मॉस्को में BRICS की बिसात, भारत का पहला दांव — अमेरिका की नाराज़गी और चीन की चालों के बीच मोदी की असली रणनीति क्या है?
भारत ने 2026 में BRICS की अध्यक्षता सँभालते हुए पहला अकादमिक सम्मेलन मॉस्को में आयोजित किया। पश्चिमी दबाव के बावजूद यह कदम स्पष्ट संकेत है कि नई दिल्ली अपनी विदेश नीति किसी और के इशारे पर नहीं चलाएगी — यह अमेरिका और चीन दोनों को बैलेंस करने की सोची-समझी रणनीति है।
एक तरफ़ वॉशिंगटन की भौंहें तनी हुई हैं, दूसरी तरफ़ बीजिंग चुपचाप अपनी बिसात बिछा रहा है — और ठीक इसी गर्म ज़मीन पर खड़े होकर नई दिल्ली ने अपना पहला पत्ता खेला है। भारत ने BRICS 2026 की अध्यक्षता का उद्घाटन मॉस्को में एक अकादमिक सम्मेलन के साथ किया है, और यह तारीख़ और जगह दोनों अपने आप में एक बयान हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सम्मेलन में BRICS सदस्य देशों के अकादमिक विशेषज्ञों, पॉलिसी रिसर्चर्स और थिंक-टैंक प्रतिनिधियों ने 2026 के एजेंडे पर गहन विचार-विमर्श किया। मुद्दों में वैश्विक वित्तीय संरचना में सुधार, डॉलर के विकल्प के रूप में लोकल करेंसी ट्रेड, और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मज़बूत करना शामिल रहा।
अब सवाल वही है जो हर कूटनीतिक चाल के पीछे होता है — असली गणित क्या है?
मॉस्को ही क्यों? — जगह का चुनाव ही संदेश है
यह कोई संयोग नहीं कि भारत ने अपनी अध्यक्षता का पहला बड़ा आयोजन मॉस्को में रखा। 2022 के बाद से रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों की एक के बाद एक लहर आई है। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन लगातार दबाव बनाते रहे हैं कि दुनिया रूस को अलग-थलग करे। ऐसे माहौल में भारत का मॉस्को में एक बड़ा BRICS इवेंट होस्ट करना — यह सीधे-सीधे कहना है कि "हम अपनी विदेश नीति खुद तय करेंगे।"
यह नई बात नहीं है। भारत ने 2022 के बाद भी रूस से तेल ख़रीदना जारी रखा, S-400 मिसाइल सिस्टम की डील पूरी की, और CAATSA प्रतिबंधों के ख़तरे के बावजूद पीछे नहीं हटा। मॉस्को में यह सम्मेलन उसी नीति का अगला अध्याय है — लेकिन इस बार दांव कहीं ऊँचे हैं।
चीन फ़ैक्टर — असली शतरंज यहाँ है
BRICS के भीतर सबसे बड़ी चुनौती चीन है। बीजिंग चाहता है कि BRICS एक ऐसा ब्लॉक बने जो सीधे पश्चिम के ख़िलाफ़ खड़ा हो — एक 'एंटी-वेस्ट क्लब'। भारत की रणनीति बिलकुल उलटी है। नई दिल्ली BRICS को एक "बहुध्रुवीय मंच" के रूप में देखती है — जहाँ ग्लोबल साउथ की आवाज़ तो बुलंद हो, लेकिन यह न तो पश्चिम-विरोधी हो और न ही चीन की कठपुतली।
यही वजह है कि भारत ने इस सम्मेलन का फ़ॉर्मेट अकादमिक रखा — शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि एक विचार-मंथन। विश्लेषकों का मानना है कि यह सोचा-समझा क़दम है। एक अकादमिक फ़ोरम में भारत एजेंडा सेट कर सकता है बिना चीन को सीधी टक्कर का मौक़ा दिए। नैरेटिव कंट्रोल का यह एक क्लासिक कूटनीतिक दांव है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मोदी सरकार ने मॉस्को इवेंट को जानबूझकर "लो-प्रोफ़ाइल अकादमिक" का टैग दिया ताकि वॉशिंगटन को सीधे चिढ़ाने से बचा जा सके, लेकिन कूटनीतिक संदेश पूरी ताक़त से पहुँचे। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि भारत इस अध्यक्षता के दौरान BRICS के भीतर रुपये में द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाने की तैयारी में है — जो डॉलर के एकाधिकार पर सबसे व्यावहारिक चोट होगी। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
अमेरिका का दबाव — और भारत का बैलेंस
अमेरिका इस वक़्त भारत पर दोहरा दबाव बना रहा है — एक तरफ़ रूस से दूरी बनाने का, दूसरी तरफ़ BRICS को अमेरिकी हितों के ख़िलाफ़ न जाने देने का। ट्रंप प्रशासन ने पहले ही BRICS सदस्य देशों को डॉलर छोड़ने पर भारी टैरिफ़ की धमकी दी है। लेकिन भारत का गणित अलग है। नई दिल्ली जानती है कि QUAD में अमेरिका का पार्टनर होना और BRICS में रूस-चीन के साथ बैठना — यह विरोधाभास नहीं, बल्कि 21वीं सदी की रियलपॉलिटिक है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि भारत इस अध्यक्षता को सिर्फ़ एक "इवेंट मैनेजमेंट" की तरह नहीं चला रहा — यह 2026 के वैश्विक मंच पर भारत को "तीसरी शक्ति" के रूप में स्थापित करने का एक कैलकुलेटेड कैंपेन है। न अमेरिका का ख़ेमा, न चीन का — अपना।
आगे क्या? — देखने लायक़ तीन चीज़ें
पहला, भारत अगला बड़ा BRICS आयोजन कहाँ और किस फ़ॉर्मेट में करता है — अगर अगला इवेंट भारत की धरती पर होता है तो यह मॉस्को वाले संदेश को और मज़बूत करेगा। दूसरा, BRICS के भीतर डी-डॉलराइज़ेशन पर भारत कितना आगे जाता है — यह अमेरिका के साथ रिश्ते की असली लिटमस टेस्ट होगी। तीसरा, चीन भारत की अध्यक्षता को कितना सहयोग देता है और कितना बाधित करता है — LAC पर तनाव और BRICS में साझेदारी का यह विरोधाभास 2026 की सबसे दिलचस्प कूटनीतिक कहानी बन सकता है।
एक बात तय है — मॉस्को में यह पहला दांव शांत लग सकता है, लेकिन इसकी गूँज वॉशिंगटन, बीजिंग और ब्रसेल्स तीनों में सुनाई देगी। असली सवाल यह है: क्या भारत इस रस्सी पर चलते हुए दोनों तरफ़ का भरोसा बनाए रख पाएगा, या किसी एक मोड़ पर संतुलन बिगड़ेगा?
दुनिया देख रही है, और 2026 की यह बिसात अभी शुरू हुई है।
आरोप और दावे संबंधित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक कोई न्यायालय निर्णय न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारत ने BRICS 2026 अध्यक्षता का पहला अकादमिक सम्मेलन मॉस्को में आयोजित कर पश्चिमी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत दिया।
- BRICS के भीतर चीन इसे 'एंटी-वेस्ट ब्लॉक' बनाना चाहता है जबकि भारत इसे 'बहुध्रुवीय मंच' के रूप में रखने पर अड़ा है — यह BRICS की सबसे बड़ी आंतरिक लड़ाई है।
- अमेरिका ने BRICS देशों को डॉलर छोड़ने पर भारी टैरिफ़ की धमकी दी है — भारत का QUAD और BRICS दोनों में सक्रिय रहना 21वीं सदी की रियलपॉलिटिक का सबसे जटिल बैलेंसिंग एक्ट है।
- 2026 में डी-डॉलराइज़ेशन, LAC तनाव और BRICS एजेंडा — ये तीन मोर्चे तय करेंगे कि भारत की 'तीसरी शक्ति' वाली रणनीति कामयाब होती है या नहीं।
आँकड़ों में
- भारत ने 2022 के बाद भी रूसी तेल आयात जारी रखा और S-400 मिसाइल डील पूरी की — CAATSA प्रतिबंधों के ख़तरे के बावजूद।
- ट्रंप प्रशासन ने BRICS सदस्य देशों को डॉलर से हटने पर 100% तक टैरिफ़ की धमकी दी है, रिपोर्ट्स के अनुसार।
- BRICS अब 10 सदस्य देशों का समूह है जो वैश्विक GDP का लगभग 35% और विश्व जनसंख्या का लगभग 45% प्रतिनिधित्व करता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत सरकार ने BRICS 2026 की अध्यक्षता के तहत, सदस्य देशों के अकादमिक प्रतिनिधियों के साथ।
- क्या: BRICS अकादमिक फोरम का पहला सम्मेलन मॉस्को में आयोजित किया गया, जहाँ 2026 के एजेंडे पर विचार-विमर्श हुआ।
- कब: 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता के शुरुआती चरण में, रिपोर्ट्स के अनुसार।
- कहाँ: रूस की राजधानी मॉस्को में।
- क्यों: भारत रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखते हुए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र भूमिका का संकेत देना चाहता है।
- कैसे: भारत ने BRICS अध्यक्ष के रूप में मॉस्को को पहले अकादमिक सम्मेलन का मेज़बान शहर चुना, जिससे सदस्य देशों के शोधकर्ताओं और नीति-विशेषज्ञों ने 2026 की प्राथमिकताओं पर चर्चा की।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
BRICS 2026 की अध्यक्षता किस देश के पास है?
2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है। इसके तहत भारत पूरे साल BRICS के एजेंडे, बैठकों और आयोजनों की अगुवाई करेगा।
भारत ने BRICS का पहला इवेंट मॉस्को में क्यों रखा?
विश्लेषकों का मानना है कि यह रूस के साथ ऐतिहासिक संबंधों की निरंतरता और पश्चिमी दबाव से स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत है। अकादमिक फ़ॉर्मेट रखकर भारत ने अमेरिकी नाराज़गी को भी कम रखने की कोशिश की।
BRICS में कितने सदस्य देश हैं?
2024 में विस्तार के बाद BRICS में अब 10 सदस्य देश हैं — ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ़्रीका, ईरान, मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब और UAE।