'गुड्डा-गुड्डी का खेल नहीं' — पंजाब कांग्रेस की कलह 2027 में AAP की जीत पक्की कर रही है?
पंजाब कांग्रेस में प्रतापसिंह बाजवा का 'गुड्डा-गुड्डी का खेल नहीं' तंज सीधे अमरिंदर राजा वड़िंग और नवजोत सिद्धू गुट पर है। News18 के अनुसार यह कलह 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को विभाजित कर रही है, जिससे AAP और बीजेपी दोनों को फ़ायदा मिल रहा है।
गुड्डा-गुड्डी — यानी कठपुतलियाँ। जब कोई सांसद अपनी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को कठपुतली कहे, तो समझ लीजिए कि लड़ाई नीतियों की नहीं, कुर्सी की है। पंजाब कांग्रेस में प्रतापसिंह बाजवा ने जो बम फोड़ा है, वह महज़ एक बयान नहीं — यह 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भीतर उस दरार की आवाज़ है जो अब दीवार गिरा सकती है।
News18 की विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, बाजवा ने सीधे शब्दों में कहा — 'ये कोई गुड्डा-गुड्डी का खेल नहीं है।' निशाना साफ़ है: प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर राजा वड़िंग और उनके साथ खड़े नवजोत सिंह सिद्धू का गुट। बाजवा का आरोप है कि पंजाब कांग्रेस का नेतृत्व दिल्ली हाईकमान की कठपुतली बनकर रह गया है — ज़मीनी जनादेश के बिना, बस ऊपर से थोपा हुआ।
यह तंज इतना तीखा क्यों है, इसे समझने के लिए पंजाब कांग्रेस के हालिया इतिहास पर नज़र डालिए। 2022 में पार्टी ने विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार झेली — 117 में से महज़ 18 सीटें मिलीं। उसके बाद से पार्टी में मंथन कम, मारामारी ज़्यादा हुई है। कैप्टन अमरिंदर सिंह का बाहर जाना, सिद्धू का उभार और फिर पतन, वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाना — हर बार हाईकमान ने फ़ैसला लिया, पंजाब के कार्यकर्ता ने नहीं।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि बाजवा का गुस्सा सिर्फ़ वड़िंग पर नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर है जो पंजाब के क्षत्रपों को दरकिनार कर दिल्ली से रिमोट-कंट्रोल चलाता है। कांग्रेस के भीतर के सूत्र बताते हैं कि बाजवा खेमे को लगता है कि 2027 का मुख्यमंत्री चेहरा तय करने में उन्हें हाशिये पर रखा जा रहा है। दूसरी ओर, वड़िंग समर्थक मानते हैं कि बाजवा ख़ुद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए यह शोर मचा रहे हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन असली सवाल कुर्सी का नहीं — चुनावी गणित का है। पंजाब में कांग्रेस का वोट शेयर 2017 के करीब 39% से गिरकर 2022 में लगभग 23% पर आ गया था। इस गिरावट को रोकने के लिए एकजुटता पहली शर्त है, और ठीक वही ग़ायब है। News18 की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह सार्वजनिक कलह उस वक़्त आई है जब AAP सत्ता में होते हुए भी एंटी-इनकंबेंसी झेल रही है — यानी कांग्रेस के लिए यह सुनहरा मौक़ा था, जो अपनी ही लड़ाई में बर्बाद हो रहा है।
इसे ऐसे समझिए: AAP सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगातार उठ रहे हैं, भगवंत मान की सरकार को लेकर जनता में मिला-जुला मूड है। बीजेपी पंजाब में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश में है, हिंदू-बहुल शहरी सीटों पर उसकी नज़र है। ऐसे में अगर कांग्रेस एकजुट होती, तो वह सीधी मुक़ाबले में आती। लेकिन गुड्डा-गुड्डी वाला तंज बताता है कि पार्टी अभी अपने भीतर की लड़ाई ही नहीं सुलझा पाई।
जो कोण बाकी मीडिया से छूट गया, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — हाईकमान की चुप्पी इस कलह का मूल कारण है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अब तक पंजाब के इस सार्वजनिक झगड़े पर कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया। यह चुप्पी दो मतलब रखती है: या तो हाईकमान को पंजाब की प्राथमिकता नहीं है, या फिर वह जानबूझकर गुटों को लड़ने दे रही है ताकि कोई एक ख़ुद ही कमज़ोर होकर बाहर हो जाए। दोनों ही स्थितियों में नुकसान पार्टी का है।
बाजवा का 'गुड्डा-गुड्डी' तंज एक और ख़तरनाक संकेत देता है — यह दलित और जाट सिख वोट बैंक की लड़ाई भी है। वड़िंग दलित समुदाय से आते हैं और पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष बनाकर दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश की। बाजवा जाट सिख राजनीति के प्रतिनिधि हैं। जब ये दोनों धड़े सार्वजनिक रूप से भिड़ते हैं, तो ज़मीन पर कार्यकर्ता बँटता है — और बँटा हुआ कार्यकर्ता चुनाव नहीं जिताता।
2022 का सबक़ सामने है। उस बार भी कांग्रेस ने चुनाव से ठीक पहले अमरिंदर को हटाकर चन्नी को बिठाया, सिद्धू को अध्यक्ष बनाया — और तीनों गुटों ने मिलकर पार्टी की नैया डुबो दी। अब 2027 से डेढ़ साल पहले वही फ़िल्म फिर चल रही है, बस किरदार बदल गए हैं।
आगे क्या होगा? अगर हाईकमान अगले तीन-चार महीनों में कोई स्पष्ट फ़ैसला नहीं लेती — चाहे वह बाजवा को कोई बड़ी ज़िम्मेदारी देना हो या वड़िंग के नेतृत्व पर खुलकर मुहर लगाना — तो पंजाब कांग्रेस में और बग़ावतें आएँगी। कई विधायक और ज़िला अध्यक्ष पहले से दोनों खेमों में बँटे हैं। बीजेपी इस बँटवारे का फ़ायदा उठाकर शहरी सीटों पर अपनी पैठ बढ़ाएगी, और AAP को बिना कुछ किए विपक्ष के कमज़ोर होने का तोहफ़ा मिल जाएगा।
पंजाब की राजनीति में एक पुरानी कहावत है — जब दो लड़ें, तीसरा खाए। 2017 में AAP तीसरी ताक़त थी और वह खाने वाली बनी। 2027 में कांग्रेस की कलह अगर ऐसी ही रही, तो पंजाब का मतदाता फिर किसी तीसरे विकल्प की तलाश करेगा — और इस बार वह विकल्प बीजेपी भी हो सकती है।
बाजवा ने कठपुतली वाला तंज कसकर एक बात तो साफ़ कर दी — पंजाब कांग्रेस में अब कोई परदे के पीछे नहीं लड़ रहा, लड़ाई मंच पर आ चुकी है। सवाल यह है कि यह मंच पार्टी की सभा का है, या फिर उसकी अंतिम यात्रा का?
आरोप जो यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं वे नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला नहीं आता, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों को बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किया गया है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- बाजवा का 'गुड्डा-गुड्डी' तंज सीधे वड़िंग-सिद्धू गुट और हाईकमान के रिमोट-कंट्रोल पर है — News18 रिपोर्ट
- 2022 में कांग्रेस का वोट शेयर 39% से गिरकर 23% आया; 2027 से पहले एकजुटता बिना रिकवरी असंभव
- हाईकमान की चुप्पी गुटबाज़ी का मूल कारण — न बाजवा को ज़िम्मेदारी, न वड़िंग को खुली मुहर
- यह जाट सिख बनाम दलित वोट बैंक की लड़ाई भी है — ज़मीन पर कार्यकर्ता बँट रहे हैं
- AAP की एंटी-इनकंबेंसी का फ़ायदा उठाने का सुनहरा मौक़ा कांग्रेस अपनी कलह में गँवा रही है
आँकड़ों में
- 2022 पंजाब विधानसभा में कांग्रेस को 117 में से सिर्फ़ 18 सीटें मिलीं — चुनाव आयोग आँकड़े
- कांग्रेस का वोट शेयर 2017 के ~39% से गिरकर 2022 में ~23% हुआ
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: प्रतापसिंह बाजवा (राज्यसभा सांसद, वरिष्ठ कांग्रेस नेता) बनाम अमरिंदर राजा वड़िंग (प्रदेश अध्यक्ष) और नवजोत सिंह सिद्धू गुट — News18 के अनुसार
- क्या: बाजवा ने 'गुड्डा-गुड्डी का खेल नहीं' कहकर प्रदेश नेतृत्व पर तीखा तंज कसा, जो पंजाब कांग्रेस की गहरी गुटबाज़ी को उजागर करता है — News18 रिपोर्ट
- कब: जून 2026, 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव से करीब डेढ़ साल पहले
- कहाँ: पंजाब, भारत
- क्यों: प्रदेश अध्यक्ष पद और 2027 के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर गुटों में सत्ता-संघर्ष; हाईकमान की निष्क्रियता से नेताओं में खुला असंतोष — News18
- कैसे: बाजवा गुट का मानना है कि वड़िंग-सिद्धू गुट को हाईकमान ने बिना ज़मीनी जनादेश के थोपा है; बाजवा ने सार्वजनिक बयानों से असंतोष खुलकर ज़ाहिर किया — News18 रिपोर्ट
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पंजाब कांग्रेस में 'गुड्डा-गुड्डी' का तंज किसने और किस पर कसा?
News18 के अनुसार राज्यसभा सांसद प्रतापसिंह बाजवा ने यह तंज कसा है, जो सीधे प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर राजा वड़िंग और नवजोत सिंह सिद्धू गुट पर निशाना है। बाजवा का आरोप है कि प्रदेश नेतृत्व दिल्ली हाईकमान की कठपुतली है।
पंजाब कांग्रेस की कलह का 2027 चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?
2022 में कांग्रेस का वोट शेयर ~23% तक गिर चुका है। अगर गुटबाज़ी जारी रही तो AAP की एंटी-इनकंबेंसी का फ़ायदा उठाने का मौक़ा बर्बाद होगा और बीजेपी शहरी सीटों पर अपनी पैठ बढ़ाएगी।
कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब कलह पर क्या कदम उठाया?
News18 की रिपोर्ट के अनुसार अब तक राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस सार्वजनिक कलह पर कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया है।