'केरलम' तो सर्वसम्मति से पास — अब हिंदी बेल्ट में 'भोजपाल' से 'कुरुक्षेत्र' तक कौन-सी नाम वापसी की क़तार लगेगी?
केरल विधानसभा ने राज्य का नाम 'केरलम' करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में बदलाव के लिए संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है। यह क़दम हिंदी बेल्ट समेत कई राज्यों में औपनिवेशिक नामों की 'पहचान वापसी' की दूसरी लहर की शुरुआत बन सकता है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केरल विधानसभा — सत्तारूढ़ LDF और विपक्षी UDF दोनों ने मिलकर प्रस्ताव पारित किया।
- क्या: राज्य का आधिकारिक नाम 'Kerala' से बदलकर 'Keralam' करने का संवैधानिक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ।
- कब: 2025 में पहले भी प्रस्ताव भेजा गया था; ताज़ा प्रस्ताव 2026 में पुनः सर्वसम्मति से पारित।
- कहाँ: केरल विधानसभा, तिरुवनंतपुरम।
- क्यों: अंग्रेज़ों के दिए 'Kerala' नाम की जगह मलयालम मूल 'केरलम' लाना — भाषाई पहचान और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की माँग।
- कैसे: विधानसभा में प्रस्ताव पारित → केंद्र सरकार को भेजा → संसद में संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन विधेयक ज़रूरी → राष्ट्रपति की स्वीकृति → नाम बदलाव प्रभावी।
एक राज्य जहाँ सत्ता और विपक्ष शायद ही किसी बात पर सहमत होते हों, वहाँ पूरी विधानसभा ने एक स्वर में कहा — हमारा नाम 'केरलम' है, 'Kerala' नहीं। तिरुवनंतपुरम से आई इस सर्वसम्मति की गूँज दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक तक जानी तय है, लेकिन असली सवाल यह है कि वहाँ से जवाब कब और कैसे आएगा — और इस बीच कितने और राज्य अपनी 'नाम वापसी' की फ़ाइलें खोल चुके होंगे।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, केरल विधानसभा ने राज्य का नाम 'Kerala' से बदलकर 'Keralam' करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। यह दूसरी बार है जब विधानसभा ने यह क़दम उठाया — 2023 में भी इसी तरह का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
संविधान का पेंच: विधानसभा पास करे, तो भी बदलेगा कैसे?
यहीं कहानी दिलचस्प होती है। किसी राज्य का नाम बदलना कोई साधारण प्रशासनिक फ़ैसला नहीं — इसके लिए भारतीय संविधान की पहली अनुसूची (First Schedule) में संशोधन ज़रूरी है, जिसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम दर्ज हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के तहत यह संशोधन विधेयक संसद में पारित होना ज़रूरी है, और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश अनिवार्य है।
सीधी बात: केरल विधानसभा चाहे सौ बार प्रस्ताव पारित कर ले, जब तक केंद्र सरकार संसद में विधेयक नहीं लाती और दोनों सदनों से पारित नहीं करवाती, नाम नहीं बदलेगा। यही वह बोतलनेक है जहाँ 2023 का प्रस्ताव अटका हुआ है — और जहाँ असली राजनीति शुरू होती है।
इतिहास गवाह है: नाम बदलाव कभी 'सिर्फ़ नाम' नहीं रहा
इलाहाबाद का प्रयागराज बनना, मद्रास का चेन्नई, बॉम्बे का मुंबई, कलकत्ता का कोलकाता, बैंगलोर का बेंगलुरु — यह सूची लंबी है। लेकिन ध्यान से देखें तो हर नाम बदलाव के पीछे एक चुनावी गणित था। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने इलाहाबाद को प्रयागराज, फ़ैज़ाबाद को अयोध्या और मुग़लसराय को पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर बनाया — और हर बार इसका चुनावी रिटर्न मिला। महाराष्ट्र में शिवसेना ने बॉम्बे को मुंबई बनवाकर मराठी अस्मिता का राजनीतिक पेटेंट लिया था। तमिलनाडु में मद्रास से चेन्नई तक का सफ़र द्रविड़ पहचान की राजनीति का मील का पत्थर रहा।
केरलम इसी परंपरा की ताज़ा कड़ी है — फ़र्क़ बस इतना है कि यहाँ विरोधी पार्टियों ने भी हाथ मिलाया, क्योंकि मलयालम भाषाई पहचान एक ऐसा मुद्दा है जिसमें 'विरोध' का कोई वोट नहीं।
पॉलिटिकल पल्स: हिंदी बेल्ट में कौन-सी फ़ाइलें धूल फाँक रही हैं?
सियासी गलियारों में यह चर्चा ज़ोरों पर है कि केरलम का रास्ता साफ़ होते ही कई और राज्य सक्रिय होंगे। मध्य प्रदेश में 'भोपाल' को 'भोजपाल' बनाने की माँग सालों से BJP की स्थानीय इकाई में गूँजती रही है — भोज तालाब से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान का हवाला दिया जाता है। बंगाल का नाम 'बांग्ला' करने की माँग ममता सरकार ने 2018 में ही उठाई थी, लेकिन केंद्र ने रोक दिया। कर्नाटक में 'कर्णाटक' (कन्नड़ उच्चारण) की बात समय-समय पर उठती रही है। गोवा में 'गोंय' की माँग कोंकणी भाषा आंदोलन से जुड़ी है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि नाम बदलाव की यह दूसरी लहर अब सीधे 2027-28 के चुनावी कैलेंडर से जुड़ जाएगी। जिन राज्यों में चुनाव क़रीब हैं, वहाँ सत्ताधारी दल 'पहचान वापसी' को एक मुफ़्त चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे — इसमें ख़र्च शून्य, भावनात्मक रिटर्न अधिकतम।
लेकिन एक गहरी चाल भी है। जब कोई राज्य सरकार केंद्र को नाम बदलाव का प्रस्ताव भेजती है, तो केंद्र के पास दो विकल्प होते हैं: मंज़ूर करो या ख़ामोश बैठो। मंज़ूर करने पर श्रेय राज्य सरकार को मिलता है; ख़ामोश बैठने पर केंद्र पर 'सांस्कृतिक दमन' का आरोप लगता है। यही वह जाल है जिसमें विपक्षी राज्य सरकारें केंद्र को फँसाना चाहती हैं — और केरलम का प्रस्ताव इसी रणनीति की पहली सफल चाल है।
8वीं अनुसूची का छिपा हुआ युद्धक्षेत्र
नाम बदलाव सिर्फ़ पहली अनुसूची तक सीमित नहीं रहता। संविधान की 8वीं अनुसूची — जिसमें 22 अनुसूचित भाषाएँ हैं — भी इसी राजनीति का दूसरा मोर्चा है। जब कोई राज्य अपने 'देसी' नाम की माँग करता है, तो उसकी भाषा की संवैधानिक मान्यता का सवाल भी उठता है। भोजपुरी, राजस्थानी, और छत्तीसगढ़ी जैसी भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की माँग दशकों से लंबित है। नाम बदलाव और भाषा मान्यता — दोनों एक ही 'पहचान की राजनीति' के दो पहिए हैं।
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केंद्र का दांव: चुप्पी या सहमति?
2023 में केरल का प्रस्ताव केंद्र ने 'विचाराधीन' बता कर ठंडे बस्ते में डाल दिया था। अब दूसरी बार सर्वसम्मत प्रस्ताव आने के बाद केंद्र के लिए ख़ामोशी और मुश्किल हो जाएगी। अगर BJP-शासित राज्य — जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, या असम — भी नाम बदलाव के प्रस्ताव भेजें, तो केंद्र सरकार के लिए एक को मंज़ूर और दूसरे को ख़ारिज करना राजनीतिक रूप से असंभव हो जाएगा।
यहीं एक संभावना और बनती है: BJP खुद 'केरलम' को मंज़ूरी देकर अपने शासित राज्यों में नाम बदलाव की लहर का नेतृत्व ले सकती है। इलाहाबाद-प्रयागराज का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि हिंदुत्व की 'सांस्कृतिक पुनर्स्थापना' की कथा में नाम बदलाव एक शक्तिशाली उपकरण है। इस लिहाज़ से केरलम का रास्ता साफ़ करना BJP के लिए भी फ़ायदे का सौदा हो सकता है — बशर्ते वह इसका श्रेय LDF को पूरा न जाने दे।
क्या सचमुच 'सिर्फ़ नाम' बदलता है?
सच यह है कि नाम बदलने से सड़कें नहीं बनतीं, अस्पताल नहीं खुलते, रोज़गार नहीं आता। लेकिन भारतीय राजनीति में 'प्रतीक' की ताक़त 'नीति' से अक्सर ज़्यादा होती है। एक नाम बदलाव कई काम एक साथ करता है: भाषाई गौरव जगाता है, ऐतिहासिक ग़लतियों का 'सुधार' दिखाता है, और सबसे ज़रूरी — पार्टी को 'पहचान का रखवाला' साबित करता है।
केरलम ने यह साबित कर दिया है कि नाम बदलाव पर सर्वदलीय सहमति संभव है। अब देखना यह है कि बाक़ी राज्यों में — जहाँ सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे की परछाई तक से चिढ़ते हैं — क्या यह सहमति बन पाएगी, या नाम बदलाव भी एक और रणभूमि बन जाएगा।
एक बात तय है: अगले दो साल में कम से कम तीन-चार और राज्यों से नाम बदलाव के प्रस्ताव आएँगे। और हर प्रस्ताव के साथ केंद्र सरकार को एक नई राजनीतिक पहेली सुलझानी होगी — मंज़ूरी दो तो विपक्षी राज्य को ताक़त, इनकार करो तो 'तानाशाही' का तमग़ा। केरलम सिर्फ़ एक नाम नहीं — यह भारतीय संघवाद की अगली बड़ी परीक्षा का पहला सवालपत्र है।
आँकड़ों में
- केरल विधानसभा में 'केरलम' प्रस्ताव दूसरी बार सर्वसम्मति से पारित — एक भी विरोधी वोट नहीं।
- संविधान की पहली अनुसूची में 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के नाम दर्ज — बदलाव के लिए संसद में विधेयक ज़रूरी।
- 8वीं अनुसूची में 22 अनुसूचित भाषाएँ — भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी समेत दर्जनों भाषाएँ शामिल होने की क़तार में।
मुख्य बातें
- केरल विधानसभा ने दूसरी बार 'केरलम' प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया — लेकिन संविधान की पहली अनुसूची में बदलाव के बिना नाम नहीं बदलेगा, और यह सिर्फ़ संसद कर सकती है।
- हिंदी बेल्ट में भोपाल→भोजपाल, बंगाल→बांग्ला, गोवा→गोंय जैसी माँगें पहले से मौजूद हैं — केरलम की सफलता इन्हें हवा देगी।
- नाम बदलाव केंद्र के लिए राजनीतिक जाल है: मंज़ूरी दें तो राज्य सरकार को श्रेय, इनकार करें तो 'सांस्कृतिक दमन' का आरोप।
- 8वीं अनुसूची में भोजपुरी-राजस्थानी जैसी भाषाओं की माँग और नाम बदलाव — दोनों 'पहचान की राजनीति' के दो पहिए हैं।
- 2027-28 चुनावी कैलेंडर से पहले कम से कम तीन-चार और राज्यों से नाम बदलाव के प्रस्ताव आने की संभावना है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
केरल का नाम 'केरलम' करने के लिए संविधान में क्या प्रक्रिया है?
संविधान की पहली अनुसूची में राज्य का नाम बदलने के लिए संसद में संविधान संशोधन विधेयक पारित करना ज़रूरी है। राष्ट्रपति की पूर्व सिफ़ारिश अनिवार्य है। राज्य विधानसभा का प्रस्ताव ज़रूरी शर्त है लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं।
क्या केंद्र सरकार राज्य के नाम बदलाव को रोक सकती है?
हाँ, केंद्र सरकार संसद में विधेयक न लाकर प्रस्ताव को अनिश्चित काल तक लटका सकती है। 2023 में केरल का प्रस्ताव इसी तरह 'विचाराधीन' बताकर टाला गया था।
हिंदी बेल्ट में कौन-से नाम बदलाव की माँग चल रही है?
मध्य प्रदेश में भोपाल→भोजपाल, बंगाल में West Bengal→बांग्ला, गोवा में गोंय, कर्नाटक में कर्णाटक (कन्नड़ उच्चारण) जैसी माँगें सक्रिय हैं। इसके अलावा भोजपुरी, राजस्थानी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की माँग भी इसी पहचान राजनीति से जुड़ी है।
पहले किन राज्यों या शहरों के नाम सफलतापूर्वक बदले गए?
मद्रास→चेन्नई, बॉम्बे→मुंबई, कलकत्ता→कोलकाता, बैंगलोर→बेंगलुरु, इलाहाबाद→प्रयागराज, फ़ैज़ाबाद→अयोध्या — ये प्रमुख उदाहरण हैं। हर बदलाव के पीछे भाषाई पहचान या सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की राजनीति रही है।