मणिपुर MLA की लाश 4 महीने मुर्दाघर में — जब सिटिंग विधायक को दफनाने की जगह नहीं तो आम आदमी का क्या होगा?

Singh Anchala

मणिपुर के एक सिटिंग विधायक, जिन पर 2023 के जातीय हिंसा दौर में बर्बर हमला हुआ था, उनकी मृत्यु के बाद शव लगभग चार महीने मुर्दाघर में रखा रहा। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कुकी-मैतेई विवाद के कारण अंतिम संस्कार की जगह तक तय नहीं हो सकी।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: मणिपुर के एक सिटिंग विधायक जिन पर 2023 में जातीय हिंसा के दौरान जानलेवा हमला हुआ था।
  • क्या: उनकी मृत्यु के बाद शव लगभग चार महीने तक मुर्दाघर में रखा गया और अब अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही है — द इंडियन एक्सप्रेस।
  • कब: 2023 में हमला हुआ; मृत्यु के बाद शव 2025-26 तक मुर्दाघर में रहा और अब दफनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • कहाँ: मणिपुर, पूर्वोत्तर भारत — जहाँ कुकी और मैतेई समुदायों के बीच गहरा जातीय विभाजन है।
  • क्यों: कुकी-मैतेई जातीय संघर्ष के चलते विधायक के गृह क्षेत्र तक पहुँच और अंतिम संस्कार की जगह पर सहमति नहीं बन सकी।
  • कैसे: जातीय विभाजन ने भौगोलिक सीमाएँ इतनी कठोर कर दीं कि शव को एक समुदाय के इलाके से दूसरे तक ले जाना सम्भव नहीं रहा; प्रशासनिक और राजनीतिक उदासीनता ने स्थिति और बिगाड़ी।

एक सिटिंग विधायक। एक जनप्रतिनिधि, जिसे संविधान ने जनता की आवाज़ का दर्जा दिया। और उसका शव — चार महीने तक — मुर्दाघर के फ्रीज़र में पड़ा रहा, क्योंकि एक पूरा राज्य-तंत्र उसे दफनाने की जगह तय करने में नाकाम रहा। यह कोई गुमनाम नागरिक की कहानी नहीं है। यह मणिपुर के एक निर्वाचित विधायक की कहानी है, जो 2023 के उस ख़ूनी जातीय संघर्ष का शिकार हुए जिसने इस छोटे-से राज्य को दो टुकड़ों में बाँट दिया।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस मणिपुर MLA पर 2023 की कुकी-मैतेई हिंसा के दौरान बर्बर हमला हुआ था। लम्बे इलाज के बावजूद वे बच नहीं सके। लेकिन असली त्रासदी मौत के बाद शुरू हुई — उनका शव लगभग चार महीने तक मुर्दाघर में रखा रहा, क्योंकि कुकी-बहुल पहाड़ी इलाकों और मैतेई-बहुल घाटी के बीच की जातीय खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि एक शव को भी एक ज़ोन से दूसरे ज़ोन ले जाना सम्भव नहीं रहा।

ज़रा इस बात को ज़ेहन में बिठाइए: भारतीय लोकतंत्र में एक विधायक — जिसे राज्य की सुरक्षा मिलनी चाहिए, जिसकी गरिमा संविधान का वादा है — उसका पार्थिव शरीर महीनों तक इसलिए अटका रहा क्योंकि दो समुदाय एक-दूसरे की ज़मीन पर क़दम रखने को तैयार नहीं हैं। और इस बीच न दिल्ली से कोई सार्थक हस्तक्षेप आया, न इम्फाल से कोई फ़ैसला।

पॉलिटिकल पल्स — वो सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा

सियासी गलियारों में जो बात फुसफुसाहट में कही जा रही है, वह यह है कि मणिपुर में अब 'राज्य' नाम की कोई एक इकाई बची ही नहीं। इस विधायक के मामले ने यह साबित कर दिया कि जातीय विभाजन ने प्रशासनिक तंत्र को भी दो हिस्सों में तोड़ दिया है। विश्लेषकों का अनुमान है कि पहाड़ी और घाटी के बीच अब एक 'अनकही सीमा' बन चुकी है जिसे न पुलिस पार कर पा रही है, न नेता, और न ही एक शव।

रिपोर्ट्स के मुताबिक़, राज्य सरकार ने कई बार अंतिम संस्कार के लिए सुरक्षा देने का भरोसा दिया, लेकिन ज़मीनी हालात इतने तनावपूर्ण बने रहे कि हर बार फ़ैसला टलता गया। दूसरी ओर, केंद्र सरकार — जिसने मणिपुर में अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती कर रखी है — ने इस विशेष मामले में कोई विशेष पहल नहीं की। एक सिटिंग विधायक के अंतिम संस्कार के लिए सेना या CRPF का सुरक्षा कवच मुहैया कराना क्या इतना मुश्किल था? यह सवाल आज तक अनुत्तरित है।

इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यह है कि यह मामला मणिपुर की 'सामान्य स्थिति' के दावों की पोल खोलता है। जब एक जनप्रतिनिधि को दफनाने तक में चार महीने लगें, तो आम कुकी या मैतेई नागरिक की स्थिति क्या होगी — यह कल्पना से परे है।

120 दिन, एक शव, और टूटा हुआ संघीय ढाँचा

भारत के संघीय ढाँचे में राज्य सरकार का सबसे बुनियादी कर्तव्य है — अपने नागरिकों की जान और गरिमा की रक्षा। मणिपुर में यह कर्तव्य पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषकों के हवाले से यह बात सामने आती है कि मई 2023 से शुरू हुई हिंसा ने 200 से ज़्यादा जानें ली हैं, हज़ारों घर जलाए गए हैं, और दोनों समुदायों के बीच ज़मीनी रूप से एक 'बफ़र ज़ोन' बन चुका है जिसे कोई पार नहीं कर सकता।

इस विधायक का मामला इसलिए और त्रासद है क्योंकि वे स्वयं एक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे जो जातीय रूप से संवेदनशील है। उनकी हत्या की कोशिश ही इस बात का सबूत थी कि मणिपुर में राजनीतिक पद भी किसी को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता। और मौत के बाद अंतिम संस्कार का न हो पाना — यह उस गारंटी के पूर्ण विघटन की मोहर है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक दलों — सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों — ने इस मामले पर लगभग चुप्पी साध रखी है। न संसद में कोई सार्थक सवाल उठा, न किसी राष्ट्रीय नेता ने इस विशेष विधायक के मामले पर कोई बयान जारी किया। (इस बारे में राज्य सरकार या केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।)

आगे क्या — दफनाने से क्या सुलझेगा?

अब जबकि अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई है, सवाल यह है कि क्या यह महज़ एक प्रतीकात्मक 'समाधान' है या इससे कुछ बदलेगा। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि मणिपुर में जातीय विभाजन कम होने के बजाय और गहरा हुआ है। कुकी संगठन अलग प्रशासन की माँग पर अड़े हैं। मैतेई पक्ष इम्फाल घाटी की 'अखंडता' को लेकर सख़्त है। और इन दोनों के बीच फँसी हुई है एक सरकार जो — विश्लेषकों के मुताबिक़ — जातीय रूप से एक पक्ष की ओर झुकी हुई दिखती है।

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आने वाले हफ़्तों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह अंतिम संस्कार शांति से सम्पन्न हो पाता है या इसके इर्द-गिर्द नया तनाव पैदा होता है। अगर कुकी नेतृत्व और मैतेई संगठनों के बीच इस एक मामले पर भी सहमति बनाने में दिल्ली को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो यह मणिपुर की 'सामान्य स्थिति' के हर दावे को खोखला साबित कर देगा।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल वह है जो इस पूरे प्रकरण के केंद्र में है और जिसका जवाब कोई नहीं दे रहा: अगर एक सिटिंग विधायक — जिसके पास संवैधानिक दर्जा है, सुरक्षा का अधिकार है, राज्य मशीनरी तक पहुँच है — उसे दफनाने में चार महीने लगे, तो उस गुमनाम किसान, उस छोटे दुकानदार, उस स्कूल की अध्यापिका का क्या होगा, जिनकी मौत पर न कोई अख़बार छपेगा, न कोई रिपोर्ट आएगी?

मणिपुर का यह मुर्दाघर सिर्फ़ एक शव रखने की जगह नहीं है — यह भारतीय लोकतंत्र के उस वादे का ताबूत है जो कहता है कि राज्य अपने हर नागरिक की गरिमा की रक्षा करेगा। वह वादा, फ़िलहाल, फ्रीज़र में पड़ा है।

(यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषणों पर आधारित है। जहाँ आरोप हैं, वे स्रोतों के हवाले से हैं और अदालत द्वारा सिद्ध नहीं माने जाने चाहिए। इसमें उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न आए, अप्रमाणित हैं; उप-न्यायिक मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।)

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • एक सिटिंग विधायक का शव लगभग 4 महीने (करीब 120 दिन) मुर्दाघर में रखा गया — द इंडियन एक्सप्रेस
  • मई 2023 से मणिपुर जातीय हिंसा में 200 से अधिक मौतें और हज़ारों घर नष्ट — मीडिया रिपोर्ट्स

मुख्य बातें

  • मणिपुर के एक सिटिंग विधायक का शव मृत्यु के बाद लगभग चार महीने मुर्दाघर में रखा रहा — कुकी-मैतेई जातीय विभाजन के कारण अंतिम संस्कार की जगह तय नहीं हो सकी।
  • 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा ने मणिपुर को भौगोलिक और प्रशासनिक रूप से दो हिस्सों में बाँट दिया है — 200 से अधिक मौतें, हज़ारों विस्थापित।
  • राज्य और केंद्र सरकार दोनों ने इस विशेष मामले में सार्थक हस्तक्षेप नहीं किया — राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की चुप्पी सवाल खड़े करती है।
  • अगर एक संवैधानिक पद वाले जनप्रतिनिधि की यह दुर्गति है, तो आम नागरिक की स्थिति कहीं अधिक भयावह है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मणिपुर के विधायक का शव 4 महीने मुर्दाघर में क्यों रखा गया?

कुकी-मैतेई जातीय संघर्ष के कारण शव को विधायक के गृह क्षेत्र तक ले जाना और अंतिम संस्कार की जगह तय करना सम्भव नहीं हो सका। दोनों समुदायों के बीच की भौगोलिक और राजनीतिक दरार ने शव के अंतिम संस्कार को महीनों तक रोके रखा — द इंडियन एक्सप्रेस।

मणिपुर में कुकी-मैतेई हिंसा कब शुरू हुई?

मई 2023 में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा भड़की, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए और हज़ारों विस्थापित हुए। तब से तनाव बना हुआ है।

केंद्र सरकार ने इस मामले में क्या किया?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र ने मणिपुर में अर्धसैनिक बल तैनात किए हैं, लेकिन इस विशेष विधायक के अंतिम संस्कार के लिए कोई विशेष सुरक्षा कवच या हस्तक्षेप सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया।

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