महाराष्ट्र का '30 दिन कस्टडी' प्लान — क्या कोई राज्य केंद्रीय क्रिमिनल लॉ को अपनी मर्ज़ी से बदल सकता है?

Raj Harsh

महाराष्ट्र सरकार ने BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) में संशोधन कर प्रिवेंटिव कस्टडी की अवधि 15 से बढ़ाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव रखा है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, क्रिमिनल लॉ Concurrent List का विषय है, इसलिए राज्य संशोधन कर सकता है — लेकिन अनुच्छेद 254 के तहत राष्ट्रपति की मंज़ूरी अनिवार्य है।

पंद्रह दिन। यही वह अवधि है जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) किसी को प्रिवेंटिव कस्टडी में रखने के लिए देती है। अब महाराष्ट्र की महायुति सरकार कह रही है — यह काफ़ी नहीं, हमें 30 दिन चाहिए। सवाल यह नहीं कि 30 दिन ज़्यादा हैं या कम — सवाल यह है कि क्या कोई राज्य सरकार अपनी मर्ज़ी से केंद्रीय क्रिमिनल लॉ की धारा बदल सकती है, और अगर बदल सकती है तो इसकी क़ीमत कौन चुकाएगा।

इंडियन एक्सप्रेस की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ने BNSS की धारा 172 में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया है। धारा 172 वह प्रावधान है जो पुलिस को बिना आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किए किसी व्यक्ति को 'निवारक हिरासत' (प्रिवेंटिव कस्टडी) में रखने की शक्ति देता है। फ़िलहाल BNSS में यह सीमा 15 दिन है — महाराष्ट्र इसे दोगुना करके 30 दिन करना चाहता है।

Concurrent List का गणित — राज्य कर सकता है, पर शर्तें भारी हैं

यहाँ संवैधानिक पेचीदगी शुरू होती है। क्रिमिनल लॉ और क्रिमिनल प्रोसीजर दोनों संविधान की Concurrent List (समवर्ती सूची, सातवीं अनुसूची, सूची-III) के विषय हैं। इसका मतलब सीधा है — राज्य विधानसभा भी इस विषय पर कानून बना सकती है। लेकिन यहीं अनुच्छेद 254 का ताला लगता है। इंडियन एक्सप्रेस बताता है कि अगर राज्य का कानून केंद्रीय कानून से टकराता है, तो अनुच्छेद 254(1) के तहत केंद्रीय कानून प्रभावी रहेगा और राज्य का कानून उस हद तक शून्य (void) हो जाएगा। राज्य के पास एक ही रास्ता है — अनुच्छेद 254(2) — जिसके तहत राज्य विधानसभा से पारित संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलनी ज़रूरी है।

यानी महाराष्ट्र विधानसभा में विधेयक पास हो जाए, तब भी वह तब तक कानून नहीं बनेगा जब तक राष्ट्रपति हस्ताक्षर न करें। और राष्ट्रपति का फ़ैसला व्यवहार में केंद्र सरकार — यानी गृह मंत्रालय — की सिफ़ारिश पर होता है। तो असली सवाल दिल्ली के दरबार में है: क्या केंद्र की BJP सरकार अपने ही गठबंधन साथी महाराष्ट्र को यह ताक़त देगी?

पॉलिटिकल पल्स — शिंदे-फडणवीस का असली टारगेट कौन?

यहीं कहानी राजनीतिक हो जाती है। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि 30 दिन की कस्टडी का निशाना कोई 'आम अपराधी' नहीं, बल्कि चुनाव-बाद के विरोध प्रदर्शन और शहरी आंदोलन हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव गुट) और NCP (शरद पवार गुट) लगातार सड़क पर उतर रहे हैं। प्रिवेंटिव कस्टडी की बढ़ी अवधि पुलिस को यह ताक़त देती है कि किसी भी बड़े प्रदर्शन से पहले संभावित 'ट्रबलमेकर्स' को उठाकर महीने भर के लिए बंद किया जा सके — बिना FIR, बिना चार्जशीट, बिना अदालत में पेशी की जल्दी।

(यह खंड सियासी गलियारों की चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

ट्रेड हलकों और विधि विशेषज्ञों में चर्चा यह भी है कि यह क़दम एक 'सिग्नल पॉलिटिक्स' है — महायुति सरकार केंद्र को दिखाना चाहती है कि वह 'कड़ा शासन' दे सकती है, ठीक वैसे ही जैसे बिहार में नीतीश ने शराबबंदी को अपनी 'सख़्ती की पहचान' बनाया। फडणवीस का गणित साफ़ है — 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले 'लॉ एंड ऑर्डर' का कार्ड खेलना, चाहे इसकी क़ीमत नागरिक स्वतंत्रता चुकाए।

BNSS बनाम राज्य कानून — असली ख़तरा कहाँ है?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट एक अहम बात रेखांकित करती है: BNSS स्वयं पुराने CrPC का उत्तराधिकारी है, और केंद्र सरकार ने 2023-24 में इसे 'आधुनिक और संतुलित' बताकर पेश किया था। अगर महाराष्ट्र उसी कानून की कस्टडी अवधि दोगुनी करता है, तो केंद्र की अपनी विधायी 'लेगेसी' पर सवाल उठता है — कि क्या BNSS की 15 दिन की सीमा अपर्याप्त थी? यह केंद्र सरकार के लिए एक असहज सवाल है।

दूसरा ख़तरा 'डोमिनो इफ़ेक्ट' का है। अगर राष्ट्रपति महाराष्ट्र के संशोधन को मंज़ूरी दे देते हैं, तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान — हर BJP-शासित राज्य इसी रास्ते पर चल सकता है। कुछ राज्य तो 30 से भी आगे जा सकते हैं। इसका मतलब होगा कि एक ही अपराध के लिए देश भर में अलग-अलग कस्टडी नियम — जो 'एक देश, एक कानून' के केंद्र सरकार के अपने नारे के ठीक उलट होगा।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह प्रस्ताव अपनी वर्तमान शक्ल में राष्ट्रपति की मंज़ूरी पाने की संभावना कम रखता है — क्योंकि केंद्र BNSS को अभी 'सेटल' होने देना चाहता है और 'डोमिनो इफ़ेक्ट' का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। लेकिन अगर महाराष्ट्र ने विधानसभा में यह विधेयक पास कर दिया, तो दिल्ली के लिए इसे सीधे ख़ारिज करना भी मुश्किल होगा — क्योंकि फडणवीस उनके अपने आदमी हैं।

आगे क्या — और किस पर नज़र रखें

आने वाले हफ़्तों में तीन चीज़ों पर नज़र रखनी चाहिए: पहला, क्या महाराष्ट्र विधानसभा में यह विधेयक वाकई पेश होता है या सिर्फ़ 'बैलून' उड़ाकर प्रतिक्रिया तोली जा रही है। दूसरा, विपक्ष — ख़ासकर उद्धव ठाकरे और शरद पवार — इस पर कितना तीखा हमला करते हैं; अगर वे इसे 'तानाशाही' का प्रतीक बनाते हैं, तो महायुति को चुनावी नुक़सान हो सकता है। तीसरा, और सबसे अहम — केंद्रीय गृह मंत्रालय की प्रतिक्रिया; अगर अमित शाह चुप रहते हैं, तो समझिए कि दिल्ली इसे धीमी मौत मरने दे रही है।

अंततः यह सवाल सिर्फ़ 15 या 30 दिन का नहीं है। यह सवाल है कि भारत का संघीय ढाँचा क्रिमिनल लॉ में राज्यों को कितनी छूट देगा — और उस छूट का इस्तेमाल नागरिकों की सुरक्षा के लिए होगा, या उनकी स्वतंत्रता के ख़िलाफ़। जब तक यह लक्ष्मणरेखा साफ़ नहीं, तब तक हर राज्य सरकार अपनी सुविधा से उसे खींचती रहेगी।

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और दावे नामित स्रोतों को एट्रिब्यूट किए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न आए, अप्रमाणित हैं; उप-न्यायिक (sub judice) मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • क्रिमिनल लॉ Concurrent List का विषय है — राज्य संशोधन कर सकता है, लेकिन अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति (यानी केंद्र) की मंज़ूरी ज़रूरी है।
  • महाराष्ट्र की महायुति सरकार BNSS धारा 172 में प्रिवेंटिव कस्टडी 15 से 30 दिन करना चाहती है — विरोधी इसे राजनीतिक दमन का हथियार मानते हैं।
  • अगर राष्ट्रपति मंज़ूरी दे देते हैं, तो UP-MP-राजस्थान जैसे राज्य भी यही रास्ता अपना सकते हैं — 'एक देश, एक कानून' का नारा ख़तरे में पड़ेगा।
  • केंद्र के लिए यह असहज स्थिति है: मंज़ूरी दें तो BNSS की अपनी विरासत पर सवाल, न दें तो अपनी ही पार्टी के CM को ठुकराना।

आँकड़ों में

  • BNSS धारा 172 के तहत मौजूदा प्रिवेंटिव कस्टडी सीमा: 15 दिन; महाराष्ट्र का प्रस्ताव: 30 दिन — दोगुनी अवधि (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)
  • अनुच्छेद 254(2): Concurrent List में राज्य का कानून केंद्रीय कानून से टकराने पर राष्ट्रपति की मंज़ूरी अनिवार्य (भारतीय संविधान)

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: महाराष्ट्र की महायुति सरकार (मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में)
  • क्या: BNSS की धारा 172 में संशोधन कर प्रिवेंटिव कस्टडी 15 दिन से बढ़ाकर 30 दिन करने का प्रस्ताव
  • कब: 2026 में प्रस्ताव रखा गया, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार
  • कहाँ: महाराष्ट्र विधानसभा और केंद्र सरकार (राष्ट्रपति की मंज़ूरी हेतु)
  • क्यों: सरकार का तर्क है कि कानून-व्यवस्था के मामलों में 15 दिन की अवधि अपर्याप्त है; विरोधी इसे राजनीतिक दमन का हथियार मानते हैं
  • कैसे: Concurrent List में क्रिमिनल लॉ होने से राज्य संशोधन विधेयक पारित कर सकता है, पर अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की सहमति ज़रूरी है — बिना इसके राज्य कानून केंद्रीय कानून के विरोधी होने पर शून्य हो जाएगा

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या महाराष्ट्र अकेले BNSS में बदलाव कर सकता है?

हाँ, क्रिमिनल लॉ Concurrent List में है, इसलिए राज्य विधानसभा संशोधन विधेयक पारित कर सकती है। लेकिन अगर यह केंद्रीय कानून (BNSS) से टकराता है, तो अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंज़ूरी ज़रूरी है — बिना इसके संशोधन शून्य होगा।

प्रिवेंटिव कस्टडी और सामान्य गिरफ़्तारी में क्या फ़र्क़ है?

सामान्य गिरफ़्तारी किसी अपराध के बाद होती है और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी ज़रूरी है। प्रिवेंटिव कस्टडी 'अपराध रोकने' के लिए पहले से होती है — इसमें FIR या चार्जशीट की ज़रूरत नहीं, जो नागरिक अधिकारों के लिहाज़ से संवेदनशील है।

अगर महाराष्ट्र को मंज़ूरी मिल गई तो अन्य राज्यों पर क्या असर होगा?

विधि विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि इससे 'डोमिनो इफ़ेक्ट' हो सकता है — UP, MP, राजस्थान जैसे राज्य भी इसी रास्ते कस्टडी अवधि बढ़ा सकते हैं, जिससे 'एक देश, एक कानून' का सिद्धांत कमज़ोर होगा।

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