$5 ट्रिलियन इकॉनमी, पासपोर्ट 125वें पर — 'विश्वगुरु' की ग्लोबल मोबिलिटी क्यों सिकुड़ रही है?
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत एक पायदान फिसलकर 125वें स्थान पर आ गया है। Henley & Partners की रैंकिंग के अनुसार भारतीय पासपोर्ट से सिर्फ़ 58 देशों में वीज़ा-फ़्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एक्सेस मिलता है, जबकि यूरोपीय देश 190+ देशों में बेरोकटोक घूमते हैं।
अगर किसी देश की ताक़त सिर्फ़ GDP से मापी जाती, तो भारतीय पासपोर्ट दुनिया के सबसे शक्तिशाली दस्तावेज़ों में होता। लेकिन 2026 का ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स एक कड़वी सच्चाई सामने रखता है — $5 ट्रिलियन की दहलीज़ छूने वाली अर्थव्यवस्था का पासपोर्ट 125वें नंबर पर है, और पिछले साल से एक पायदान और नीचे खिसक गया है। Hindustan Times की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पासपोर्ट से मात्र 58 देशों में वीज़ा-फ़्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल प्रवेश मिलता है।
ज़रा इस तुलना को ज़ेहन में उतारिए: नामीबिया, जिसकी GDP भारत के एक ज़िले के बराबर भी नहीं है, उसका पासपोर्ट भारत से ऊपर रैंक करता है। सिंगापुर, जो इस इंडेक्स में शीर्ष पर है, उसके नागरिक 195 देशों में बिना वीज़ा घूम सकते हैं — भारतीयों से तीन गुना ज़्यादा। News18 की रिपोर्ट बताती है कि टॉप-10 में यूरोपीय देशों का दबदबा है, और एशिया से सिर्फ़ सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया ने जगह बनाई है।
सवाल सीधा है — भारत G20 का अध्यक्ष रह चुका है, अंतरिक्ष में मिशन भेजता है, दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट नेटवर्क चलाता है — फिर उसका पासपोर्ट इतना कमज़ोर क्यों? इसका जवाब सिर्फ़ कूटनीति में नहीं, बल्कि उस दर्दनाक 'डंकी' रूट में छिपा है जिसने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भीतर से खोखला किया है।
पॉलिटिकल पल्स — ओवरस्टे और 'डंकी' इमिग्रेशन: वो ज़हर जो मध्यवर्ग पी रहा है
पासपोर्ट रैंकिंग कोई अकादमिक नंबर-गेम नहीं है — यह सीधे-सीधे इस बात का पैमाना है कि दूसरे देश भारतीय नागरिकों पर कितना भरोसा करते हैं। और यहीं पर कहानी असहज होती है। हर साल हज़ारों भारतीय वीज़ा की अवधि खत्म होने के बाद अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोप में रुके रहते हैं। 'डंकी' — यानी अवैध रास्तों से विदेश जाने का रिवाज — पंजाब, हरियाणा और गुजरात के कई इलाक़ों में लगभग सामान्य माना जाने लगा है। 2022 से 2025 के बीच अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर पकड़े गए भारतीयों की संख्या में कई गुना उछाल आया।
इसका ख़ामियाज़ा कौन भुगत रहा है? वो IT प्रोफेशनल, वो डॉक्टर, वो स्टूडेंट जो पूरी तरह वैध तरीक़े से विदेश जाना चाहता है — उसका वीज़ा इंटरव्यू में सवालों की बौछार होती है, उसका अप्लीकेशन रिजेक्ट होता है, क्योंकि कुछ हज़ार लोगों ने नियम तोड़कर पूरे देश की 'रिस्क प्रोफाइल' ख़राब कर दी है। सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि सरकार इस समस्या को जानती तो है, लेकिन डंकी रूट के ज़रिए जाने वालों के परिवार एक बड़ा वोट बैंक भी हैं — इसलिए सख्ती की राजनीतिक क़ीमत चुकाने से बचा जाता है।
डिप्लोमैटिक रेसिप्रोसिटी: जहाँ GDP काम नहीं करती
पासपोर्ट की ताक़त सिर्फ़ अर्थव्यवस्था के आकार से तय नहीं होती — यह 'रेसिप्रोसिटी' यानी पारस्परिकता पर टिकी होती है। भारत दुनिया के कई देशों को वीज़ा-ऑन-अराइवल या ई-वीज़ा देता है, लेकिन बदले में उन्हीं देशों से भारतीयों को ऐसी सुविधा नहीं मिलती। Zee News की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय देश इस इंडेक्स में इसलिए हावी हैं क्योंकि उनके बीच शेंगेन जैसे मुक्त आवागमन समझौते हैं — भारत के पास ऐसा कोई क्षेत्रीय ब्लॉक नहीं है।
SAARC देशों के साथ भी भारत की वीज़ा व्यवस्था जटिल और अविश्वास से भरी है। पाकिस्तान के साथ तो वीज़ा प्रक्रिया लगभग जमी हुई है, बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ भी सहजता नहीं। जब आपके अपने पड़ोस में ही आप दरवाज़े बंद रखते हैं, तो दूर के देश आपके लिए दरवाज़े क्यों खोलेंगे?
बड़ा सवाल — 'विश्वगुरु' की छवि और पासपोर्ट की हक़ीक़त
यहीं पर इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड सबसे ज़रूरी हो जाता है: भारत सरकार के लिए पासपोर्ट रैंकिंग एक 'ऑप्टिक्स' समस्या है जिसे वो नज़रअंदाज़ करती आई है, क्योंकि इसका कोई तत्काल चुनावी नुक़सान नहीं दिखता। लेकिन यह एक टाइम-बम है। जैसे-जैसे भारत का मध्यवर्ग बढ़ रहा है, विदेश यात्रा की माँग भी बढ़ रही है — और हर रिजेक्ट वीज़ा, हर एयरपोर्ट पर अपमानजनक पूछताछ, सरकार के 'विश्वगुरु' नैरेटिव में एक छेद करती है।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ बात यह होगी कि क्या भारत अमीरात, ब्रिटेन या EU के साथ कोई 'ट्रस्टेड ट्रैवलर' या 'फ़ास्ट-ट्रैक वीज़ा' समझौता कर पाता है। अगर ऐसा हुआ तो रैंकिंग में फ़र्क़ आ सकता है। लेकिन अगर 'डंकी' इमिग्रेशन और ओवरस्टे की समस्या पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो कोई भी कूटनीतिक प्रयास आधा-अधूरा रहेगा।
असल में, यह सिर्फ़ रैंकिंग की बात नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि एक उभरती महाशक्ति अपने ही नागरिकों को दुनिया में गरिमा के साथ चलने-फिरने का अधिकार दे पाती है या नहीं। 58 देशों का वीज़ा-फ़्री एक्सेस उस देश के लिए शर्मनाक है जो चंद्रमा पर उतर चुका है। सवाल यह है — अगली बार जब प्रधानमंत्री किसी विश्व मंच पर 'भारत की सदी' का ऐलान करें, तो क्या कोई पत्रकार पूछेगा: "सर, पासपोर्ट रैंकिंग में नामीबिया से पीछे क्यों?"
(यह इंडस्ट्री और सियासी गलियारों की चर्चा एवं प्रकाशित रिपोर्ट्स पर आधारित विश्लेषण है।)
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारत ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में 125वें स्थान पर — पिछले साल से एक पायदान नीचे; सिर्फ़ 58 देशों में वीज़ा-फ़्री एक्सेस
- 'डंकी' अवैध इमिग्रेशन और ओवरस्टे ने भारत की 'रिस्क प्रोफ़ाइल' बिगाड़ी — वैध यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है
- डिप्लोमैटिक रेसिप्रोसिटी की कमी और शेंगेन जैसे क्षेत्रीय समझौतों का अभाव मूल कारण
- सरकार के लिए यह एक 'ऑप्टिक्स टाइम-बम' है — बढ़ते मध्यवर्ग की विदेश यात्रा की माँग और वीज़ा रिजेक्शन का अपमान 'विश्वगुरु' नैरेटिव को कमज़ोर करता है
आँकड़ों में
- भारतीय पासपोर्ट से सिर्फ़ 58 देशों में वीज़ा-फ़्री/वीज़ा-ऑन-अराइवल एक्सेस — Hindustan Times
- सिंगापुर (टॉप रैंक) के नागरिकों को 195 देशों में वीज़ा-फ़्री एक्सेस — News18
- ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में टॉप-10 में यूरोपीय देशों का दबदबा — Zee News
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत और उसके 140+ करोड़ पासपोर्ट-धारक नागरिक
- क्या: ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत 125वीं रैंक पर फिसला, पिछले साल से एक स्थान नीचे — Hindustan Times के अनुसार
- कब: जुलाई 2026 में जारी Henley Passport Index रैंकिंग
- कहाँ: वैश्विक स्तर पर; भारत की रैंकिंग 199 देशों की सूची में
- क्यों: अवैध इमिग्रेशन, ओवरस्टे की ऊँची दर, डिप्लोमैटिक रेसिप्रोसिटी की कमी और वीज़ा-लिबरलाइज़ेशन समझौतों में धीमी प्रगति — News18 रिपोर्ट के अनुसार
- कैसे: Henley & Partners IATA डेटा के आधार पर वीज़ा-फ़्री एक्सेस वाले देशों की संख्या गिनकर रैंकिंग तैयार करता है — Zee News के अनुसार
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत की रैंकिंग क्या है?
Henley & Partners के ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत 125वें स्थान पर है, जो पिछले साल से एक पायदान नीचे है। भारतीय पासपोर्ट से 58 देशों में वीज़ा-फ़्री या वीज़ा-ऑन-अराइवल एक्सेस मिलता है — Hindustan Times के अनुसार।
भारत का पासपोर्ट इतना कमज़ोर क्यों है?
मुख्य कारणों में अवैध इमिग्रेशन ('डंकी' रूट), वीज़ा ओवरस्टे की ऊँची दर, डिप्लोमैटिक रेसिप्रोसिटी की कमी और शेंगेन जैसे क्षेत्रीय मुक्त आवागमन समझौतों का अभाव शामिल है।
ग्लोबल पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में टॉप पर कौन है?
News18 के अनुसार सिंगापुर 195 देशों में वीज़ा-फ़्री एक्सेस के साथ शीर्ष पर है। टॉप-10 में ज़्यादातर यूरोपीय देश हैं, और एशिया से सिंगापुर, जापान व दक्षिण कोरिया शामिल हैं।
क्या GDP बढ़ने से पासपोर्ट रैंकिंग सुधरती है?
ज़रूरी नहीं। पासपोर्ट रैंकिंग वीज़ा-फ़्री एक्सेस पर आधारित है जो द्विपक्षीय समझौतों, नागरिकों की ओवरस्टे दर, सुरक्षा प्रोफ़ाइल और डिप्लोमैटिक रेसिप्रोसिटी जैसे कारकों पर निर्भर करती है — सिर्फ़ आर्थिक आकार पर नहीं।