पासपोर्ट रैंकिंग 125 — 11 साल, 140 देशों से दोस्ती, फिर भी दुनिया भारतीयों पर भरोसा क्यों नहीं करती?
हेनली पासपोर्ट इंडेक्स 2025 में भारतीय पासपोर्ट 125वें स्थान पर है और सिर्फ़ 57 देशों में वीज़ा-फ्री पहुँच देता है। कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता बताया है, जबकि विदेश मंत्रालय ने कहा है कि यह रैंकिंग भारत की वीज़ा नीति के प्रति रुख का परिणाम है।
57 — बस इतने देशों में एक भारतीय पासपोर्ट धारक बिना वीज़ा के कदम रख सकता है। जापान का पासपोर्ट 195 देशों का दरवाज़ा खोलता है, सिंगापुर का 192 का। और भारत? 125वाँ पायदान — अफ़गानिस्तान, इराक और सोमालिया जैसे देशों की पड़ोस में। किसी मिडिल-क्लास परिवार से पूछिए जिसने थाईलैंड या दुबई का प्लान बनाया है — वीज़ा की लाइन में खड़े होने का अपमान उन्हें रैंकिंग के नंबर से ज़्यादा चुभता है।
हेनली पासपोर्ट इंडेक्स की ताज़ा रिपोर्ट ने भारतीय पासपोर्ट को 125वें स्थान पर रखा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस ने इस रैंकिंग को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि 11 साल के शासन में, 140 से ज़्यादा देशों की यात्राओं और 'विश्वगुरु' के नारों के बावजूद भारत की अंतरराष्ट्रीय साख असल में गिरी है, बढ़ी नहीं। कांग्रेस ने कहा कि यह रैंकिंग भारत की 'प्रतिष्ठा' को नुकसान पहुँचाती है।
दूसरी तरफ़ विदेश मंत्रालय (MEA) ने इन आरोपों का जवाब दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, MEA ने स्पष्ट किया कि हेनली इंडेक्स केवल वीज़ा-फ्री एक्सेस के आधार पर रैंकिंग करता है, और यह भारत की समग्र कूटनीतिक ताक़त या विदेश नीति की सफलता का पैमाना नहीं है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत की वीज़ा नीति पारस्परिकता (reciprocity) के सिद्धांत पर आधारित है — भारत ख़ुद कई देशों के नागरिकों को आसानी से वीज़ा नहीं देता, तो जवाब में वे देश भी भारतीयों को वीज़ा-फ्री एक्सेस नहीं देते।
लेकिन असली कहानी न कांग्रेस के हमले में है, न MEA के बचाव में। असली कहानी उस ढाँचे में है जिसे कोई सरकार स्वीकार नहीं करना चाहती।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि कांग्रेस ने पासपोर्ट रैंकिंग का मुद्दा सोच-समझकर उठाया है। अगले कुछ महीनों में बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज़ होगी, और मिडिल-क्लास मतदाता — जो गल्फ़ और दक्षिण-पूर्व एशिया में नौकरी और छुट्टी दोनों के लिए जाता है — उसे यह मुद्दा सीधे छूता है। 'विश्वगुरु' का नारा जब वीज़ा रिजेक्शन की लाइन में खड़े आदमी के कान में गूँजे, तो वह चुनावी हथियार बन जाता है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि बीजेपी को इस मोर्चे पर जल्द कोई ठोस जवाब देना होगा, वरना विपक्ष इसे 'जुमलों बनाम हक़ीक़त' के अपने पुराने नैरेटिव में फ़िट कर लेगा। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
रैंकिंग गिरने की असली वजह — जो कोई नहीं बोलता
पासपोर्ट रैंकिंग किसी एक सरकार की विदेश नीति का रिपोर्ट कार्ड नहीं है — यह दशकों के संचित डेटा का नतीजा है। इसमें तीन बड़े फ़ैक्टर काम करते हैं जिन्हें समझना ज़रूरी है:
पहला — इमिग्रेशन ओवरस्टे डेटा। जब किसी देश के नागरिक बड़ी संख्या में वीज़ा अवधि से ज़्यादा रुकते हैं, तो मेज़बान देश वीज़ा नियम कसता है। भारतीय नागरिकों का ओवरस्टे रिकॉर्ड — ख़ासकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में — एक बड़ी रुकावट है। यह कोई नई बात नहीं, पर कोई सरकार इसे खुलकर स्वीकार नहीं करती क्योंकि इसमें वोटरों को दोष देने जैसी बात आ जाती है।
दूसरा — GDP प्रति व्यक्ति। दुनिया का एक कड़वा सच: अमीर देशों के नागरिकों पर भरोसा ज़्यादा होता है क्योंकि उनके 'वापस न लौटने' का जोखिम कम माना जाता है। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी 2,500 डॉलर के आसपास है — जापान की 33,000 डॉलर से ज़्यादा। जब तक यह अंतर नहीं पटता, रैंकिंग नाटकीय रूप से नहीं बदलेगी।
तीसरा — पारस्परिकता का जाल। MEA ने जो बात कही वह आधी सच्चाई है। भारत ख़ुद 40 से कम देशों के नागरिकों को वीज़ा-ऑन-अराइवल देता है। जब भारत ख़ुद दरवाज़े बंद रखता है, तो सामने वाला भी खोलने में हिचकिचाता है। यह चिकन-एंड-एग की समस्या है जिसे तोड़ने के लिए राजनीतिक साहस चाहिए।
इन तीनों कारणों को समझें तो साफ़ है — न यह सिर्फ़ मोदी सरकार की विफलता है जैसा कांग्रेस कह रही है, और न यह सिर्फ़ 'मापदंड की समस्या' है जैसा MEA बता रहा है। सच्चाई इन दोनों के बीच में है, और इसे इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यूँ पकड़ता है: पासपोर्ट रैंकिंग दरअसल एक आईना है जिसमें भारत की आर्थिक हैसियत, नागरिकों का व्यवहार और सरकार की कूटनीतिक प्राथमिकताएँ — तीनों एक साथ दिखती हैं।
आगे क्या — और किस पर नज़र रखें
कूटनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि अगले दो-तीन साल में भारत की रैंकिंग में बड़ा बदलाव मुश्किल है — जब तक तीन चीज़ें न हों: भारत अपनी ई-वीज़ा सूची का विस्तार करे (reciprocity तोड़े), ओवरस्टे पर कड़ी कार्रवाई का डेटा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करे, और प्रति व्यक्ति आय में ठोस बढ़ोतरी हो। इनमें से पहला काम तुरंत हो सकता है — बाक़ी दो में साल लगेंगे।
राजनीतिक रूप से, कांग्रेस ने एक ऐसा तीर चलाया है जो मिडिल-क्लास को सीधे छूता है। अगर बीजेपी ने जल्दी कोई ठोस वीज़ा-सुधार पहल नहीं की — जैसे पाँच-दस नए देशों के साथ वीज़ा-फ्री समझौता — तो 2025-26 के चुनावी मौसम में यह नैरेटिव 'जुमला बनाम हक़ीक़त' के ढाँचे में पक्का बैठ जाएगा। देखने वाली बात यह होगी कि अगले तीन महीनों में MEA कोई नई वीज़ा पारस्परिकता डील अनाउंस करता है या नहीं — वही असली जवाब होगा, प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं।
और उस लखनऊ, पटना या इंदौर के परिवार के लिए जो अगली छुट्टी का प्लान बना रहा है — सच यह है: आपके पासपोर्ट का रंग नीला है, पर दुनिया अभी उसे हरी झंडी नहीं दे रही। सवाल यह नहीं कि 'विश्वगुरु' कौन है — सवाल यह है कि विश्व अभी भारतीय नागरिक को 125वें नंबर का भरोसा क्यों देता है।
यह रिपोर्ट अभियोगों और प्रति-अभियोगों पर आधारित है जो संबंधित पक्षों को एट्रिब्यूट किए गए हैं; मामले से जुड़े किसी भी उप-न्यायिक (sub judice) पहलू पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्ट किया गया है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- हेनली पासपोर्ट इंडेक्स में भारत 125वें स्थान पर है — सिर्फ़ 57 देशों में वीज़ा-फ्री एक्सेस, जबकि जापान को 195 देशों में मिलता है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की 11 साल की विदेश नीति की 'विफलता' बताया; MEA ने कहा कि यह रैंकिंग भारत की कूटनीतिक ताक़त का पैमाना नहीं — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- पासपोर्ट ताक़त तीन कारकों पर निर्भर: इमिग्रेशन ओवरस्टे डेटा, प्रति व्यक्ति GDP, और वीज़ा पारस्परिकता — इनमें कोई भी रातोंरात नहीं बदलता।
- भारत ख़ुद 40 से कम देशों को वीज़ा-ऑन-अराइवल देता है — पारस्परिकता का यह जाल तोड़े बिना रैंकिंग सुधरना मुश्किल।
- राजनीतिक रूप से यह मुद्दा मिडिल-क्लास वोटर को सीधे छूता है — चुनावी मौसम में 'विश्वगुरु बनाम वीज़ा लाइन' एक शक्तिशाली नैरेटिव बन सकता है।
आँकड़ों में
- भारतीय पासपोर्ट: 125वीं रैंक, 57 देशों में वीज़ा-फ्री एक्सेस — हेनली पासपोर्ट इंडेक्स
- जापान: 195 देशों में वीज़ा-फ्री एक्सेस — शीर्ष रैंक — हेनली इंडेक्स
- भारत की प्रति व्यक्ति GDP लगभग 2,500 डॉलर बनाम जापान की 33,000+ डॉलर
- भारत 40 से कम देशों के नागरिकों को वीज़ा-ऑन-अराइवल देता है
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर निशाना साधा; विदेश मंत्रालय (MEA) ने जवाब दिया — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- क्या: हेनली पासपोर्ट इंडेक्स में भारत का स्थान 125वें नंबर पर आ गया, जहाँ सिर्फ़ 57 देशों में वीज़ा-फ्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एक्सेस है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- कब: 2025 की ताज़ा हेनली पासपोर्ट इंडेक्स रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने हमला बोला — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- कहाँ: भारत — नई दिल्ली से कांग्रेस ने बयान जारी किया; MEA ने भी दिल्ली से स्पष्टीकरण दिया — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- क्यों: कांग्रेस के अनुसार 11 साल के मोदी शासन और 'विश्वगुरु' के दावों के बावजूद पासपोर्ट की ताक़त नहीं बढ़ी, जो विदेश नीति की विफलता है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
- कैसे: हेनली इंडेक्स वीज़ा-फ्री एक्सेस वाले देशों की संख्या के आधार पर रैंकिंग तय करता है; भारत को 57 देशों का एक्सेस मिलता है जो उसे 125वें स्थान पर रखता है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत का पासपोर्ट हेनली इंडेक्स में कितने नंबर पर है?
हेनली पासपोर्ट इंडेक्स की ताज़ा रिपोर्ट में भारतीय पासपोर्ट 125वें स्थान पर है, जिसमें 57 देशों में वीज़ा-फ्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एक्सेस मिलता है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
भारत का पासपोर्ट कमज़ोर क्यों है?
तीन मुख्य कारण हैं: भारतीय नागरिकों का इमिग्रेशन ओवरस्टे रिकॉर्ड, कम प्रति व्यक्ति GDP (लगभग 2,500 डॉलर), और भारत का ख़ुद दूसरे देशों को सीमित वीज़ा-ऑन-अराइवल देना (पारस्परिकता का जाल)।
कांग्रेस ने पासपोर्ट रैंकिंग पर मोदी सरकार पर क्या आरोप लगाए?
कांग्रेस ने कहा कि 11 साल के शासन और 140+ देशों की यात्राओं के बावजूद भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा गिरी है, जो विदेश नीति की विफलता है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।
MEA ने पासपोर्ट रैंकिंग पर क्या कहा?
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि हेनली इंडेक्स सिर्फ़ वीज़ा-फ्री एक्सेस पर आधारित है और यह भारत की समग्र कूटनीतिक ताक़त का पैमाना नहीं है; भारत की नीति पारस्परिकता पर टिकी है — टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार।