NH-48 अंडरपास 4 दिन से पानी में डूबा — करोड़ों का टोल लेकर ज़िम्मेदारी किसकी?
दिल्ली-जयपुर NH-48 पर रेलवे अंडरपास में लगातार चार दिन से पानी भरा है, जिससे कनेक्टिविटी पूरी तरह ठप है। ग्रामीणों को 20 किमी का चक्कर लगाना पड़ रहा है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, न NHAI और न रेलवे ज़िम्मेदारी ले रहा है — दोनों एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं।
बीस किलोमीटर। एक ऐसे रास्ते का चक्कर जो सीधे जाएँ तो बस कुछ सौ मीटर है। लेकिन वह कुछ सौ मीटर का अंडरपास चार दिन से छाती भर पानी में डूबा है — और उस पानी में डूबी है देश के सबसे व्यस्त राजमार्गों में से एक, दिल्ली-जयपुर NH-48, की सारी 'विकास' कहानी।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार NH-48 पर स्थित रेलवे अंडरपास में लगातार चौथे दिन भी पानी भरा हुआ है। कनेक्टिविटी पूरी तरह ठप है। आसपास के गाँवों के लोग — किसान, स्कूल जाने वाले बच्चे, मरीज़ — सब 20 किलोमीटर का चक्कर काटकर अपने रोज़मर्रा के काम पूरे कर रहे हैं। ग्रामीणों ने दैनिक भास्कर से कहा कि न कोई अधिकारी आया, न कोई पंप लगा, बस एक सन्नाटा है जो पानी से भी गहरा है।
अब ज़रा हिसाब लगाइए। NH-48 पर आप टोल देते हैं — हर बार, हर वाहन पर। NHAI (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) को इस हाईवे से करोड़ों रुपये का राजस्व मिलता है। बदले में वो क्या देता है? एक ऐसा अंडरपास जो पहली बारिश में तालाब बन जाए। यह कोई नई बात नहीं है — हर मानसून में देश भर के अंडरपास और फ्लाईओवर के नीचे की सड़कें डूबती हैं। लेकिन चार दिन? चार दिन तक पानी निकालने की व्यवस्था न होना — यह लापरवाही नहीं, यह व्यवस्था का दिवालियापन है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस मामले पर फुसफुसाहट यह है कि असली खेल ज़िम्मेदारी की 'पिंग-पॉन्ग' में है। NHAI कहता है कि अंडरपास रेलवे की ज़मीन पर है, इसलिए ड्रेनेज की ज़िम्मेदारी रेलवे की है। रेलवे कहता है कि सड़क NHAI की है, तो पानी निकालना उनका काम है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट से यही तस्वीर उभरती है — दोनों एजेंसियाँ एक-दूसरे की तरफ़ उँगली उठाकर अपना पल्ला झाड़ रही हैं। इस बीच जनता? जनता 20 किमी का चक्कर काट रही है, पेट्रोल और समय दोनों जला रही है।
ट्रेड हलकों और इंफ्रास्ट्रक्चर विश्लेषकों के बीच चर्चा यह है कि NHAI और रेलवे के बीच 'इंटरफ़ेस' ज़ोन — यानी वे जगहें जहाँ रेलवे लाइन और राजमार्ग मिलते हैं — भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर का सबसे बड़ा ब्लाइंड स्पॉट हैं। कोई एक मालिक नहीं, कोई एक जवाबदेह नहीं। ये अंडरपास तो बन जाते हैं, लेकिन इनके रखरखाव का ठेका किसी के नाम नहीं। नतीजा — हर मानसून एक नई त्रासदी, हर साल वही रटी-रटाई शिकायत, और हर बार वही सरकारी चुप्पी।
(यह सेक्शन इंडस्ट्री चर्चा और सार्वजनिक सूचनाओं पर आधारित विश्लेषण है, किसी पक्ष पर आरोप नहीं।)
टोल लेते हो, तो तालाब भी सुखाओ
इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यह है कि यह मामला सिर्फ़ जलभराव का नहीं है — यह भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर गवर्नेंस के उस मूलभूत दोष का है जहाँ निर्माण पर अरबों खर्च होते हैं, लेकिन रखरखाव बजट में सबसे पहले कटौती होती है। NHAI का अपना सालाना बजट हज़ारों करोड़ का है — केंद्रीय बजट दस्तावेज़ इसकी पुष्टि करते हैं — लेकिन ड्रेनेज पंप जैसी बुनियादी चीज़ के लिए चार दिन तक कोई हलचल नहीं? सवाल यह है कि अगर एक अंडरपास का पानी चार दिन में नहीं निकाल सकते, तो उन करोड़ों का टोल किस बात का?
दैनिक भास्कर ने जो ग्रामीणों की आवाज़ें दर्ज की हैं, वे सिर्फ़ शिकायत नहीं हैं — वे एक सवाल हैं सीधा सत्ता से। एक ग्रामीण ने कहा कि एंबुलेंस तक इस रास्ते से नहीं आ सकती। ज़रा सोचिए — चार दिन तक अगर किसी को दिल का दौरा पड़े, तो उसे 20 किमी का चक्कर काटकर अस्पताल जाना होगा। यह 'विकास' है या विडंबना?
आगे क्या होगा — और क्या देखना चाहिए
आने वाले दिनों में दो बातें देखने लायक हैं। पहली — क्या स्थानीय प्रशासन या कोई जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को उठाता है और NHAI-रेलवे के बीच की ज़िम्मेदारी का फैसला करवाता है। अगर नहीं, तो समझिए यह मानसून भी पिछले मानसून जैसा ही गुज़रेगा। दूसरी — क्या केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय NHAI-रेलवे इंटरफ़ेस ज़ोन के लिए कोई एकीकृत रखरखाव नीति लाता है। जब तक ऐसा नहीं होता, हर बारिश में कोई न कोई अंडरपास डूबेगा और कोई न कोई गाँव कटेगा।
NH-48 का यह अंडरपास एक सड़क की कहानी नहीं है — यह उस पूरी व्यवस्था का आईना है जहाँ उद्घाटन के दिन फीता काटा जाता है, फ़ोटो खिंचती है, और फिर उस ढाँचे को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। टोल तो बढ़ता रहेगा — सवाल यह है कि क्या वो 20 किलोमीटर का चक्कर भी?
इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप और शिकायतें नामित स्रोतों को एट्रिब्यूट की गई हैं और जब तक कोई न्यायिक निर्णय न हो, अप्रमाणित मानी जाएँगी; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- NH-48 पर रेलवे अंडरपास में लगातार 4 दिन से जलभराव — कनेक्टिविटी पूरी तरह ठप, ग्रामीण 20 किमी का चक्कर लगा रहे (दैनिक भास्कर)
- NHAI और रेलवे दोनों ज़िम्मेदारी से बच रहे — 'इंटरफ़ेस ज़ोन' का कोई एकल मालिक नहीं
- करोड़ों का टोल राजस्व वसूला जा रहा है लेकिन ड्रेनेज पंप जैसी बुनियादी सुविधा तक नदारद
- जब तक केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय NHAI-रेलवे के रखरखाव विवाद को सुलझाने की नीति नहीं लाता, हर मानसून यही दृश्य दोहराएगा
आँकड़ों में
- NH-48 रेलवे अंडरपास में 4 दिन से लगातार जलभराव — ग्रामीणों को 20 किमी का वैकल्पिक चक्कर (दैनिक भास्कर)
- NHAI का सालाना बजट हज़ारों करोड़ — लेकिन एक अंडरपास का पानी 4 दिन में नहीं निकला (केंद्रीय बजट दस्तावेज़ एवं दैनिक भास्कर)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: NH-48 रेलवे अंडरपास से जुड़े गाँवों के ग्रामीण, NHAI और भारतीय रेलवे — दैनिक भास्कर
- क्या: अंडरपास में चार दिन से भारी जलभराव, कनेक्टिविटी पूरी तरह ठप — दैनिक भास्कर
- कब: जुलाई 2026, लगातार चार दिनों से — दैनिक भास्कर
- कहाँ: दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग NH-48 पर स्थित रेलवे अंडरपास — दैनिक भास्कर
- क्यों: अंडरपास में ड्रेनेज सिस्टम या तो बना नहीं या काम नहीं कर रहा, और NHAI-रेलवे के बीच ज़िम्मेदारी का विवाद — दैनिक भास्कर
- कैसे: बारिश का पानी अंडरपास में जमा हो गया, पंपिंग व्यवस्था नदारद, ग्रामीणों को 20 किमी का वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ रहा है — दैनिक भास्कर
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
NH-48 रेलवे अंडरपास में पानी क्यों भरा है?
दैनिक भास्कर के अनुसार अंडरपास में ड्रेनेज सिस्टम या तो बना नहीं या काम नहीं कर रहा। बारिश का पानी जमा हो गया है और चार दिन से निकाला नहीं गया।
अंडरपास के जलभराव की ज़िम्मेदारी किसकी है — NHAI या रेलवे?
दोनों एजेंसियाँ एक-दूसरे पर दोष मढ़ रही हैं। NHAI का कहना है ज़मीन रेलवे की है, रेलवे कहता है सड़क NHAI की है। यही 'इंटरफ़ेस ज़ोन' विवाद इस समस्या की जड़ है।
ग्रामीणों को कितना अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ रहा है?
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण 20 किलोमीटर का वैकल्पिक चक्कर लगाकर अपने रोज़मर्रा के काम पूरे कर रहे हैं।