू तक नहीं हुआ। यहाँ के ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ़ सड़क का मसला नहीं — अस्पताल, राशन, स्कूल, बाज़ार, ज़िंदगी की हर बुनियादी ज़रूरत से कटे रहने का मसला है। बच्चों की पढ़ाई छूटी, बीमार बुज़ुर्गों को कंधे पर उठाकर पहाड़ पार करना पड़ा — ये वो ब्योरे हैं जो किसी सरकारी फ़ाइल में नहीं मिलेंगे।

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पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि उत्तराखंड सरकार का सारा इंफ्रा बजट मैदानी और अर्ध-शहरी इलाकों — देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश — की 'स्मार्ट सिटी' चमक-दमक में बह रहा है। पहाड़ी विधानसभा क्षेत्रों के विधायक दिल्ली और देहरादून के दरबारों में 'लॉबिंग' करते थकते हैं, लेकिन बजट आवंटन में पहाड़ हमेशा पीछे छूट जाता है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि नैनीताल ज़िले को 'टूरिस्ट डेस्टिनेशन' के तमगे तो मिलते हैं, मगर टूरिज़्म से कमाई गई राशि स्थानीय सड़कों पर कभी नहीं लौटती। एक स्थानीय नेता के हवाले से कहा जाता है — "हम वोट के वक़्त याद आते हैं, सड़क के वक़्त भूल जाते हैं।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और स्थानीय राजनीतिक हलकों की अपुष्ट बातों पर आधारित है।)

यह बात सिर्फ़ नैनीताल की नहीं — पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, हर पहाड़ी ज़िले की यही तस्वीर है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की पिछली रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में हर मानसून में औसतन 200 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं, लेकिन मरम्मत का बजट और गति कभी इस पैमाने से मेल नहीं खाती। 2013 की केदारनाथ त्रासदी से लेकर 2021 की चमोली आपदा और 2023 की सिल्क्यारा सुरंग दुर्घटना तक — हर बार सबक लिए जाने की बात हुई, हर बार अगले मानसून ने दिखा दिया कि सबक फ़ाइलों में ही दफ़न रह गए।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इसके पीछे उत्तराखंड की राजनीतिक गणित की एक गहरी संरचनात्मक खामी है। उत्तराखंड विधानसभा की 70 सीटों में 40 से अधिक मैदानी या अर्ध-मैदानी क्षेत्रों में हैं — चुनावी अंकगणित बताता है कि सरकार बनाने के लिए पहाड़ की सीटों की ज़रूरत तो है, लेकिन बहुमत का गणित मैदान में बनता है। नतीजा? पहाड़ी क्षेत्रों के लिए बजट आवंटन हमेशा प्राथमिकता सूची में नीचे खिसकता रहता है। चुनाव से पहले घोषणाएँ होती हैं, चुनाव के बाद फ़ाइलें ठंडी पड़ जाती हैं। यह भाजपा हो या कांग्रेस — दोनों सरकारों का पैटर्न एक जैसा रहा है।

अब सवाल यह है — 'स्मार्ट सिटी' की बात करने वाली उत्तराखंड सरकार क्या पहाड़ों को 'स्मार्ट' नहीं मानती? देहरादून और हरिद्वार में चौड़ी सड़कें और रोपवे प्रोजेक्ट्स की घोषणाएँ होती हैं, लेकिन नैनीताल के सात नंबर जैसे इलाकों में दो साल से एक पुलिया तक नहीं बन पाती। NDMA के ही दिशा-निर्देश कहते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में 'डिज़ास्टर-रेज़िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर' — यानी आपदा-सहनशील सड़कें, ड्रेनेज सिस्टम, रिटेनिंग वॉल — का निर्माण अनिवार्य है। लेकिन ज़मीन पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ी सड़कें वही पुरानी तकनीक से बनती हैं जो पहली बारिश में बह जाती हैं।

एक और आँकड़ा जो आँखें खोलता है — उत्तराखंड सरकार के अपने बजट दस्तावेज़ों के अनुसार राज्य में सड़क निर्माण और मरम्मत पर आवंटित बजट का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर ख़र्च होता है। ग्रामीण और आंतरिक सड़कें प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के भरोसे छोड़ दी जाती हैं, जिसकी अपनी बजट सीमाएँ और ठेकेदारी की जटिलताएँ हैं। नतीजा — गाँव कटते रहते हैं, ग्रामीण पलायन बढ़ता रहता है, और 'देवभूमि' का तमगा सिर्फ़ चुनावी भाषणों में चमकता है।

आगे क्या होगा? 2027 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव हैं। अगर भाजपा सरकार ने आने वाले एक साल में पहाड़ी इंफ्रा पर कोई बड़ा और दिखने वाला कदम नहीं उठाया, तो पहाड़ी सीटों पर एंटी-इन्कंबेंसी का ज्वार उठना तय है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं — सियासी गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने 'पहाड़ की अनदेखी' को अगले चुनाव का केंद्रीय नैरेटिव बनाने की रणनीति तैयार कर ली है। विधायकों पर दबाव बढ़ेगा, और अगर मानसून 2026 में और नुकसान हुआ तो केंद्र से राहत पैकेज की माँग उठेगी — लेकिन पैकेज से सड़क नहीं बनती, इरादे से बनती है।

नैनीताल के उन 11 गाँवों के लोग किसी पॉलिसी पेपर या बजट स्पीच में नहीं दिखते। वे बस हर मानसून में आसमान की तरफ़ देखते हैं — इस डर से नहीं कि बारिश आएगी, बल्कि इस यक़ीन से कि बारिश के साथ उनकी ज़िंदगी की आख़िरी कड़ी भी टूट जाएगी। सवाल यह नहीं कि सड़क कब बनेगी — सवाल यह है कि क्या 'देवभूमि' में देवताओं के अलावा किसी और की भी सुनवाई है?

आरोप यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक न्यायालय ने निर्णय नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • नैनीताल के सात नंबर क्षेत्र में दो साल से टूटी सड़क से 11 गाँव पूरी तरह कटे — प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया (News18 हिंदी)
  • उत्तराखंड का पहाड़ी इंफ्रा बजट मैदानी शहरों की 'स्मार्ट सिटी' परियोजनाओं में खप रहा है — पहाड़ी ज़िलों की सड़कें PMGSY के भरोसे (बजट दस्तावेज़/NDMA)
  • NDMA रिपोर्ट्स के अनुसार उत्तराखंड में हर मानसून में 200+ सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं — मरम्मत की गति कभी इस पैमाने से मेल नहीं खाती
  • 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पहाड़ी सीटों पर एंटी-इन्कंबेंसी का जोखिम बढ़ रहा है — कांग्रेस 'पहाड़ की अनदेखी' को चुनावी नैरेटिव बना रही है
  • चुनावी अंकगणित: 70 में से 40+ सीटें मैदानी — पहाड़ बहुमत के लिए ज़रूरी पर बजट प्राथमिकता में हमेशा पीछे

आँकड़ों में

  • नैनीताल के सात नंबर क्षेत्र में 11 गाँव दो साल (730+ दिन) से मुख्य सड़क से कटे हुए हैं (News18 हिंदी)
  • NDMA रिपोर्ट्स के अनुसार उत्तराखंड में हर मानसून में औसतन 200 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं
  • उत्तराखंड विधानसभा की 70 सीटों में 40 से अधिक मैदानी/अर्ध-मैदानी क्षेत्रों में हैं — पहाड़ी सीटें अल्पमत में

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: नैनीताल ज़िले के सात नंबर क्षेत्र के 11 गाँवों के हज़ारों निवासी और उत्तराखंड प्रशासन (News18 हिंदी)
  • क्या: दो साल से टूटी सड़क की मरम्मत नहीं होने से 11 गाँव मुख्य शहर से कटे; ताज़ा बारिश ने स्थिति और गंभीर बनाई (News18 हिंदी)
  • कब: सड़क लगभग दो साल पहले टूटी; 2026 के मानसून की ताज़ा बारिश ने संकट बढ़ाया (News18 हिंदी)
  • कहाँ: नैनीताल ज़िला, उत्तराखंड — सात नंबर क्षेत्र (News18 हिंदी)
  • क्यों: प्रशासनिक उदासीनता, पहाड़ी क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर बजट की कमी, और मानसून-प्रूफ सड़क निर्माण तकनीक का अभाव (News18 हिंदी और विश्लेषण)
  • कैसे: भारी बारिश और भूस्खलन से सड़क क्षतिग्रस्त हुई, प्रशासन ने न तो अस्थायी वैकल्पिक मार्ग बनाया न स्थायी मरम्मत कराई, जिससे गाँव लगातार अलग-थलग रहे (News18 हिंदी)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नैनीताल में कौन-सी सड़क टूटी है और कितने गाँव प्रभावित हैं?

नैनीताल ज़िले के सात नंबर क्षेत्र की मुख्य सड़क लगभग दो साल पहले क्षतिग्रस्त हुई, जिससे 11 गाँव पूरी तरह कटे हुए हैं। ताज़ा मानसूनी बारिश ने स्थिति और बिगाड़ दी है (News18 हिंदी)।

उत्तराखंड में हर मानसून में कितनी सड़कें टूटती हैं?

NDMA की रिपोर्ट्स के अनुसार उत्तराखंड में हर मानसून सीज़न में औसतन 200 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं, लेकिन मरम्मत की गति और बजट इस पैमाने से कभी मेल नहीं खाती।

क्या उत्तराखंड सरकार पहाड़ी सड़कों की मरम्मत के लिए कोई विशेष योजना चला रही है?

पहाड़ी ग्रामीण सड़कें मुख्यतः प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत आती हैं। राज्य का अपना सड़क बजट बड़े हिस्से में राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर ख़र्च होता है (उत्तराखंड बजट दस्तावेज़)।

2027 उत्तराखंड चुनाव पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

पहाड़ी सीटों पर एंटी-इन्कंबेंसी बढ़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस 'पहाड़ की अनदेखी' को केंद्रीय चुनावी मुद्दा बना सकती है, जिससे भाजपा पर दबाव बढ़ेगा।

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