बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा 'सभ्य समाज पर दाग' — हिंदी बेल्ट में गटर की मौतें छुपाने वाले आंकड़े कब सामने आएंगे?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैला प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) को 'सभ्य समाज पर गंभीर दाग' बताते हुए सरकारों की विफलता पर कड़ी टिप्पणी की है। NDTV के अनुसार कोर्ट ने कहा कि 2013 के प्रतिबंध क़ानून के बावजूद यह प्रथा जारी है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का खुला उल्लंघन है।
एक आदमी बिना मास्क, बिना हार्नेस, बिना ऑक्सीजन — गटर में उतरता है। ऊपर खड़े लोग नाक पर रुमाल रखे गुज़र जाते हैं। कुछ घंटे बाद वह आदमी ज़हरीली गैस की चपेट में आकर नीचे ही रह जाता है। यह कहानी किसी एक शहर की नहीं — यह 2026 के भारत की रोज़मर्रा है, जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब 'सभ्य समाज पर गंभीर दाग' कहकर पुकारा है।
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक़ बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी हालिया सुनवाई में मैनुअल स्कैवेंजिंग — यानी हाथ से मैला उठाने और सीवर-सेप्टिक टैंक की सफ़ाई — को लेकर जो शब्द इस्तेमाल किए, वे किसी भी सरकार के गाल पर तमाचे से कम नहीं। कोर्ट ने साफ़ कहा कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन के अधिकार — का सीधा उल्लंघन है। 2013 में 'प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट' बना, 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यों को निर्देश दिए — लेकिन ज़मीन पर? ज़मीन पर वही गटर है, वही इंसान है, और वही मौत।
सवाल यह नहीं कि कोर्ट ने क्या कहा — सवाल यह है कि कोर्ट को यह बार-बार कहना क्यों पड़ रहा है? यहीं पर यह कहानी कोर्टरूम से निकलकर हिंदी बेल्ट की गलियों में पहुँचती है।
क़ानून कागज़ पर, मौतें ज़मीन पर
2013 का क़ानून स्पष्ट है — किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में बिना सुरक्षा उपकरणों के उतारना अपराध है। सज़ा का प्रावधान है, मुआवज़े का प्रावधान है, पुनर्वास का प्रावधान है। लेकिन राष्ट्रीय सफ़ाई कर्मचारी आयोग और सुप्रीम कोर्ट को बार-बार दिए गए सरकारी हलफ़नामों में राज्य सरकारें अक्सर दावा करती रही हैं कि उनके यहाँ मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं ही नहीं। यह दावा उसी तरह है जैसे किसी अस्पताल में मरीज़ न होने का दावा करना — जबकि बाहर कतार लगी हो।
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन जैसे संगठन वर्षों से कहते रहे हैं कि सीवर मौतों की असली संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज़्यादा है। कारण? अधिकांश मौतें 'दुर्घटना' या 'डूबना' के रूप में दर्ज होती हैं — मैनुअल स्कैवेंजिंग के रूप में नहीं। जब मौत की वजह ही ग़लत दर्ज हो, तो आंकड़ा कैसे सही होगा?
हिंदी बेल्ट: 'स्वच्छ भारत' का सबसे बड़ा अंधा धब्बा
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान — ये वो राज्य हैं जहाँ शुष्क शौचालयों की तादाद सबसे ज़्यादा रही है, जहाँ सीवर नेटवर्क सबसे कम है, और जहाँ जाति-आधारित भेदभाव सबसे गहरी जड़ें जमाए बैठा है। 'स्वच्छ भारत मिशन' ने करोड़ों शौचालय बनवाए — लेकिन शौचालय बनाना और सीवेज सिस्टम खड़ा करना दो बिलकुल अलग बातें हैं। जहाँ सीवर लाइन नहीं, वहाँ सेप्टिक टैंक है। और जहाँ सेप्टिक टैंक है, वहाँ कोई न कोई उसमें उतर रहा है — अक्सर दलित समुदाय का कोई व्यक्ति, जिसके पास 'ना' कहने की हैसियत ही नहीं।
NDTV की रिपोर्ट में कोर्ट ने इसी व्यवस्थागत विफलता पर उंगली रखी — कि राज्य तंत्र ने न तो मशीनीकरण किया, न ठेकेदारों पर निगरानी रखी, न पीड़ितों के परिवारों को समय पर मुआवज़ा दिया। कोर्ट की नज़र में यह सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का संस्थागत हनन है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में यह सवाल फुसफुसाहट में पूछा जाता है पर कोई खुलकर नहीं कहता — कि योगी सरकार हो या नीतीश सरकार, मैनुअल स्कैवेंजिंग पर सख्ती इसलिए नहीं आती क्योंकि इसका कोई वोट-बैंक नहीं है। पीड़ित वर्ग राजनीतिक दबाव बनाने की स्थिति में नहीं। ट्रेड यूनियनों और दलित संगठनों में चर्चा है कि जब तक सीवर मौतों को 'हत्या' के बराबर दर्ज करने का आदेश न आए, राज्य सरकारों को हिलाना मुश्किल है। (यह राजनीतिक हलकों और कार्यकर्ता समूहों में चल रही चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इस पूरे मामले की सियासी परतों को इंडिया हेराल्ड जब खोलता है तो एक बात साफ़ दिखती है — कि मैनुअल स्कैवेंजिंग पर हर सरकार के पास बहाना एक ही है: 'हमारे यहाँ यह होता ही नहीं।' और यही बहाना सबसे बड़ी राजनीतिक चालाकी है। जब समस्या का अस्तित्व ही नकार दो, तो समाधान का सवाल ही नहीं उठता। यह ठीक वैसा ही है जैसे दिल्ली में फ्रीबी बहस में असली मुद्दा — ज़रूरतमंद तक राहत पहुँचना — शोरगुल में दब जाता है।
कोर्ट की फटकार से आगे — अब क्या?
बॉम्बे हाई कोर्ट की यह टिप्पणी अकेली नहीं है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार केस में ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था। 2025 में फिर से सख्त निर्देश आए। लेकिन हर बार कोर्ट बोलता है, सरकारें सुनती हैं, हलफ़नामे दाख़िल करती हैं — और फिर वही सन्नाटा। अब सवाल यह है कि क्या बॉम्बे हाई कोर्ट की यह भाषा — 'सभ्य समाज पर दाग' — इतनी तीखी है कि केंद्र सरकार को एक ठोस राष्ट्रीय ऑडिट के लिए मजबूर कर सके?
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ बात यह होगी कि क्या महाराष्ट्र सरकार कोर्ट के आदेश पर कोई ठोस अनुपालन रिपोर्ट दाख़िल करती है — और ज़्यादा अहम यह कि क्या हिंदी बेल्ट के राज्य इसे अपने ऊपर लागू मानते हैं या 'वो तो बॉम्बे कोर्ट का मामला है' कहकर टाल देते हैं। अगर 2025 के सुप्रीम कोर्ट निर्देशों पर राज्यवार अनुपालन रिपोर्ट की माँग तेज़ होती है, तो UP, बिहार और MP की सरकारों पर असली दबाव बनेगा — क्योंकि तब उन्हें बताना होगा कि उनके राज्य में कितने लोग अभी भी गटर में उतर रहे हैं।
लेकिन अगर इतिहास कोई संकेत है, तो सबसे संभावित परिदृश्य यही है — एक और हलफ़नामा, एक और तारीख़, और बीच में कुछ और ज़िंदगियाँ ज़हरीली गैस की भेंट।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने दाग़ दिखा दिया है। सवाल यह है कि जिनकी कमीज़ पर यह दाग़ है, वे कब आईना देखेंगे — या उन्हें आईना दिखाने वाला भी गटर में ही उतरेगा?
यहाँ दर्ज आरोप व दावे नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक कोर्ट का अंतिम निर्णय नहीं आता, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
More from India Herald
मुख्य बातें
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को 'सभ्य समाज पर गंभीर दाग' बताया — 2013 के क़ानून और 2025 के सुप्रीम कोर्ट निर्देशों के बावजूद प्रथा जारी, NDTV के अनुसार।
- हिंदी बेल्ट — UP, बिहार, MP, राजस्थान — में सीवर नेटवर्क सबसे कम और सीवर मौतें अक्सर 'दुर्घटना' के रूप में दर्ज — असली आंकड़े सरकारी डेटा से कई गुना ज़्यादा होने का अनुमान।
- राज्य सरकारें बार-बार हलफ़नामों में दावा करती रही हैं कि उनके यहाँ मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं ही नहीं — यही 'अस्तित्व से इनकार' सबसे बड़ी राजनीतिक चालाकी।
- कोर्ट ने अनुच्छेद 21 — जीवन के अधिकार — के उल्लंघन पर ज़ोर दिया; असली दबाव तभी बनेगा जब राज्यवार अनुपालन ऑडिट की माँग तेज़ हो।
आँकड़ों में
- 2013 में 'प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट' बना — 13 साल बाद भी प्रथा जारी।
- सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन जैसे संगठनों के अनुसार सीवर मौतों की असली संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुना ज़्यादा — अधिकांश मौतें 'दुर्घटना' या 'डूबना' के रूप में दर्ज।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: बॉम्बे हाई कोर्ट — जिसने मैला प्रथा पर यह सख्त टिप्पणी की, NDTV के अनुसार।
- क्या: कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को 'सभ्य समाज पर गंभीर दाग' क़रार दिया और सरकारों की निष्क्रियता पर फटकार लगाई।
- कब: जून 2026 — बॉम्बे हाई कोर्ट की ताज़ा सुनवाई में यह टिप्पणी सामने आई।
- कहाँ: बॉम्बे हाई कोर्ट, मुंबई — लेकिन इसका असर पूरे भारत, विशेषकर हिंदी बेल्ट के राज्यों पर पड़ता है।
- क्यों: 2013 के प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एक्ट के बावजूद सीवर और सेप्टिक टैंक में मज़दूरों की मौतें जारी हैं — कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताया।
- कैसे: कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया, NDTV की रिपोर्ट के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग पर क्या कहा?
NDTV के अनुसार बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को 'सभ्य समाज पर गंभीर दाग' बताया और कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 — जीवन के अधिकार — का सीधा उल्लंघन है।
मैनुअल स्कैवेंजिंग पर भारत में कौन सा क़ानून है?
2013 में 'प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट' बना, जो हाथ से मैला उठाने और बिना सुरक्षा सीवर सफ़ाई को अपराध घोषित करता है।
हिंदी बेल्ट में मैनुअल स्कैवेंजिंग क्यों जारी है?
सीवर नेटवर्क की भारी कमी, सेप्टिक टैंक सफ़ाई का मशीनीकरण न होना, जाति-आधारित भेदभाव और राज्य सरकारों द्वारा समस्या के अस्तित्व से ही इनकार — ये प्रमुख कारण हैं।
सीवर मौतों के सरकारी आंकड़े कम क्यों दिखते हैं?
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन जैसे संगठनों के अनुसार अधिकांश सीवर मौतें 'दुर्घटना' या 'डूबना' के रूप में दर्ज होती हैं, मैनुअल स्कैवेंजिंग के रूप में नहीं — इसलिए सरकारी डेटा असली तस्वीर नहीं दिखाता।