मणिपुर को दो साल हो गए, कांगपोकपी में अभी भी 'शरणार्थी' हैं अपने ही देश में — केंद्र की प्राथमिकता सूची में मणिपुर कौन-से नंबर पर है?
मणिपुर में मई 2023 से भड़की जातीय हिंसा को दो साल बीत चुके हैं, लेकिन कांगपोकपी ज़िले में हज़ारों विस्थापित अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं। India Today NE की रिपोर्ट के अनुसार ज़मीनी हालात बदतर हैं, और केंद्र-राज्य दोनों सरकारें ठोस पुनर्वास रोडमैप देने में विफल रही हैं।
एक आँकड़ा याद रखिए — 60,000 से ज़्यादा। इतने लोग मणिपुर में मई 2023 की जातीय हिंसा के बाद विस्थापित हुए, और India Today NE की ताज़ा ज़मीनी रिपोर्ट के मुताबिक़ कांगपोकपी ज़िले में आज भी हज़ारों लोग उन्हीं राहत शिविरों में ठहरे हैं — जिन्हें 'अस्थायी' कहा गया था, लेकिन जो अब दो साल पुराने 'स्थायी पते' बन चुके हैं। ये लोग अपने ही देश में शरणार्थी हैं — बिना किसी UNHCR कार्ड के, बिना किसी अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ी के।
कांगपोकपी — मणिपुर का वह पहाड़ी ज़िला जहाँ कुकी-ज़ो समुदाय बहुसंख्यक है — हिंसा का सबसे गहरा ज़ख़्म झेलता रहा। यहाँ के गाँव जले, घर तबाह हुए, ख़ेत छूटे। दो साल बाद भी लोग उन्हीं स्कूलों, चर्चों और सामुदायिक भवनों में रह रहे हैं जो राहत शिविरों में तब्दील किए गए थे। बच्चों की पढ़ाई टूटी, बुज़ुर्गों की दवाइयाँ नहीं मिलतीं, और नौजवानों के पास न रोज़गार है न उम्मीद।
सवाल यह नहीं कि मणिपुर में क्या हुआ — वह कहानी हर कोई जानता है। असली सवाल यह है: दो साल बाद भी कुछ क्यों नहीं बदला?
ज़िम्मेदारी की पिंग-पॉन्ग — केंद्र बनाम राज्य
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह बार-बार कहते रहे हैं कि शांति बहाली हो रही है और हालात सामान्य हो रहे हैं। लेकिन India Today NE की रिपोर्टिंग और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों की ज़मीनी रिपोर्टें एक अलग तस्वीर पेश करती हैं। राज्य सरकार केंद्र की ओर उँगली उठाती है कि पर्याप्त फंड नहीं मिला, केंद्र कहता है कि सुरक्षाबल भेजे गए और फंड रिलीज़ हुआ — लेकिन ज़मीन पर पुनर्वास की ठोस योजना किसी के पास नहीं।
गृह मंत्रालय ने 2023 में कई दौर की बैठकें कीं, सुरक्षा सलाहकार भेजे, लेकिन जो एक काम नहीं हुआ वह है — एक स्पष्ट, समयबद्ध पुनर्वास रोडमैप जिसमें लिखा हो कि कौन कब घर लौटेगा, कैसे लौटेगा, और उसकी ज़मीन-मकान का क्या होगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में 'शांति' का दावा किया, लेकिन कांगपोकपी के राहत शिविरों में बैठे लोगों से पूछिए तो 'शांति' का मतलब बस यह है कि अभी गोली नहीं चल रही — ज़िंदगी तो वैसी ही ठहरी है।
पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे क्या चल रहा है?
सियासी गलियारों में यह बात खुलेआम चर्चा में है कि BJP के लिए मणिपुर अब 'प्रबंधन' का मामला है, 'समाधान' का नहीं। पार्टी की गणित सीधी है — पूर्वोत्तर में BJP ने 2018 के बाद से जो विस्तार किया, उसमें मणिपुर की दो लोकसभा सीटें और 60 विधानसभा सीटों की सरकार एक बड़ी जीत रही। लेकिन जातीय ध्रुवीकरण इतना गहरा हो चुका है कि अब कोई भी फ़ैसला — चाहे कुकी-ज़ो के पक्ष में हो या मैतेई के — दूसरे समुदाय को नाराज़ करता है।
ट्रेड हलकों और विश्लेषकों की बात मानें तो एन. बीरेन सिंह की कुर्सी इसीलिए बची है क्योंकि BJP के पास कोई ऐसा विकल्प नहीं जो दोनों समुदायों को एक साथ सँभाल सके। दिल्ली में बैठे नेतृत्व को डर है कि मुख्यमंत्री बदलने से स्थिति और बिगड़ेगी। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि यथास्थिति को ही 'नीति' मान लिया गया है — और यथास्थिति का मतलब है कांगपोकपी में ठहरा हुआ दर्द।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट सरकारी बयान नहीं।)
चुनावी हिसाब-किताब और मणिपुर की 'प्राथमिकता'
यहाँ एक कड़वा सच समझिए। मणिपुर की कुल आबादी क़रीब 30 लाख है — यानी दिल्ली के एक लोकसभा क्षेत्र से भी कम। चुनावी गणित में यह राज्य इतना छोटा है कि राष्ट्रीय अजेंडे पर इसे जगह मिलना मुश्किल है। जब UP में 80 सीटें दाँव पर हों और महाराष्ट्र में 48, तो मणिपुर की दो सीटों के लिए कौन-सा प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक पूँजी दाँव पर लगाए?
लेकिन यही वह गणित है जो लोकतंत्र की नैतिक ज़मीन को खोखला करता है। India Today NE ने कांगपोकपी से जो तस्वीरें और ज़मीनी हालात दिखाए, वे बताते हैं कि यहाँ के लोगों को न विपक्ष से उम्मीद है, न सत्ता से। कांग्रेस का पूर्वोत्तर में संगठनात्मक ढाँचा लगभग ध्वस्त है। स्थानीय दल बँटे हुए हैं। और नागरिक समाज की आवाज़ दिल्ली तक पहुँचते-पहुँचते बुझ जाती है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मणिपुर का संकट अब तीन परतों में जम चुका है — पहली परत जातीय, दूसरी प्रशासनिक विफलता की, और तीसरी वह राजनीतिक गणित जो इस संकट को 'प्रबंधनीय' श्रेणी में रखकर भूल जाने को तैयार है। जब तक यह तीसरी परत नहीं टूटती, कांगपोकपी के राहत शिविर ख़ाली नहीं होंगे।
आगे क्या? — दबाव के तीन रास्ते
पहला, सुप्रीम कोर्ट। मणिपुर हिंसा से जुड़ी कई याचिकाएँ सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं और अदालत ने कई बार सरकार से जवाब माँगा है। अगर कोर्ट ने समयबद्ध पुनर्वास का आदेश दिया, तो यह सबसे बड़ा दबाव बनेगा।
दूसरा, अंतरराष्ट्रीय। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने पहले भी मणिपुर पर चिंता जताई है। अगर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठा, तो भारत सरकार को कूटनीतिक दबाव झेलना पड़ सकता है।
तीसरा, 2027 का विधानसभा चुनाव। मणिपुर विधानसभा का अगला चुनाव 2027 में है। जैसे-जैसे वह क़रीब आएगा, BJP को कांगपोकपी और ऐसे ज़िलों में ज़मीनी काम दिखाना होगा — या फिर जातीय ध्रुवीकरण को और हवा देकर वोट बटोरने की पुरानी रणनीति अपनानी होगी। दोनों रास्तों की क़ीमत है।
एक बात और — जो कोई भी मणिपुर को 'शांत' बता रहा है, उससे पूछिए: शांत किसके लिए? दिल्ली के लिए जहाँ ख़बरें अब फ़्रंट पेज पर नहीं आतीं, या कांगपोकपी के उस परिवार के लिए जो दो साल से एक क्लासरूम में सो रहा है?
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जब 60,000 लोग दो साल से अपने ही देश में बेघर हों और संसद में उनका ज़िक्र 'शांति बहाली' की नौटंकी में दब जाए — तो सवाल सिर्फ़ मणिपुर का नहीं रहता। सवाल यह है कि भारतीय लोकतंत्र में नागरिकता का मतलब क्या है — वोट की संख्या, या इंसान की गरिमा?
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मुख्य बातें
- मणिपुर में मई 2023 की हिंसा के दो साल बाद भी कांगपोकपी ज़िले में हज़ारों विस्थापित राहत शिविरों में रह रहे हैं — India Today NE की ज़मीनी रिपोर्ट के अनुसार 'अस्थायी' शिविर अब स्थायी बस्तियाँ बन चुके हैं।
- केंद्र और राज्य सरकार के बीच ज़िम्मेदारी की पिंग-पॉन्ग जारी है — कोई समयबद्ध पुनर्वास रोडमैप सार्वजनिक नहीं किया गया।
- मणिपुर की 30 लाख आबादी और 2 लोकसभा सीटें चुनावी गणित में इतनी छोटी हैं कि राष्ट्रीय एजेंडे पर प्राथमिकता मिलना संरचनात्मक रूप से कठिन है।
- 2027 का विधानसभा चुनाव, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और अंतरराष्ट्रीय दबाव — ये तीन रास्ते हैं जो सरकार पर दबाव बना सकते हैं।
- BJP के लिए मणिपुर 'समाधान' नहीं 'प्रबंधन' का मामला बन चुका है — मुख्यमंत्री बदलने का जोख़िम कोई नहीं उठाना चाहता।
आँकड़ों में
- 60,000 से अधिक लोग मणिपुर हिंसा (मई 2023) के बाद विस्थापित हुए — India Today NE रिपोर्ट
- मणिपुर की कुल आबादी क़रीब 30 लाख — दिल्ली के एक लोकसभा क्षेत्र से भी कम
- मणिपुर में कुल 2 लोकसभा और 60 विधानसभा सीटें
- अगला मणिपुर विधानसभा चुनाव 2027 में
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: मणिपुर के कांगपोकपी ज़िले में विस्थापित कुकी-ज़ो और मैतेई समुदाय के हज़ारों लोग, जो दो साल से राहत शिविरों में रह रहे हैं।
- क्या: मई 2023 की जातीय हिंसा के बाद बड़े पैमाने पर विस्थापन — राहत शिविरों में बुनियादी सुविधाओं का संकट और पुनर्वास का अभाव।
- कब: मई 2023 से शुरू हुई हिंसा, जून 2025 तक विस्थापन और राहत शिविर जारी।
- कहाँ: मणिपुर का कांगपोकपी ज़िला — कुकी-बहुल पहाड़ी इलाक़ा जो हिंसा के सबसे गंभीर केंद्रों में रहा।
- क्यों: मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जे की माँग से उपजा जातीय तनाव, कमज़ोर प्रशासनिक प्रतिक्रिया, और केंद्र-राज्य के बीच ज़िम्मेदारी टालने की राजनीति।
- कैसे: केंद्र सरकार ने सुरक्षाबल तैनात किए लेकिन राजनीतिक समाधान या पुनर्वास रोडमैप नहीं दिया; राज्य सरकार पर पक्षपात के आरोप लगते रहे; India Today NE के अनुसार कांगपोकपी में राहत शिविर अब भी 'स्थायी बस्तियों' में बदल रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मणिपुर में कांगपोकपी ज़िले में अभी कितने विस्थापित हैं?
India Today NE की रिपोर्ट के अनुसार कांगपोकपी ज़िले में हज़ारों विस्थापित अभी भी राहत शिविरों में रह रहे हैं। राज्यव्यापी स्तर पर 60,000 से अधिक लोग मई 2023 की हिंसा के बाद विस्थापित हुए थे।
केंद्र सरकार ने मणिपुर के लिए क्या किया है?
केंद्र ने सुरक्षाबल तैनात किए, गृह मंत्रालय ने कई दौर की बैठकें कीं और सुरक्षा सलाहकार भेजे। हालाँकि, समयबद्ध पुनर्वास रोडमैप या स्थायी राजनीतिक समाधान अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।
मणिपुर में अगला विधानसभा चुनाव कब है?
मणिपुर विधानसभा का अगला चुनाव 2027 में होना है, जो BJP सरकार पर ज़मीनी काम दिखाने का दबाव बना सकता है।
मणिपुर में हिंसा क्यों शुरू हुई थी?
मई 2023 में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की माँग से जातीय तनाव भड़का, जिसके बाद कुकी-ज़ो और मैतेई समुदायों के बीच बड़े पैमाने पर हिंसा हुई।