खामेनेई का जनाज़ा, मोजतबा की ताजपोशी — क्या ईरान में गणतंत्र ख़त्म करके राजवंश खड़ा किया जा रहा है?
आयतुल्लाह खामेनेई के निधन के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का जनाज़े में प्रमुख भूमिका निभाना सिर्फ़ पारिवारिक रस्म नहीं — यह ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर दावे का सार्वजनिक ऐलान है। विशेषज्ञों का मानना है कि असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स मोजतबा को अगला सुप्रीम लीडर बना सकती है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: आयतुल्लाह अली खामेनेई (दिवंगत सुप्रीम लीडर) और उनके बेटे मोजतबा खामेनेई, जिन्हें उत्तराधिकारी माना जा रहा है — रॉयटर्स और अल जज़ीरा के अनुसार।
- क्या: खामेनेई के जनाज़े में मोजतबा की केंद्रीय भूमिका और ईरान में सत्ता उत्तराधिकार का संकट — नवभारत टाइम्स के अनुसार।
- कब: जून 2025 में आयतुल्लाह खामेनेई के निधन के तुरंत बाद — अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार।
- कहाँ: ईरान की राजधानी तेहरान, जहाँ जनाज़े की नमाज़ और अंतिम संस्कार हुआ — AFP रिपोर्ट्स के अनुसार।
- क्यों: मोजतबा खामेनेई दशकों से अपने पिता के सबसे भरोसेमंद सलाहकार और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) से गहरे संबंधों वाले व्यक्ति रहे हैं — BBC फ़ारसी के विश्लेषण के अनुसार।
- कैसे: असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स — 88 धार्मिक विद्वानों की संस्था — सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है, और रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें मोजतबा समर्थकों का बहुमत है।
एक गणतंत्र में जनाज़ा भी चुनाव होता है — बस वोट ज़ुबान से नहीं, आँखों से पड़ते हैं। तेहरान में आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में लाखों लोगों की भीड़ के बीच जब मोजतबा खामेनेई ताबूत के सबसे क़रीब खड़े दिखे, तो दुनिया के हर रणनीतिक विश्लेषक ने एक ही बात पढ़ी — यह शोक नहीं, शपथ है।
मोजतबा खामेनेई कोई अनजान चेहरा नहीं हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के अनुसार, वे पिछले दो दशकों से अपने पिता के सबसे भरोसेमंद सलाहकार, 'बैतुल-रहबरी' (सुप्रीम लीडर के दफ़्तर) के अनौपचारिक संचालक और IRGC की ख़ुफ़िया शाखा से सबसे गहरे रिश्ते रखने वाले व्यक्ति रहे हैं। BBC फ़ारसी के विश्लेषण के मुताबिक़, ईरान के सुरक्षा तंत्र में मोजतबा का रसूख़ उनके पिता के आख़िरी वर्षों में इतना बढ़ गया था कि कई वरिष्ठ जनरल सीधे उन्हीं को रिपोर्ट करते थे — सुप्रीम लीडर के दफ़्तर को नहीं।
लेकिन ईरान का संविधान — जो 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद लिखा गया — सत्ता का वंशानुगत हस्तांतरण कहीं नहीं कहता। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम लीडर का चुनाव 88 सदस्यीय 'असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स' करती है — धार्मिक विद्वानों का वही निकाय जिसने 1989 में ख़ुद खामेनेई को चुना था। सवाल यह है कि क्या यह 'चुनाव' अब सिर्फ़ औपचारिकता रह गया है।
पर्दे के पीछे का गणित — असेंबली पहले से तैयार?
नवभारत टाइम्स और AFP की रिपोर्ट्स के हवाले से जो तस्वीर बनती है, वह साफ़ है: असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स में कट्टरपंथी गुट का ज़बरदस्त बहुमत है। 2024 के चुनावों में — जिनमें गार्जियन काउंसिल ने दर्जनों सुधारवादी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराया — इस असेंबली की बनावट लगभग पूरी तरह कट्टरपंथियों के पक्ष में हो गई। विश्लेषकों का अनुमान है कि कम से कम 60 से अधिक सदस्य मोजतबा को स्वीकार्य मानते हैं।
लेकिन 'स्वीकार्य' और 'उत्साहपूर्ण समर्थन' में फ़र्क़ है। ईरानी राजनीति के जानकार बताते हैं कि असेंबली में एक तीसरा धड़ा भी है — वे लोग जो खामेनेई परिवार से वफ़ादारी रखते हैं पर वंशानुगत सत्ता को क्रांति की मूल भावना के ख़िलाफ़ मानते हैं। यह 'शर्मिंदा बहुमत' है — जो मोजतबा को वोट देगा, पर खुलकर उनका नाम लेने से कतराएगा।
पॉलिटिकल पल्स — सियासी गलियारों में फुसफुसाहट
तेहरान के राजनयिक हलकों और ईरान-विशेषज्ञों के बीच एक दिलचस्प चर्चा चल रही है: क्या IRGC के शीर्ष कमांडरों ने मोजतबा को पहले ही 'अगला रहबर' मान लिया है? ट्रेड हलकों की बात मानें तो जनाज़े के दौरान IRGC के कुद्स फ़ोर्स चीफ़ और नेवी कमांडर जिस तरह मोजतबा के इर्द-गिर्द खड़े दिखे, वह प्रोटोकॉल नहीं, वफ़ादारी का प्रदर्शन था।
दूसरी ओर, सुधारवादी धड़े में ख़ामोशी पसरी है। 2022 के महसा अमीनी आंदोलन को बेरहमी से कुचलने में मोजतबा की कथित भूमिका — जिसे अमेरिका ने प्रतिबंधों का आधार बनाया — ने ईरान के शहरी मध्यवर्ग में उनकी छवि एक 'कठोर दमनकारी' की बना दी है। इंडस्ट्री की बात यह है कि सुधारवादी नेता कोई खुला विरोध तो नहीं कर पाएँगे, पर मोजतबा को 'रहबर' मानने की आंतरिक स्वीकृति उन्हें पचेगी नहीं।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनयिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत के लिए क्यों मायने रखता है यह 'पारिवारिक मामला'
ईरान का सुप्रीम लीडर कौन होगा — यह सवाल दिल्ली, मुंबई और जामनगर के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना तेहरान के लिए। भारत-ईरान के चाबहार पोर्ट समझौते, ईरानी तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबंधों की कूटनीति, और पश्चिम एशिया में शिया-सुन्नी शक्ति संतुलन — ये सब सीधे इस बात से जुड़े हैं कि तेहरान में कौन बैठता है।
रॉयटर्स के अनुसार, खामेनेई के शासनकाल में भारत ने ईरान के साथ एक नाज़ुक संतुलन बनाए रखा — अमेरिकी दबाव और ऊर्जा ज़रूरतों के बीच। मोजतबा अगर सत्ता में आते हैं, तो उनकी IRGC-केंद्रित विदेश नीति का मतलब होगा कि ईरान और भी अधिक आक्रामक क्षेत्रीय रुख़ अपना सकता है — जो हूती, हिज़बुल्लाह और हमास के ज़रिए पश्चिम एशिया की अस्थिरता बढ़ाएगा। भारत के लिए इसका सीधा असर तेल की क़ीमतों, हिंद महासागर की सुरक्षा और लाखों प्रवासी भारतीयों पर पड़ेगा।
1989 का इतिहास — और उससे आज कितना अलग है
1989 में जब क्रांति के संस्थापक आयतुल्लाह ख़ुमैनी का निधन हुआ, तो अली खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया — भले ही वे तब धार्मिक पदानुक्रम में बहुत ऊपर नहीं थे। अल जज़ीरा के विश्लेषण के अनुसार, उस वक़्त क्रांति की ऊर्जा इतनी प्रबल थी कि सत्ता हस्तांतरण बिना किसी बड़ी उथल-पुथल के हो गया। लेकिन 2025 का ईरान 1989 का ईरान नहीं है — तब क्रांतिकारी उत्साह था, अब आर्थिक संकट है; तब अमेरिका से लड़ाई नई थी, अब दशकों पुरानी थकान है; तब जनता में एकता थी, अब 2009, 2017-18, 2019 और 2022 के चार बड़े जन-आंदोलनों की कड़वी स्मृतियाँ हैं।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि मोजतबा का सत्ता में आना लगभग तय है — पर उनकी वैधता का संकट पहले दिन से शुरू हो जाएगा। एक ऐसा सुप्रीम लीडर जो अपने पिता का बेटा होने की वजह से चुना गया, वह उस व्यवस्था की नैतिक बुनियाद को खोखला कर देगा जो 'शाह की वंशवादी तानाशाही' ख़त्म करने के नाम पर बनी थी।
आगे क्या — और क्या देखना है
आने वाले हफ़्तों में असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स की बैठक निर्णायक होगी। AFP के अनुसार, ईरानी संविधान सुप्रीम लीडर की मृत्यु के बाद शीघ्र उत्तराधिकारी चुनने का प्रावधान रखता है। अगर मोजतबा चुने जाते हैं — जो सबसे संभावित परिदृश्य है — तो देखने लायक़ बात यह होगी: क्या ईरान की सड़कों पर कोई प्रतिक्रिया आती है? क्या IRGC और राष्ट्रपति कार्यालय के बीच शक्ति का नया समीकरण बनता है? और क्या ईरान का परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नीति और भी आक्रामक होती है?
दुनिया के सबसे पुराने 'इस्लामिक गणतंत्र' में अगर पिता के बाद बेटा गद्दी पर बैठता है, तो यह सिर्फ़ ईरान की कहानी नहीं रहेगी — यह हर उस देश के लिए सबक़ होगा जहाँ गणतंत्र का लबादा ओढ़कर वंशवाद पनपता है। और हर उस भारतीय नागरिक के लिए भी, जो जानता है कि यह बीमारी किसी एक देश की नहीं।
आँकड़ों में
- असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के 88 में से अनुमानतः 60 से अधिक सदस्य मोजतबा समर्थक कट्टरपंथी गुट से — विश्लेषकों के अनुसार।
- ईरान में 2009, 2017-18, 2019, 2022 — चार बड़े जन-आंदोलन शासन के ख़िलाफ़ हो चुके हैं।
- 1979 से अब तक ईरान में सिर्फ़ दो सुप्रीम लीडर हुए — ख़ुमैनी और खामेनेई; मोजतबा तीसरे और पहले 'वंशानुगत' होंगे।
मुख्य बातें
- मोजतबा खामेनेई दो दशकों से पिता के सबसे भरोसेमंद सलाहकार और IRGC से गहरे जुड़े रहे हैं — जनाज़े में उनकी केंद्रीय भूमिका सत्ता दावे का सार्वजनिक संकेत है।
- असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स में 60+ सदस्य कट्टरपंथी गुट के हैं — मोजतबा का चुनाव लगभग तय माना जा रहा है, पर वैधता का संकट पहले दिन से होगा।
- भारत के लिए सीधा असर — चाबहार पोर्ट, तेल आयात कूटनीति, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और हिंद महासागर सुरक्षा प्रभावित होगी।
- ईरान 1989 नहीं है — चार बड़े जन-आंदोलनों की स्मृतियाँ और आर्थिक संकट मोजतबा के लिए चुनौती बनेंगे।
- अगर पिता के बाद बेटा सुप्रीम लीडर बनता है, तो 'इस्लामिक गणतंत्र' की मूल नैतिक बुनियाद ही सवालों में आ जाएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोजतबा खामेनेई कौन हैं और उन्हें उत्तराधिकारी क्यों माना जा रहा है?
मोजतबा खामेनेई आयतुल्लाह अली खामेनेई के बेटे हैं जो पिछले दो दशकों से सुप्रीम लीडर के दफ़्तर के अनौपचारिक संचालक और IRGC से गहरे संबंध रखने वाले व्यक्ति रहे हैं। रॉयटर्स और BBC फ़ारसी के अनुसार, वे अपने पिता के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे।
ईरान में सुप्रीम लीडर कैसे चुना जाता है?
ईरान के संविधान के अनुसार, 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स — जो धार्मिक विद्वानों का निकाय है — सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, 1989 में इसी असेंबली ने खामेनेई को चुना था।
मोजतबा के सत्ता में आने का भारत पर क्या असर होगा?
चाबहार पोर्ट समझौता, ईरानी तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबंधों की कूटनीति, पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन और हिंद महासागर सुरक्षा — ये सब प्रभावित होंगे। विश्लेषकों का मानना है कि मोजतबा की IRGC-केंद्रित नीति ईरान को और आक्रामक बना सकती है।
क्या ईरान में मोजतबा के ख़िलाफ़ विद्रोह हो सकता है?
ईरान में 2009, 2017-18, 2019 और 2022 में चार बड़े जन-आंदोलन हो चुके हैं। विश्लेषकों के अनुसार, वंशानुगत सत्ता हस्तांतरण इस्लामिक गणतंत्र की मूल वैधता पर सवाल उठाएगा, जो भविष्य में असंतोष का कारण बन सकता है — हालाँकि IRGC की मज़बूत पकड़ तत्काल बड़े विद्रोह को रोक सकती है।