गिरिडीह में गिरा 11 हज़ार वोल्ट का तार — क्या झारखंड का बिजली विभाग किसी 'बलिदान' के इंतज़ार में है?
गिरिडीह के डोरंडा चौक पर 11 हज़ार वोल्ट का हाई-टेंशन तार टूटकर सड़क पर गिर गया। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बड़ा हादसा टला, लेकिन यह घटना झारखंड के बिजली विभाग की उस व्यवस्थागत उदासीनता को बेनकाब करती है जहाँ रखरखाव सिर्फ़ हादसे के बाद याद आता है।
ग्यारह हज़ार वोल्ट। इतनी बिजली किसी इंसान को एक झटके में राख कर दे। गिरिडीह के डोरंडा चौक पर — जहाँ सब्ज़ीवाले अपनी रेहड़ी लगाते हैं, स्कूली बच्चे ऑटो का इंतज़ार करते हैं — ठीक वहीं यह मौत का तार ज़मीन पर आ गिरा। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बड़ा हादसा टल गया। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि हादसा टला — सवाल यह है कि वह तार टूटा ही क्यों?
यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी। न आँधी आई, न तूफ़ान। एक जर्जर हाई-टेंशन तार, जिसकी शायद सालों से कोई जाँच नहीं हुई, भीड़भाड़ वाले चौराहे पर ज़मीन चूम गया। और अगर उस लम्हे वहाँ कोई खड़ा होता? कोई बच्चा? कोई साइकिल वाला? तो अखबारों की हेडलाइन 'हादसा टला' नहीं, कुछ और होती।
गिरिडीह की यह घटना अकेली नहीं है। ठीक इसी दौर में मुंगेर के जुबलीवेल चौक पर भी ऐसा ही बड़ा हादसा टला — हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक़ वहाँ भी बिजली के तार की वजह से जान जाते-जाते बची। हज़ारीबाग़ के बड़कागाँव में स्कूल वैन पलटने की ख़बर अलग है, लेकिन बुनियादी ढाँचे की उसी बीमारी का लक्षण है — लाइव हिंदुस्तान ने इसकी भी रिपोर्ट दी। एक के बाद एक, झारखंड और बिहार के छोटे शहर 'बड़ा हादसा टला' की हेडलाइन बनाते जा रहे हैं, जैसे यह कोई उपलब्धि हो।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि झारखंड में बिजली विभाग की पोस्टिंग 'कमाई' वाली मानी जाती है — टेंडर, ठेके, ट्रांसफ़ॉर्मर ख़रीद में 'ऊपरी' का सिस्टम इतना जमा हुआ है कि रखरखाव बजट अक्सर काग़ज़ों पर ख़र्च हो जाता है, ज़मीन पर नहीं पहुँचता। ट्रेड हलकों की चर्चा यह है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाक़ों में हाई-टेंशन लाइनों का सर्वे बरसों से लंबित है — लेकिन जब तक कोई मरता नहीं, फ़ाइल नहीं हिलती।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
जनता की नब्ज़ टटोलें तो गिरिडीह में लोग कहते हैं कि बिजली विभाग का नंबर मिलाओ तो फ़ोन नहीं उठता, शिकायत करो तो 'देखेंगे' का जवाब आता है। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि तार झूलते रहते हैं, पोल टेढ़े खड़े रहते हैं, और जब कोई दुर्घटना होती है तो जाँच समिति बनती है जिसकी रिपोर्ट किसी दराज़ में दफ़न हो जाती है।
11 हज़ार वोल्ट की 'राहत' का गणित
ज़रा सोचिए — 11,000 वोल्ट का तार अगर किसी ज़िंदा शरीर को छू जाए तो उसके बचने की संभावना शून्य के आसपास होती है। घरेलू बिजली 220 वोल्ट की होती है और उससे भी हर साल सैकड़ों मौतें होती हैं। यहाँ बात उससे 50 गुना ज़्यादा वोल्टेज की है। और यह तार किसी सुनसान खेत में नहीं, एक चहलपहल वाले बाज़ार चौक पर गिरा — जहाँ दिन में हज़ारों लोग गुज़रते हैं।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि झारखंड में बिजली अवसंरचना की यह जर्जरता 'दुर्घटना' नहीं, 'नीति' है। जब सरकारें बदलती हैं तो नए ट्रांसफ़ॉर्मर लगाने की घोषणा होती है, नई लाइन बिछाने के टेंडर निकलते हैं — लेकिन मौजूदा तारों का रखरखाव किसी की प्राथमिकता सूची में नहीं है। नया बनाने में फ़ोटो-ऑप है, पुराना ठीक करने में कोई वोट नहीं। यही वह हिसाब है जो गिरिडीह के चौराहों पर मौत लटकाए रखता है।
व्यवस्था का पैटर्न — सिर्फ़ गिरिडीह नहीं
यह पैटर्न सिर्फ़ गिरिडीह का नहीं। झारखंड के धनबाद, बोकारो, रामगढ़ से लेकर पलामू तक — हर कुछ महीनों में हाई-टेंशन तार टूटने, ट्रांसफ़ॉर्मर फटने, करंट से मौत की ख़बरें आती हैं। बिहार का मुंगेर इसी तस्वीर का विस्तार है। इन घटनाओं में एक चीज़ कॉमन है: हर बार 'बड़ा हादसा टला' लिखा जाता है, हर बार प्रशासन 'जाँच' का आदेश देता है, और हर बार कुछ हफ़्तों में सब भुला दिया जाता है — अगले तार टूटने तक।
सबसे कड़वी बात यह है कि झारखंड सरकार के अपने बजट दस्तावेज़ों में बिजली अवसंरचना के 'आधुनिकीकरण' के लिए करोड़ों रुपये आवंटित दिखते हैं। लेकिन गिरिडीह का डोरंडा चौक बता रहा है कि वह पैसा कहाँ जा रहा है — ज़मीन पर तो नहीं।
आगे क्या?
अगर इस घटना के बाद भी बिजली विभाग 'मरम्मत हो गई' का नोट जारी करके चुप बैठ जाता है, तो अगली हेडलाइन 'बड़ा हादसा टला' नहीं होगी। विश्लेषकों का अनुमान है कि जब तक ज़िला प्रशासन एक व्यापक सर्वे करवाकर हर जर्जर हाई-टेंशन लाइन की पहचान नहीं करता, जब तक मरम्मत के बजट का सार्वजनिक ऑडिट नहीं होता, और जब तक ज़िम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई का एक भी उदाहरण सामने नहीं आता — तब तक गिरिडीह, धनबाद, मुंगेर जैसे शहरों के चौराहे एक खुला क़त्लख़ाना बने रहेंगे।
बिजली विभाग की ओर से इस विशिष्ट घटना पर अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
डोरंडा चौक पर उस दिन जो तार गिरा, वह सिर्फ़ एक तार नहीं था — वह एक सवाल था, पूरे सिस्टम से: क्या इस राज्य को अपनी बिजली की लाइनें ठीक करने के लिए सचमुच किसी की 'बलि' चढ़ने का इंतज़ार है?
आरोप और दावे जो यहाँ रिपोर्ट किए गए हैं, नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला नहीं आता, अप्रमाणित हैं; न्यायालय में विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
मुख्य बातें
- गिरिडीह के डोरंडा चौक पर 11,000 वोल्ट का हाई-टेंशन तार भीड़भाड़ वाले इलाक़े में टूटकर गिरा — हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बड़ा हादसा टला।
- यह घटना अकेली नहीं — मुंगेर के जुबलीवेल चौक पर भी ऐसा ही हादसा टला, हज़ारीबाग़ में स्कूल वैन पलटी — बुनियादी ढाँचे की बीमारी व्यापक है।
- 11,000 वोल्ट घरेलू बिजली से 50 गुना ज़्यादा है — इतने वोल्टेज का तार अगर किसी को छू जाए तो बचने की संभावना शून्य के आसपास।
- झारखंड में बिजली अवसंरचना के आधुनिकीकरण के लिए बजट में करोड़ आवंटित हैं, लेकिन ज़मीनी रखरखाव लगभग शून्य — पैसा काग़ज़ों पर ख़र्च होता है।
- बिजली विभाग की ओर से इस घटना पर अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
आँकड़ों में
- 11,000 वोल्ट — गिरिडीह डोरंडा चौक पर टूटे तार का वोल्टेज, जो घरेलू बिजली (220V) से लगभग 50 गुना ज़्यादा है।
- एक ही दौर में गिरिडीह और मुंगेर दोनों में हाई-टेंशन तार से जुड़े 'बड़ा हादसा टला' की घटनाएँ — हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: गिरिडीह का बिजली विभाग और डोरंडा चौक से गुज़रने वाले आम नागरिक।
- क्या: 11 हज़ार वोल्ट का हाई-टेंशन तार टूटकर सड़क पर गिरा, बड़ा हादसा बाल-बाल टला — हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार।
- कब: जुलाई 2026, ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार।
- कहाँ: गिरिडीह ज़िले का डोरंडा चौक, झारखंड।
- क्यों: जर्जर बिजली अवसंरचना, नियमित रखरखाव का अभाव और बिजली विभाग की व्यवस्थागत लापरवाही।
- कैसे: पुराने और जर्जर हाई-टेंशन तार बिना किसी नियमित जाँच या मरम्मत के लगे रहे, जिससे तार टूटकर भीड़भाड़ वाले चौक पर सड़क पर गिर गया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गिरिडीह के डोरंडा चौक पर क्या हुआ?
हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, गिरिडीह के डोरंडा चौक पर 11 हज़ार वोल्ट का हाई-टेंशन तार टूटकर सड़क पर गिर गया। बड़ा हादसा टल गया क्योंकि उस वक़्त कोई सीधे संपर्क में नहीं आया।
11 हज़ार वोल्ट का तार कितना ख़तरनाक है?
11,000 वोल्ट घरेलू बिजली (220 वोल्ट) से लगभग 50 गुना ज़्यादा है। इतने वोल्टेज का तार अगर किसी ज़िंदा शरीर को छू जाए, तो बचने की संभावना शून्य के आसपास होती है।
झारखंड में बिजली विभाग की लापरवाही क्यों बनी रहती है?
विश्लेषकों का मानना है कि नई परियोजनाओं में राजनीतिक फ़ायदा और फ़ोटो-ऑप है, जबकि पुरानी लाइनों के रखरखाव में न वोट मिलते हैं न मीडिया कवरेज — इसलिए मरम्मत बजट अक्सर काग़ज़ों पर ही ख़र्च रह जाता है।