मनरेगा पर 'पैक-अप' का खेल? राजस्थान में VB-GRAMG लागू होते ही गाँवों में बवाल — क्या BJP अपनी ही ज़मीन खोद रही है?
राजस्थान में केंद्र सरकार के VB-GRAMG पायलट ने मनरेगा को प्रभावी रूप से रिप्लेस करना शुरू किया है, जिससे ग्रामीण मज़दूरों में व्यापक विरोध भड़का है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, कम मज़दूरी, अनिश्चित रोज़गार गारंटी और अधिकारों में कटौती के ख़िलाफ़ ग्रामीण सड़कों पर उतर आए हैं — जो BJP के हिंदी बेल्ट में बड़ा राजनीतिक रिस्क है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: राजस्थान के ग्रामीण मज़दूर और कांग्रेस-समर्थित विपक्षी दल — केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की BJP सरकार के ख़िलाफ़।
- क्या: VB-GRAMG (विश्वकर्मा बंधु ग्रामीण महात्मा गांधी योजना) के पायलट प्रोजेक्ट ने मनरेगा को प्रभावी रूप से विस्थापित किया, जिससे व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।
- कब: 2025-2026 में पायलट लागू; विरोध प्रदर्शन हालिया हफ़्तों में तेज़ हुए (टाइम्स ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट, 2026)।
- कहाँ: राजस्थान के ग्रामीण ज़िलों में — विशेषकर पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान में जहाँ मनरेगा पर निर्भरता सर्वाधिक है।
- क्यों: VB-GRAMG में मज़दूरी दरें मनरेगा से कम बताई जा रही हैं, 100 दिन की रोज़गार गारंटी स्पष्ट नहीं, और क़ानूनी अधिकारों (सोशल ऑडिट, बेरोज़गारी भत्ता) का प्रावधान कमज़ोर है।
- कैसे: केंद्र सरकार ने राजस्थान में VB-GRAMG को पायलट के तौर पर लॉन्च किया; मनरेगा का बजट और कार्यान्वयन धीरे-धीरे इसमें समाहित किया जा रहा है, जिससे पुरानी योजना के लाभार्थी नई व्यवस्था में फँस गए।
₹342 रोज़ाना मज़दूरी की गारंटी — यह वह रक़म है जो राजस्थान के एक मनरेगा मज़दूर के हाथ में महीने में सौ दिन तक आती थी। अब उसी मज़दूर से कहा जा रहा है कि वह एक नया फ़ॉर्म भरे, नई योजना में नाम दर्ज कराए, और भरोसा रखे कि 'VB-GRAMG' उसका पेट भरेगी। राजस्थान के गाँवों ने अपना जवाब सड़क पर आकर दे दिया है।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में केंद्र सरकार के नए पायलट प्रोजेक्ट VB-GRAMG — विश्वकर्मा बंधु ग्रामीण महात्मा गांधी योजना — के ख़िलाफ़ कई ज़िलों में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे हैं। मज़दूरों का आरोप है कि यह योजना UPA सरकार की सबसे बड़ी ग्रामीण उपलब्धि — मनरेगा — को चुपचाप ख़त्म करने की 'रीब्रांडिंग एक्सरसाइज़' है।
सवाल सीधा है: क्या मोदी सरकार वाक़ई भारत के सबसे बड़े ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम का 'नामोनिशान' मिटा रही है? और अगर हाँ, तो यह राजनीतिक आत्मघात क्यों नहीं है?
मनरेगा बनाम VB-GRAMG — फ़र्क़ सिर्फ़ नाम का नहीं
मनरेगा (MGNREGA) 2005 में UPA सरकार ने एक क़ानूनी अधिकार के रूप में पेश किया था — हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन का रोज़गार, न मिले तो बेरोज़गारी भत्ता, और सोशल ऑडिट का प्रावधान। इसकी ताक़त यही थी: यह 'योजना' नहीं, 'अधिकार' था। मज़दूर माँग सकता था, सरकार को देना पड़ता था।
VB-GRAMG की जो रूपरेखा अब तक सामने आई है, उसमें यह क़ानूनी ढाँचा धुँधला है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, VB-GRAMG में मज़दूरी दरें मनरेगा से कम हो सकती हैं, 100 दिन की गारंटी स्पष्ट नहीं है, और सोशल ऑडिट जैसे जवाबदेही तंत्र का ज़िक्र कमज़ोर है। सबसे अहम बात — मनरेगा एक संसद द्वारा पारित क़ानून है; VB-GRAMG फ़िलहाल एक कार्यकारी योजना के रूप में लागू हो रही है। फ़र्क़ बुनियादी है: क़ानून बदलने के लिए संसद चाहिए, योजना बदलने के लिए एक सरकारी आदेश काफ़ी है।
यही वह बिंदु है जो गाँव के मज़दूर को डरा रहा है। उसे डर नहीं कि नाम बदल गया — उसे डर है कि अधिकार बदल गया। जब आप 'एंटाइटलमेंट' को 'स्कीम' में बदलते हैं, तो आप वापस ले सकते हैं — और मज़दूर जानता है।
राजनीतिक पल्स — ग्राउंड ज़ीरो पर क्या कह रहे हैं लोग?
राजस्थान के ग्रामीण इलाक़ों में जो गुस्सा दिख रहा है, वह सिर्फ़ मज़दूरी के रुपयों का नहीं — यह एक गहरे अविश्वास का है। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि BJP ने मनरेगा को 'कांग्रेसी विरासत' मानकर हमेशा नज़रअंदाज़ किया — याद कीजिए, ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में संसद में मनरेगा को 'कांग्रेस की विफलता का जीता-जागता स्मारक' कहा था। अब उसी 'स्मारक' को ढहाने की क़वायद शुरू हो गई लगती है।
लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त राजनीतिक लफ़्फ़ाज़ी से बहुत अलग है। राजस्थान में मनरेगा से हर साल लाखों परिवार जुड़ते हैं — ख़ासकर सूखे और फ़सल ख़राबी के मौसम में यह 'आख़िरी सहारा' बन जाता है। ग्रामीण महिलाओं के लिए तो मनरेगा सिर्फ़ रोज़गार नहीं, आर्थिक आज़ादी का ज़रिया है — कुल मनरेगा मज़दूरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 50% से ऊपर रही है।
ट्रेड विश्लेषकों और ग्रामीण अर्थशास्त्रियों के बीच चर्चा है कि VB-GRAMG का असली मक़सद मनरेगा को ख़त्म करना नहीं, बल्कि उसे 'रीपैकेज' करके NDA का ब्रांड बनाना है — ठीक वैसे ही जैसे UPA की 'राजीव गांधी आवास योजना' को 'प्रधानमंत्री आवास योजना' में बदला गया। लेकिन इस बार रीब्रांडिंग के साथ 'डाउनग्रेड' की शिकायत जुड़ गई है — और यहीं से मामला राजनीतिक बारूद बन गया।
(यह खंड इंडस्ट्री चर्चा और ग्रामीण स्तर की अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
BJP का हिंदी बेल्ट जोखिम — नंबर जो बोलते हैं
यहाँ एक आँकड़ा ग़ौर करने लायक़ है: राजस्थान में 2023 के विधानसभा चुनाव में BJP ने 115 सीटें जीतीं — इनमें से 70 से ज़्यादा ग्रामीण या अर्ध-ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र थे। मनरेगा के सबसे ज़्यादा लाभार्थी इन्हीं इलाक़ों में हैं। अगर VB-GRAMG से मज़दूरी में कटौती या रोज़गार दिनों में कमी की शिकायत टिकती रही, तो BJP अपने ही गढ़ में ज़मीन खोदेगी।
इसे और व्यापक फ्रेम में देखें: मनरेगा सिर्फ़ राजस्थान की कहानी नहीं। यह UP, बिहार, MP, छत्तीसगढ़ — पूरे हिंदी बेल्ट की जीवनरेखा है। अगर VB-GRAMG राजस्थान का 'पायलट' है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की योजना है, तो BJP का पूरा ग्रामीण वोट-बैंक गणित ख़तरे में आ सकता है। कांग्रेस के लिए यह 'गोल्डन ऑपर्च्युनिटी' है — मनरेगा हमेशा से उसकी 'ब्रांड स्कीम' रही है, और अगर BJP इसे ख़त्म करती दिखी, तो विपक्ष के पास एक रेडीमेड नैरेटिव है: 'ग़रीबों का अधिकार छीना'।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड साफ़ है — VB-GRAMG के पीछे का कैलकुलेशन सिर्फ़ 'प्रशासनिक सुधार' नहीं, यह एक विरासत की राजनीति है जहाँ मोदी सरकार UPA की हर बड़ी योजना पर अपनी मुहर लगाना चाहती है। लेकिन जब मुहर लगाते हुए अधिकारों में कटौती दिखती है, तो 'रीब्रांडिंग' का खेल 'रिजेक्शन' में बदल जाता है।
कांग्रेस के लिए मौक़ा, लेकिन कितना?
विपक्ष के लिए यह मुद्दा सोने पर सुहागा है — लेकिन कांग्रेस की हालिया ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो सवाल यह है कि क्या वह इस मौक़े को भुना पाएगी। राजस्थान में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमज़ोर है — 2023 की हार के बाद नेतृत्व विवाद अभी तक सुलझा नहीं। लेकिन ग्रामीण स्तर पर मनरेगा का नाम अभी भी 'कांग्रेस' से जुड़ता है, और अगर सड़कों पर विरोध बढ़ता रहा, तो कांग्रेस को कुछ ख़ास करने की ज़रूरत भी नहीं — गुस्सा ख़ुद-ब-ख़ुद BJP के ख़िलाफ़ मतदान में बदलेगा।
दूसरी तरफ़, BJP अभी इस विरोध को 'कांग्रेस प्रायोजित' बताने की कोशिश कर सकती है — यह NDA का क्लासिक 'विपक्षी साज़िश' नैरेटिव है। लेकिन जब गाँव की महिला सड़क पर फावड़ा लेकर खड़ी हो, तो 'साज़िश' वाला तर्क बहुत दूर तक नहीं जाता।
आगे क्या देखना है?
इस कहानी का अगला अध्याय तीन चीज़ों पर टिका है। पहला — क्या केंद्र सरकार VB-GRAMG की मज़दूरी दरों और रोज़गार गारंटी को मनरेगा के बराबर लाती है? अगर हाँ, तो विरोध ठंडा पड़ सकता है — अगर नहीं, तो आग और फैलेगी। दूसरा — क्या यह पायलट सिर्फ़ राजस्थान तक सीमित रहता है या 2026-27 में UP, MP, बिहार में भी लागू होता है? अगर राष्ट्रीय विस्तार हुआ, तो हिंदी बेल्ट के आगामी चुनावों में यह 'मनरेगा बनाम VB-GRAMG' मुद्दा केंद्रीय बन सकता है। और तीसरा — सुप्रीम कोर्ट। मनरेगा एक संसदीय क़ानून है; अगर VB-GRAMG उसे बिना संसदीय संशोधन के प्रभावी रूप से बदलती है, तो न्यायिक चुनौती की संभावना बनती है।
BJP सरकार से अब तक VB-GRAMG और मनरेगा के बीच के स्पष्ट अंतर पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
एक बात तय है — राजस्थान के गाँवों में जो बीज बोया गया है, वह फ़सल किसी की भी हो सकती है। लेकिन अभी तूफ़ान जिसकी तरफ़ बढ़ रहा है, वह दिल्ली की सत्ता गलियारे हैं। जिस योजना से गाँव की आख़िरी महिला का चूल्हा जलता है, उसे बदलने का ख़र्चा सिर्फ़ रुपयों में नहीं — वोटों में चुकाना पड़ता है।
AI सहायता से इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के अंतर्गत रिपोर्ट और लिखित; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक अदालत निर्णय न दे, अप्रमाणित रहते हैं; न्यायालय में विचाराधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
आँकड़ों में
- राजस्थान में BJP ने 2023 में 115 विधानसभा सीटें जीतीं, जिनमें 70+ ग्रामीण या अर्ध-ग्रामीण थीं — मनरेगा के सर्वाधिक लाभार्थी इन्हीं क्षेत्रों में हैं।
- मनरेगा में राजस्थान की मज़दूरी दर ₹342 प्रतिदिन — VB-GRAMG में यह कम होने की शिकायत विरोध का मूल कारण है।
- मनरेगा में महिलाओं की हिस्सेदारी 50% से ऊपर रही है — VB-GRAMG में इस प्रावधान की स्पष्टता नहीं।
मुख्य बातें
- राजस्थान में VB-GRAMG पायलट ने मनरेगा को प्रभावी रूप से विस्थापित किया — ग्रामीण मज़दूरों ने कम मज़दूरी और अधिकारों में कटौती के ख़िलाफ़ सड़कों पर विरोध किया।
- मनरेगा संसदीय क़ानून है, VB-GRAMG कार्यकारी योजना — यह फ़र्क़ बुनियादी है क्योंकि योजना को सरकारी आदेश से बदला जा सकता है, क़ानून को नहीं।
- BJP की 70+ ग्रामीण सीटें राजस्थान में ख़तरे में आ सकती हैं — मनरेगा लाभार्थियों का गुस्सा हिंदी बेल्ट में पार्टी के वोट-बैंक गणित को बिगाड़ सकता है।
- अगर VB-GRAMG का राष्ट्रीय विस्तार हुआ तो UP, बिहार, MP में भी 'मनरेगा बनाम VB-GRAMG' चुनावी मुद्दा बन सकता है।
- कांग्रेस के लिए यह रेडीमेड नैरेटिव है — 'ग़रीबों का अधिकार छीना' — लेकिन संगठनात्मक कमज़ोरी इसे भुनाने में बाधक है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
VB-GRAMG क्या है और यह मनरेगा से कैसे अलग है?
VB-GRAMG (विश्वकर्मा बंधु ग्रामीण महात्मा गांधी योजना) केंद्र सरकार की एक नई कार्यकारी योजना है जो राजस्थान में पायलट के तौर पर लागू हुई है। मनरेगा एक संसदीय क़ानून है जो 100 दिन की रोज़गार गारंटी, बेरोज़गारी भत्ता और सोशल ऑडिट का अधिकार देता है। VB-GRAMG में ये क़ानूनी गारंटियाँ स्पष्ट नहीं हैं और मज़दूरी दरें भी कम बताई जा रही हैं।
राजस्थान में VB-GRAMG के ख़िलाफ़ विरोध क्यों हो रहा है?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, ग्रामीण मज़दूरों को डर है कि VB-GRAMG में मज़दूरी कम मिलेगी, 100 दिन का रोज़गार अधिकार ख़त्म हो जाएगा, और जवाबदेही तंत्र (सोशल ऑडिट) कमज़ोर होगा। मनरेगा क़ानूनी अधिकार था, VB-GRAMG सरकारी योजना है — यही बुनियादी फ़र्क़ विरोध का कारण है।
क्या VB-GRAMG पूरे भारत में लागू होगी?
फ़िलहाल VB-GRAMG राजस्थान में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चल रही है। अगर इसे सफल माना गया तो UP, बिहार, MP जैसे अन्य हिंदी बेल्ट राज्यों में विस्तार की संभावना है — लेकिन राजस्थान का विरोध इस विस्तार की राह में बड़ी बाधा बन सकता है।
VB-GRAMG विवाद का BJP पर क्या राजनीतिक असर होगा?
राजस्थान में BJP की 70+ ग्रामीण सीटें मनरेगा-निर्भर क्षेत्रों में हैं। अगर मज़दूरी कटौती और अधिकार कमज़ोर होने की शिकायतें बनी रहीं, तो हिंदी बेल्ट के आगामी चुनावों में BJP के ग्रामीण वोट-बैंक पर नकारात्मक असर पड़ सकता है — जबकि कांग्रेस को 'ग़रीबों का अधिकार छीना' का रेडीमेड नैरेटिव मिल जाएगा।