उधमपुर-रामनगर मार्ग पर फिर गिरा पहाड़ — क्या 'विकास' की अंधी दौड़ हिमालय को निगल रही है?

Singh Anchala

जम्मू-कश्मीर में कौघा के पास उधमपुर-रामनगर मार्ग पर भूस्खलन से सड़क पूरी तरह अवरुद्ध हो गई है। मलबा हटाने का काम जारी है, लेकिन असली सवाल यह है कि हाईवे विस्तार के नाम पर पहाड़ों की अवैज्ञानिक कटाई इन आपदाओं को न्योता दे रही है — ठीक वैसे ही जैसे जोशीमठ में हुआ।

एक पहाड़ जब टूटता है तो आवाज़ नहीं करता — वह चुपचाप खिसकता है, और जब तक लोग समझें, सड़क गायब हो चुकी होती है। जम्मू-कश्मिर के कौघा इलाक़े में उधमपुर-रामनगर मार्ग पर ठीक यही हुआ है — भूस्खलन ने पूरी सड़क लील ली, गाड़ियाँ फँसी हैं, मलबा हटाने की मशीनें लगी हुई हैं। India's News.Net की रिपोर्ट के मुताबिक़ राहत कार्य जारी है, लेकिन यह 'राहत' कितने दिन की है — यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा।

क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उधमपुर-रामनगर मार्ग, जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे, और कश्मीर की तमाम 'कनेक्टिविटी' सड़कों पर भूस्खलन इतने आम हो गए हैं कि स्थानीय लोगों ने इसे 'मौसम' मान लिया है। लेकिन क्या यह सच में सिर्फ़ मौसम है? या फिर 'विकास' के नाम पर पहाड़ों का सीना चीरने की वह अंधी दौड़ है जिसने जोशीमठ को डुबा दिया, जिसने केदारनाथ त्रासदी की ज़मीन तैयार की?

बात सीधी है: हिमालय युवा पर्वत श्रृंखला है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार जम्मू-कश्मीर का अधिकांश हिस्सा भूकंपीय ज़ोन-IV और ज़ोन-V में आता है — यानी सबसे संवेदनशील। ऐसी ज़मीन पर सड़क बनाना ज़रूरी हो सकता है, लेकिन बिना वैज्ञानिक आकलन के पहाड़ काटना आत्मघाती है। GSI की रिपोर्ट्स बार-बार चेतावनी दे चुकी हैं कि हिमालयी क्षेत्र में रोड कटिंग के दौरान ब्लास्टिंग, ड्रेनेज की अनदेखी और ढलान स्थिरीकरण में कोताही भूस्खलन को न्योता देती है।

फिर भी, ठेकेदार वही करते हैं जो सस्ता पड़ता है — ब्लास्ट करो, मलबा नीचे गिराओ, सड़क खींचो। रिटेनिंग वॉल? बाद में। ड्रेनेज? बजट में नहीं। स्लोप स्टेबिलाइज़ेशन? 'ऊपर से ऑर्डर नहीं आया।' यह सिर्फ़ कौघा की कहानी नहीं है — यह पूरे जम्मू-कश्मीर के हाईवे प्रोजेक्ट्स का पैटर्न है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि जम्मू-कश्मीर में सड़क निर्माण को लेकर केंद्र सरकार का दबाव इतना है कि पर्यावरणीय मंज़ूरियाँ 'फ़ास्ट ट्रैक' पर दी जा रही हैं — बिना ज़मीनी जाँच के। चर्चा यह भी है कि कई प्रोजेक्ट्स में ठेकेदारों और स्थानीय प्रशासन के बीच 'समझौते' हैं जिनमें सेफ़्टी ऑडिट महज़ काग़ज़ी कवायद बनकर रह जाती है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

एक बात और — जो कोई ऊपर से नहीं कहता: जम्मू-कश्मीर में 'विकास' शब्द का राजनीतिक वज़न इतना भारी है कि कोई भी पार्टी — चाहे सत्तारूढ़ हो या विपक्ष — पहाड़ कटाई पर सवाल उठाने को तैयार नहीं। विकास का विरोध = विकास-विरोधी = राष्ट्र-विरोधी — यह समीकरण इतना सीधा बना दिया गया है कि पर्यावरणविदों और भूवैज्ञानिकों की चेतावनियाँ 'एंटी-नेशनल' टैग में दब जाती हैं।

इंडिया हेराल्ड का सटीक रीड यह है कि कौघा जैसी घटनाएँ दरअसल एक बड़े सिस्टमिक फ़ेल्योर का लक्षण हैं — जिसमें सड़क निर्माण की जल्दबाज़ी, पर्यावरणीय मंज़ूरियों की लापरवाही, और 'कनेक्टिविटी' को चुनावी नारे में बदल देने की राजनीतिक ज़रूरत, तीनों मिलकर हिमालय को नष्ट कर रहे हैं। जोशीमठ ने पूरे उत्तराखंड को हिला दिया था — अब वही पैटर्न जम्मू-कश्मीर में दोहराया जा रहा है, बस नाम बदल गया है: वहाँ चारधाम हाईवे, यहाँ उधमपुर-रामनगर-श्रीनगर कनेक्टिविटी।

हिमालयन एनवायरनमेंट स्टडीज़ एंड कंज़र्वेशन ऑर्गनाइज़ेशन (HESCO) जैसी संस्थाएँ और कई स्वतंत्र भूवैज्ञानिक बार-बार कह चुके हैं कि हिमालयी सड़कों का निर्माण बिना व्यापक भू-तकनीकी सर्वेक्षण, ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी प्रबंधन के नहीं होना चाहिए। लेकिन ज़मीन पर क्या हो रहा है? उत्तराखंड में सुप्रीम कोर्ट को चारधाम प्रोजेक्ट में हस्तक्षेप करना पड़ा था — सड़क चौड़ाई को लेकर, पेड़ कटाई को लेकर। क्या जम्मू-कश्मीर में भी अदालत को ही पहल करनी पड़ेगी?

स्थानीय निवासियों की तकलीफ़ सबसे कम सुनी जाती है। रामनगर और उधमपुर के बीच रहने वाले लोग बताते हैं कि ब्लास्टिंग के दौरान उनके घरों में दरारें आ गई हैं, पानी के स्रोत सूख गए हैं, और खेत मलबे से पट गए हैं — लेकिन मुआवज़े का कोई ठोस ढाँचा नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार कई गाँवों ने प्रशासन को ज्ञापन दिए हैं, जो फ़ाइलों में दबे पड़े हैं।

एक आँकड़ा ज़ेहन में रखिए: GSI के डेटा के अनुसार भारत में हर साल भूस्खलन से औसतन 400 से अधिक मौतें होती हैं, और इनमें से बड़ा हिस्सा हिमालयी राज्यों — जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल — का है। यह संख्या बढ़ रही है, घट नहीं रही — और इसका सीधा संबंध बढ़ते निर्माण कार्यों से है।

सवाल सड़क बनाने का नहीं है — सवाल यह है कि सड़क किस क़ीमत पर बन रही है। जब पहाड़ गिरता है तो सड़क भी ग़ायब हो जाती है, गाड़ियाँ भी, और कभी-कभी ज़िंदगियाँ भी। तो फिर वह 'कनेक्टिविटी' कहाँ गई जिसके नाम पर पहाड़ काटा गया?

आने वाले हफ़्तों में मानसून की असली बारिश शुरू होगी। अगर कौघा जैसी जगहों पर ढलानें पहले से अस्थिर हैं, तो यह भूस्खलन बानगी है — असली इम्तिहान जुलाई-अगस्त में होगा। देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन अभी भी 'मलबा हटाओ और भूल जाओ' वाला रवैया रखता है, या कोई ठोस सेफ़्टी ऑडिट होता है।

क्योंकि अगर जोशीमठ ने कुछ सिखाया है, तो यह कि पहाड़ माफ़ नहीं करता — न ठेकेदार को, न नेता को, न उस 'विकास' को जो उसकी जड़ें काटकर बनाया गया।

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मुख्य बातें

  • जम्मू-कश्मीर में कौघा के पास उधमपुर-रामनगर मार्ग भूस्खलन से अवरुद्ध — मलबा हटाने का काम जारी
  • GSI के अनुसार J&K का अधिकांश हिस्सा भूकंपीय ज़ोन IV-V में — सड़क निर्माण में विशेष सावधानी अनिवार्य
  • भारत में भूस्खलन से हर साल 400+ मौतें — बड़ा हिस्सा हिमालयी राज्यों का, संख्या बढ़ रही है
  • जोशीमठ जैसी आपदा का पैटर्न J&K में दोहराया जा रहा — अवैज्ञानिक पहाड़ कटाई, ब्लास्टिंग, ड्रेनेज की अनदेखी
  • मानसून की असली बारिश से पहले सेफ़्टी ऑडिट नहीं हुआ तो जुलाई-अगस्त में हालात और गंभीर हो सकते हैं

आँकड़ों में

  • GSI के अनुसार जम्मू-कश्मीर का अधिकांश हिस्सा भूकंपीय ज़ोन-IV और ज़ोन-V में आता है
  • भारत में भूस्खलन से हर साल औसतन 400 से अधिक मौतें होती हैं — बड़ा हिस्सा हिमालयी राज्यों का

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: जम्मू-कश्मीर प्रशासन, BRO/NHAI जैसी सड़क निर्माण एजेंसियाँ, स्थानीय निवासी और वाहन चालक
  • क्या: कौघा (उधमपुर-रामनगर मार्ग) के पास भूस्खलन से सड़क पूरी तरह अवरुद्ध; मलबा हटाने का काम जारी — रिपोर्ट्स के अनुसार
  • कब: जून 2026, मानसून पूर्व दौर में — India's News.Net की रिपोर्ट के अनुसार
  • कहाँ: कौघा, उधमपुर-रामनगर मार्ग, जम्मू-कश्मीर
  • क्यों: विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में अवैज्ञानिक पहाड़ कटाई, हाईवे विस्तार और बेलगाम ब्लास्टिंग भूस्खलन का प्रमुख कारण — जलवायु परिवर्तन से बढ़ी बारिश इसे और घातक बना रही है
  • कैसे: सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों को काटा जाता है, विस्फोटकों से चट्टान तोड़ी जाती है, ढलान अस्थिर होती है और बारिश में मलबा नीचे गिरता है — यही चक्र बार-बार दोहराता है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उधमपुर-रामनगर मार्ग पर बार-बार भूस्खलन क्यों होता है?

यह मार्ग हिमालय की युवा और अस्थिर चट्टानों पर बना है, जो भूकंपीय ज़ोन-IV और V में आता है। सड़क चौड़ीकरण के लिए ब्लास्टिंग, ड्रेनेज की अनदेखी और ढलान स्थिरीकरण न होने से पहाड़ी ढलानें अस्थिर हो जाती हैं और बारिश में गिरती हैं।

क्या जम्मू-कश्मीर में जोशीमठ जैसी आपदा हो सकती है?

विशेषज्ञों के अनुसार वही पैटर्न दिख रहा है — अवैज्ञानिक निर्माण, पर्यावरणीय मंज़ूरियों में जल्दबाज़ी, स्थानीय चेतावनियों की अनदेखी। बिना ठोस सुधार के मानसून में बड़ी आपदा की आशंका बनी रहती है।

भारत में भूस्खलन से हर साल कितनी मौतें होती हैं?

GSI के आँकड़ों के अनुसार भारत में भूस्खलन से हर साल औसतन 400 से अधिक मौतें होती हैं, और इनमें सबसे बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों का है।

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