तलाक के लिए पति के शहर जाना क्यों ज़रूरी? — 155 साल पुराना कानून बदलने की केरल HC की अपील

Singh Anchala

केरल हाईकोर्ट ने संसद से अपील की है कि 1869 के तलाक अधिनियम (Indian Divorce Act) की धारा 3 में संशोधन किया जाए, ताकि ईसाई महिलाएँ भी अपने वर्तमान निवास स्थान से तलाक की अर्ज़ी दायर कर सकें — वैसे ही जैसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 हिंदू महिलाओं को यह अधिकार देती है।

एक ईसाई महिला। शादी केरल में हुई, मायका केरल में है, लेकिन पति नौकरी के सिलसिले में दिल्ली चला गया। अब अगर वह तलाक चाहती है, तो उसे दिल्ली की अदालत में जाना होगा — सैकड़ों किलोमीटर दूर, अनजान शहर, बिना किसी सहारे के। यही वह ज़मीनी तकलीफ़ है जिसने केरल हाईकोर्ट को मजबूर किया कि वह सीधे संसद से बात करे।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, केरल हाईकोर्ट ने अपने हालिया आदेश में संसद से अपील की है कि 1869 के भारतीय तलाक अधिनियम (Indian Divorce Act) की धारा 3 में संशोधन किया जाए। कोर्ट का तर्क साफ़ है — यह कानून ब्रिटिश राज की देन है, 155 साल से अधिक पुराना है, और आज की भारतीय महिला की ज़रूरतों से कोसों दूर।

असली पेंच कहाँ है, यह समझने के लिए दो कानूनों को आमने-सामने रखना ज़रूरी है।

धारा 3 बनाम धारा 19 — एक ही देश, दो अलग नियम

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19 हिंदू महिला को तीन विकल्प देती है — वह तलाक की अर्ज़ी वहाँ दाखिल कर सकती है जहाँ शादी हुई, जहाँ पति रहता है, या जहाँ वह ख़ुद अंतिम बार पति के साथ रही। यानी अगर पत्नी अपने मायके लौट आई है और वह स्थान उसका अंतिम साझा निवास भी है, तो वह वहीं से मुकदमा लड़ सकती है।

लेकिन 1869 के भारतीय तलाक अधिनियम की धारा 3 ईसाई महिलाओं के लिए यह रास्ता बंद कर देती है। इस कानून के तहत तलाक की अर्ज़ी उसी ज़िला न्यायालय में दायर करनी होती है जिसके क्षेत्राधिकार में पति निवास करता हो। मतलब — अगर पति बेंगलूरु में है और पत्नी कोच्चि में, तो पत्नी को बेंगलूरु जाना होगा। पति की सुविधा, पत्नी की मजबूरी।

यह विसंगति कोई तकनीकी बारीकी नहीं है। यह सीधे-सीधे एक संवैधानिक प्रश्न है — क्या धर्म के आधार पर एक महिला को न्याय तक पहुँचने में ज़्यादा मुश्किल होनी चाहिए?

केरल हाईकोर्ट ने क्या कहा?

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईसाई महिलाओं को भी वही सुविधा मिलनी चाहिए जो हिंदू महिलाओं को धारा 19 के तहत मिलती है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह बदलाव विधायिका — यानी संसद — के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए न्यायालय ने संशोधन की सिफ़ारिश की, आदेश नहीं दिया। यह बारीकी अहम है — कोर्ट ने शक्तियों के विभाजन का सम्मान करते हुए भी अपनी बात बेहद सीधी रखी।

कोर्ट ने माना कि वर्तमान व्यवस्था में एक ईसाई महिला को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है — सफ़र का ख़र्च, अनजाने शहर में वकील तलाशना, परिवार के सहारे से दूर रहकर मुकदमा लड़ना।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस आदेश को लेकर दिलचस्प फुसफुसाहट है। विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार के लिए यह एक नाज़ुक मामला है — समान नागरिक संहिता (UCC) की बात तो ज़ोर-शोर से होती है, लेकिन जब किसी अल्पसंख्यक समुदाय के पर्सनल लॉ में सुधार का ठोस मौक़ा आता है, तो सरकार चुप रहती है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि अगर सरकार इस संशोधन को आगे बढ़ाती है, तो यह UCC की दिशा में एक व्यावहारिक क़दम माना जाएगा; लेकिन अगर टालती है, तो विपक्ष के पास तैयार तर्क होगा कि UCC की बात सिर्फ़ चुनावी नारा है।

(यह राजनीतिक विश्लेषण और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

155 साल — और गिनती जारी

1869 का तलाक अधिनियम उस दौर में बना था जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश था। तब ईसाई समुदाय की संख्या कम थी, महिलाओं की आवाजाही सीमित थी, और पति के शहर में तलाक दायर करना शायद व्यावहारिक भी रहा हो। लेकिन 2026 का भारत वह भारत नहीं है। आज ईसाई महिलाएँ नौकरी करती हैं, स्वतंत्र हैं, और उनसे यह अपेक्षा करना कि वे न्याय के लिए पति की शर्तों पर चलें — यह औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार है, उसका समापन नहीं।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि केरल हाईकोर्ट की यह अपील सिर्फ़ एक क़ानूनी सिफ़ारिश नहीं, बल्कि संसद के लिए एक आईना है। अगर सरकार इसे अगले संसद सत्र में नहीं उठाती, तो सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत चुनौती की ज़मीन और मज़बूत हो जाएगी। देखने वाली बात यह होगी कि क्या विधि आयोग इस पर स्वतः संज्ञान लेता है, या फिर किसी याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता तय करना पड़ेगा।

एक देश, एक संविधान, लेकिन तलाक का अधिकार — वह आपके धर्म पर निर्भर करता है। क्या यह वह समानता है जिसका वादा अनुच्छेद 14 करता है?

इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और दावे नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय न आए, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना किसी पूर्वाग्रह के की गई है।

ఇండియా హెరాల్డ్ సంపాదకీయ ప్రమాణాల కింద AI సహాయంతో నివేదించి రాయబడింది; ప్రచురణను మానవ సంపాదకుడు పర్యవేక్షిస్తారు.

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

More from India Herald

EducationIndia's Classrooms Have 9.4 Lakh Teacher Vacancies — So Who Is Actually Teaching Our Children?India's public schools run on nearly a million unfilled teacher posts, contract labour, and the hope that someone will show up. The real cos…
PoliticsCensus 2027 Pre-Test Begins — But Who Decides Which Questions Make the Cut Wins the Entire DecadeIndia's first Census in over a decade isn't just about counting heads — the pre-test phase now underway is a quiet war over which questions …
Politics16,000 Acres, 70 Years, One Uncomfortable Question — Is BJP Quietly Building Its Own Vote Bank Under Naidu's Nose?The BJP's sudden championing of a seven-decade-old land grievance in Andhra Pradesh is less about justice and more about building a grassroo…
PoliticsThe 'Peddireddy-Proofing' of Kuppam — Why Is Naidu's Industrial Roadmap Actually a Revenge Blueprint?Poultry farms and model villages are the cover story. Beneath the ribbon-cutting lies a cold, calculated demographic rewiring designed to en…
PoliticsTrump's 'Finish the Job' Ultimatum to Iran — If the Strait of Hormuz Burns, Can India Survive a $120 Oil Shock?Trump has eliminated the middle ground on Iran — it is either a deal or military action. For India, which imports 85% of its crude, a confli…

मुख्य बातें

  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 महिला को अंतिम साझा निवास या विवाह स्थान से तलाक दायर करने का अधिकार देती है, लेकिन 1869 के तलाक अधिनियम की धारा 3 ईसाई महिला को पति के ज़िला न्यायालय में जाने को मजबूर करती है।
  • केरल हाईकोर्ट ने संसद से इस विसंगति को दूर करने की सीधी अपील की है — यह आदेश नहीं, सिफ़ारिश है, जो शक्तियों के विभाजन का सम्मान करती है।
  • अगर संसद कार्रवाई नहीं करती, तो अनुच्छेद 14 और 21 के तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती की ज़मीन और मज़बूत होगी।
  • यह मामला UCC बहस का लिटमस टेस्ट बन सकता है — सरकार की प्रतिक्रिया बताएगी कि समान संहिता की मंशा कितनी गंभीर है।

आँकड़ों में

  • 1869 — भारतीय तलाक अधिनियम की आयु 155+ वर्ष, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में बना
  • धारा 19 (हिंदू विवाह अधिनियम) बनाम धारा 3 (तलाक अधिनियम) — एक ही देश में दो अलग नियम
  • अनुच्छेद 14 और 21 — संविधान के वे अनुच्छेद जिनके तहत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती संभव

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: केरल हाईकोर्ट, संसद, ईसाई महिला याचिकाकर्ता
  • क्या: कोर्ट ने संसद से 1869 के भारतीय तलाक अधिनियम की धारा 3 में संशोधन की अपील की, ताकि ईसाई महिलाएँ अपने निवास स्थान से तलाक दायर कर सकें
  • कब: 2026, केरल हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश में
  • कहाँ: केरल हाईकोर्ट, एर्नाकुलम
  • क्यों: क्योंकि मौजूदा कानून में ईसाई महिला को तलाक के लिए पति के ज़िला न्यायालय में जाना अनिवार्य है, जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 से असमान है
  • कैसे: कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान धारा 3 और धारा 19 की तुलना करते हुए संसद को यह विसंगति दूर करने का सुझाव दिया

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारतीय तलाक अधिनियम 1869 की धारा 3 में क्या समस्या है?

धारा 3 के तहत ईसाई महिला को तलाक की अर्ज़ी उसी ज़िला न्यायालय में दायर करनी होती है जहाँ पति रहता हो। इसका मतलब है कि महिला अपने मायके या वर्तमान निवास से तलाक नहीं माँग सकती, जबकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 हिंदू महिलाओं को यह अधिकार देती है।

केरल हाईकोर्ट ने संसद से क्या अपील की?

केरल हाईकोर्ट ने संसद से अपील की है कि 1869 के तलाक अधिनियम की धारा 3 में संशोधन करके ईसाई महिलाओं को भी अपने वर्तमान निवास स्थान से तलाक दायर करने का अधिकार दिया जाए — ठीक वैसे जैसे हिंदू विवाह अधिनियम में प्रावधान है।

क्या यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है?

हाँ, अगर संसद कार्रवाई नहीं करती तो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती की ज़मीन मज़बूत होगी।

इसका UCC (समान नागरिक संहिता) से क्या संबंध है?

सरकार UCC की बात करती है, लेकिन अगर वह इस स्पष्ट धार्मिक विसंगति को दूर नहीं करती, तो विपक्ष के पास तर्क होगा कि UCC सिर्फ़ चुनावी नारा है। यह संशोधन UCC की दिशा में एक व्यावहारिक पहला क़दम माना जा सकता है।

More from India Herald

Businessमणिपाल हेल्थ का ₹8,000 करोड़ IPO — SEBI की हरी झंडी के बाद निवेशकों की जेब में दवा या दर्द?रंजन पई की मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइज़ेज़ को SEBI से मेगा IPO की मंज़ूरी मिल गई है — लेकिन जिस सेक्टर में मैक्स, अपोलो और फोर्टिस पहले से ट्रेड…
Politicsअमित शाह की 'बैसाखी' बधाई — महज़ रस्म या पंजाब में अकाली दल के बिना BJP का नया दांव?जब गठबंधन टूट चुका हो तो त्योहार की बधाई भी चुनावी ट्रेलर बन जाती है — अमित शाह की बैसाखी शुभकामनाओं में छिपा है पंजाब की ज़मीन पर BJP का अग…
Politicsखुद की पुलिस, खुद का राज — फिर सड़क पर क्यों उतरीं ममता? कालीघाट कैंडल मार्च का सचबंगाल की मुख्यमंत्री जब खुद मोमबत्ती लेकर सड़क पर उतरें, तो सवाल यह नहीं कि वे न्याय माँग रही हैं — सवाल यह है कि वे किसकी विफलता पर पर्दा ड…

Find Out More:

Related Articles: