ईरान-इज़रायल जंग के बीच DAC की तीन मिसाइलों की खरीद — हैमर, वर्बा, MP-ATGM से सरहद पर क्या बदलने वाला है?

DAC ने 3 जुलाई 2025 की बैठक में फ़्रांस निर्मित हैमर स्टैंड-ऑफ़ मिसाइल, रूसी वर्बा MANPADS और DRDO की स्वदेशी MP-ATGM मिसाइल की खरीद प्रस्ताव को आगे बढ़ाया। मध्य-पूर्व संकट, LAC-LoC पर बढ़ते ख़तरों और आत्मनिर्भर रक्षा नीति — तीनों ने इस तिहरे फ़ैसले को मजबूर किया।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC), रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में, भारतीय सेना, वायुसेना और DRDO
  • क्या: हैमर (फ़्रांस), वर्बा MANPADS (रूस) और MP-ATGM (DRDO-स्वदेशी) — तीन मिसाइल प्रणालियों की खरीद प्रस्तावों को एक साथ आगे बढ़ाया
  • कब: 3 जुलाई 2025 को DAC बैठक में, आज तक की रिपोर्ट के अनुसार
  • कहाँ: नई दिल्ली, रक्षा मंत्रालय मुख्यालय
  • क्यों: ईरान-इज़रायल युद्ध से बढ़ी वैश्विक अस्थिरता, LAC और LoC पर सामरिक ज़रूरतें, और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति
  • कैसे: DAC ने Acceptance of Necessity (AoN) प्रक्रिया के तहत तीनों हथियार प्रणालियों को मंज़ूरी दी; हैमर फ़्रांस से सरकार-से-सरकार (G2G) रूट से, वर्बा रूस से मौजूदा रक्षा समझौतों के तहत, और MP-ATGM DRDO-उद्योग साझेदारी से आएगा

होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव चरम पर है, दुबई एयरपोर्ट पर ड्रोन का ख़तरा टला नहीं है, और ईरान-इज़रायल युद्ध की आग अब तेल की क़ीमतों से होती हुई हर देश की रक्षा रणनीति को झुलसा रही है। ठीक इसी माहौल में — 3 जुलाई 2025 को — भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने एक ऐसा फ़ैसला लिया जो सुनने में रूटीन लगता है, मगर जिसका असर LAC से LoC और हिंद महासागर तक जाएगा।

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में DAC ने एक साथ तीन अलग-अलग मिसाइल प्रणालियों की खरीद को आगे बढ़ाया — फ़्रांस की हैमर (HAMMER) स्टैंड-ऑफ़ मिसाइल, रूस की वर्बा (Verba) MANPADS, और DRDO की स्वदेशी MP-ATGM। तीन मिसाइलें, तीन देश, तीन अलग थिएटर। सवाल यही है: आख़िर एक ही बैठक में ये तिहरा दाँव क्यों?

हैमर — फ़्रांस का 'स्मार्ट बम किलर' और भारत का चीन जवाब

HAMMER (Highly Agile Modular Munition Extended Range) फ़्रांस की Safran कंपनी का वो हथियार है जिसने यूक्रेन युद्ध में अपनी ताक़त साबित की। यह स्टैंड-ऑफ़ मिसाइल राफ़ेल लड़ाकू विमानों से दागी जाती है, जिसका मतलब है कि पायलट को दुश्मन की हवाई सुरक्षा के दायरे में घुसने की ज़रूरत नहीं। रेंज 70 किलोमीटर से ज़्यादा, GPS और इन्फ़्रारेड दोनों गाइडेंस, और बंकरों को भेदने की क्षमता।

LAC पर चीन की PLA ने पिछले तीन सालों में अपनी एयर डिफेंस को काफ़ी मज़बूत किया है — रक्षा विश्लेषकों का मानना है। S-400 और HQ-9 जैसी मिसाइलें तिब्बत में तैनात हैं। ऐसे में भारतीय वायुसेना को एक ऐसा हथियार चाहिए जो दुश्मन के एयर डिफेंस ज़ोन में घुसे बिना ही ठिकानों को ध्वस्त कर सके। हैमर ठीक यही करता है।

फ़्रांस से सरकार-से-सरकार (G2G) रूट से आने वाली ये ख़रीद एक और बात साफ़ करती है — भारत ने अमेरिका की JDAM किट या इज़रायल की स्पाइस बम के बजाय फ़्रांसीसी विकल्प चुना। इसके पीछे राफ़ेल प्लेटफ़ॉर्म से मौजूदा अनुकूलता (compatibility) और फ़्रांस के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी दोनों कारण हैं।

वर्बा — रूस का कंधे पर रखने वाला रक्षक और LoC की ज़रूरत

वर्बा (Verba) MANPADS यानी Man-Portable Air-Defence System — कंधे से दागी जाने वाली छोटी एंटी-एयरक्राफ़्ट मिसाइल। LoC पर पाकिस्तान द्वारा ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल और कम ऊँचाई पर उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों के ख़तरे को देखते हुए ये हथियार सबसे पहली ज़रूरत बन गया है।

रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार, वर्बा पुरानी इग्ला (Igla) MANPADS का अगली पीढ़ी का संस्करण है जो भारतीय सेना में पहले से सेवारत है। इसमें तीन अलग-अलग सीकर (infrared, UV, और visual) हैं, जो आधुनिक काउंटरमेज़र्स (फ़्लेयर्स आदि) को भी चकमा दे सकते हैं। ख़ास बात ये है कि ये हथियार ऊँचे पहाड़ी इलाक़ों में — जहाँ बड़ी एयर डिफेंस प्रणालियाँ तैनात करना मुश्किल है — एक-एक जवान के साथ तैनात हो सकता है।

रूस से ये ख़रीद एक और सवाल उठाती है: अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) का क्या होगा? भारत ने पहले S-400 ख़रीद पर इस तनाव का सामना किया है। लेकिन वर्बा जैसी छोटी प्रणाली पर अमेरिकी प्रतिक्रिया उतनी तीखी नहीं होती — रक्षा विश्लेषक मानते हैं कि ये भारत की 'दोनों हाथों में लड्डू' नीति का क्लासिक उदाहरण है।

MP-ATGM — DRDO का दाँव, आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी शर्त

तीनों में सबसे अहम शायद वो है जो न फ़्रांस से आ रहा, न रूस से — बल्कि हैदराबाद और पुणे की DRDO लैब्स से। MP-ATGM (Man-Portable Anti-Tank Guided Missile) भारत का स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल है जिसे एक सैनिक अपने कंधे पर रखकर दाग़ सकता है।

अब तक भारतीय सेना एंटी-टैंक मिसाइलों के लिए काफ़ी हद तक विदेशी विकल्पों — फ़्रांस के मिलान, इज़रायल के स्पाइक, और रूस के कोंकर्स — पर निर्भर रही है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, MP-ATGM को 'फ़ायर एंड फ़ॉरगेट' क्षमता के साथ डिज़ाइन किया गया है — यानी मिसाइल दागो और छुप जाओ, मिसाइल ख़ुद लक्ष्य तक पहुँचेगी। इसकी रेंज 2.5 किलोमीटर और वज़न 14-15 किलो बताया जाता है।

MP-ATGM की ख़रीद 'मेक इन इंडिया' रक्षा नीति का सबसे ठोस उदाहरण बनेगी। अगर ये सफल होता है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास पूरी तरह स्वदेशी पोर्टेबल एंटी-टैंक क्षमता है — चीन और अमेरिका के साथ।

पॉलिटिकल पल्स — तिहरी ख़रीद के पीछे का असली हिसाब

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट ये है कि ये तिहरा फ़ैसला सिर्फ़ सैन्य ज़रूरत नहीं, एक कैलकुलेटेड राजनीतिक संदेश भी है। मध्य-पूर्व में जंग जारी है, तेल की क़ीमतें अस्थिर हैं, और विपक्ष लगातार सरकार पर 'सरहद पर कमज़ोरी' का हमला कर रहा है। ऐसे में एक ही DAC बैठक में तीन बड़ी मिसाइलों को हरी झंडी — ये 'मज़बूत सरकार, सुरक्षित सीमा' का वो नैरेटिव है जो चुनावी सालों में सबसे ज़्यादा काम करता है।

ट्रेड हलकों में चर्चा है कि इस ख़रीद का कुल बजट ₹15,000-20,000 करोड़ के बीच हो सकता है — हालाँकि सरकारी तौर पर सटीक आँकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। रक्षा बजट पहले ही GDP का क़रीब 1.9% है और विश्लेषक मानते हैं कि ये ख़रीद इसे 2% के पार ले जाने का दबाव बनाएगी।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषकों के अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट सरकारी आँकड़ा नहीं।)

वैश्विक संकट, भारतीय जवाब — दोनों हाथों में लड्डू

इंडिया हेराल्ड का सटीक पॉलिटिकल और डिफेंस रीड यही है: एक ही बैठक में फ़्रांस, रूस और स्वदेशी — तीन अलग-अलग स्रोतों से हथियार उठाना महज़ संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'मल्टी-अलाइनमेंट' रक्षा रणनीति है।

ईरान-इज़रायल युद्ध ने एक बात साबित कर दी है: कोई भी देश अब किसी एक हथियार सप्लायर पर भरोसा नहीं कर सकता। रूस यूक्रेन में फँसा है और उसकी सप्लाई चेन पर सवाल हैं। अमेरिका की शर्तें — CAATSA, एंड-यूज़ मॉनिटरिंग — अपनी जगह हैं। फ़्रांस भरोसेमंद है मगर महँगा है। और स्वदेशी रास्ता ज़रूरी है मगर अभी अकेले पर्याप्त नहीं।

इसलिए भारत वही कर रहा है जो एक बहु-धुरीय दुनिया में समझदार ताक़त करती है — तीन टोकरियों में अंडे। हैमर से चीन के ख़िलाफ़ हवाई बढ़त, वर्बा से LoC पर ड्रोन और हेलीकॉप्टर ख़तरे का तोड़, और MP-ATGM से टैंक-विरोधी आत्मनिर्भरता। तीनों अलग-अलग भूगोल, अलग-अलग दुश्मन, अलग-अलग ज़रूरत।

आम आदमी पर असर — बजट, तेल और सीमा सुरक्षा

होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारत का क़रीब 60% तेल आयात गुज़रता है — ये आँकड़ा पेट्रोलियम मंत्रालय की पिछली रिपोर्ट्स में दर्ज है। अगर ये रास्ता बंद हुआ या अस्थिर रहा, तो पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें सीधे जनता की जेब पर असर डालेंगी। ऐसे में मज़बूत रक्षा तैयारी सिर्फ़ फ़ौजी मामला नहीं, बल्कि आर्थिक बीमा भी है।

दूसरी तरफ़, रक्षा ख़र्च बढ़ने का मतलब है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के बजट पर दबाव बढ़ सकता है। 2025-26 के रक्षा बजट में पहले ही पूँजीगत ख़र्च (capital expenditure) बढ़ाकर ₹1.80 लाख करोड़ से ऊपर ले जाया गया है — रक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार। ये तिहरी ख़रीद इसी रक़म में समायोजित होगी या अतिरिक्त माँग होगी — ये देखने वाली बात होगी।

आगे क्या — किस पर नज़र रखें

DAC की AoN (Acceptance of Necessity) मंज़ूरी पहला कदम है — असली ख़रीद कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर अभी बाक़ी है। अगर सरकार अगले 3-6 महीनों में हैमर और वर्बा के फ़ाइनल कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त करती है, तो 2027-28 तक पहली खेप सेना तक पहुँच सकती है — रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया की सामान्य समय-सीमा के अनुसार।

MP-ATGM के लिए DRDO को अभी उपयोगकर्ता परीक्षण (user trials) पूरे करने हैं, और सेना की ज़रूरत हज़ारों इकाइयों की है। अगर ये सफल हुआ, तो निर्यात की संभावना भी खुलेगी — दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ़्रीका के कई देश सस्ते पोर्टेबल एंटी-टैंक सिस्टम की तलाश में हैं।

ईरान-इज़रायल जंग अगर और बढ़ी, तो भारत को और तेज़ी से ख़रीद का रास्ता अपनाना पड़ सकता है — 'इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट' रूट, जो गलवान के बाद पहले भी इस्तेमाल हुआ। आने वाले हफ़्तों में देखें कि क्या DAC कोई नई बैठक बुलाती है और क्या नौसेना के लिए भी कोई बड़ा पैकेज आता है — क्योंकि हिंद महासागर में हूती ख़तरा और चीनी नौसैनिक मौजूदगी दोनों बढ़ रहे हैं।

तीन मिसाइलें, तीन सप्लायर, तीन सरहदें — और बीच में एक देश जो दुनिया की सबसे जटिल भू-राजनीतिक पहेली में अपने लिए जगह बना रहा है। असली सवाल ये नहीं कि DAC ने क्या ख़रीदा — असली सवाल ये है कि क्या ये ख़रीद उस रफ़्तार से हो पाएगी जिस रफ़्तार से दुनिया बदल रही है?

आरोपों और दावों की रिपोर्टिंग नामित स्रोतों से ली गई है और जब तक कोर्ट फ़ैसला न दे, ये अप्रमाणित हैं; सब-ज्यूडिस मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • DAC ने एक बैठक में 3 अलग-अलग देशों/स्रोतों से मिसाइल खरीद को आगे बढ़ाया — फ़्रांस, रूस, स्वदेशी
  • होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारत का क़रीब 60% तेल आयात गुज़रता है — पेट्रोलियम मंत्रालय
  • 2025-26 रक्षा बजट में पूँजीगत ख़र्च ₹1.80 लाख करोड़ से ऊपर — रक्षा मंत्रालय
  • हैमर मिसाइल की रेंज 70 किलोमीटर से अधिक, GPS और इन्फ़्रारेड दोनों गाइडेंस
  • MP-ATGM का वज़न 14-15 किलो, रेंज 2.5 किलोमीटर, फ़ायर एंड फ़ॉरगेट क्षमता

मुख्य बातें

  • DAC ने 3 जुलाई 2025 को एक ही बैठक में तीन मिसाइल प्रणालियों — हैमर (फ़्रांस), वर्बा (रूस), MP-ATGM (DRDO) — को आगे बढ़ाया
  • हैमर मिसाइल राफ़ेल से दागी जाएगी और LAC पर चीन की एयर डिफेंस के ख़िलाफ़ स्टैंड-ऑफ़ क्षमता देगी
  • वर्बा MANPADS LoC पर ड्रोन और कम ऊँचाई के ख़तरों का तोड़ है — रूस से ख़रीद पर CAATSA का जोखिम सीमित माना जा रहा है
  • MP-ATGM पूरी तरह स्वदेशी है और सफल होने पर भारत को पोर्टेबल एंटी-टैंक क्लब में अमेरिका-चीन के साथ खड़ा करेगा
  • ये तिहरी ख़रीद ₹15,000-20,000 करोड़ के बजट दबाव का संकेत है और रक्षा बजट को GDP के 2% के पार ले जाने का दबाव बना सकती है

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

DAC ने 3 जुलाई 2025 को किन मिसाइलों की खरीद को मंज़ूरी दी?

DAC ने फ़्रांस की हैमर (HAMMER) स्टैंड-ऑफ़ मिसाइल, रूस की वर्बा (Verba) MANPADS, और DRDO की स्वदेशी MP-ATGM मिसाइल — तीनों की ख़रीद प्रस्तावों को एक ही बैठक में आगे बढ़ाया।

हैमर मिसाइल क्या है और ये LAC पर कैसे काम करेगी?

हैमर फ़्रांस की Safran कंपनी की स्टैंड-ऑफ़ मिसाइल है जो राफ़ेल विमानों से दागी जाती है। 70+ किलोमीटर रेंज और GPS-इन्फ़्रारेड गाइडेंस से ये दुश्मन के एयर डिफेंस ज़ोन में घुसे बिना ठिकाने ध्वस्त कर सकती है — LAC पर चीन की S-400 और HQ-9 तैनाती के ख़िलाफ़ अहम।

MP-ATGM क्या है और ये विदेशी मिसाइलों से कैसे अलग है?

MP-ATGM (Man-Portable Anti-Tank Guided Missile) DRDO की पूरी तरह स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल है — फ़ायर एंड फ़ॉरगेट क्षमता, 2.5 किलोमीटर रेंज, और 14-15 किलो वज़न। सफल होने पर ये विदेशी निर्भरता ख़त्म करेगी और निर्यात की राह भी खोलेगी।

वर्बा MANPADS खरीदने पर क्या अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) का ख़तरा है?

विश्लेषकों का मानना है कि वर्बा जैसी छोटी प्रणाली पर CAATSA का जोखिम S-400 जैसी बड़ी ख़रीद की तुलना में काफ़ी सीमित है, हालाँकि पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता।

इस ख़रीद का भारतीय रक्षा बजट पर क्या असर होगा?

ट्रेड अनुमानों के अनुसार तीनों मिसाइलों की कुल ख़रीद ₹15,000-20,000 करोड़ तक हो सकती है। 2025-26 के रक्षा बजट में पूँजीगत ख़र्च पहले ही ₹1.80 लाख करोड़ से ऊपर है — ये तिहरी ख़रीद बजट को GDP के 2% के पार ले जाने का दबाव बना सकती है।

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