अफ़ग़ानिस्तान पर पाकिस्तानी बमबारी, भारत का तीखा हमला — मोदी सरकार ने तालिबान को 'ढाल' बनाकर इस्लामाबाद को घेरने का खेल क्यों रचा?
भारत ने पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान पर एयरस्ट्राइक को 'खुला आक्रामक कृत्य' और 'क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा ख़तरा' बताकर कड़ी निंदा की। हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, भारत का यह रुख़ तालिबान शासित काबुल के साथ उसकी बढ़ती कूटनीतिक नज़दीकी का सबसे स्पष्ट संकेत है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत सरकार (विदेश मंत्रालय) ने पाकिस्तान की कड़ी निंदा की; पाकिस्तानी वायुसेना ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया।
- क्या: भारत ने पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान पर एयरस्ट्राइक को 'बलात आक्रामक कृत्य' और 'क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा ख़तरा' बताया — हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार।
- कब: 2025 में पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक के तुरंत बाद भारत ने बयान जारी किया।
- कहाँ: पाकिस्तानी हवाई हमले अफ़ग़ान क्षेत्र पर हुए; भारत ने नई दिल्ली से अपनी प्रतिक्रिया दी।
- क्यों: टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, भारत ने कहा कि ये हमले पाकिस्तान की 'पैथोलॉजिकल ज़रूरत' दर्शाते हैं — बाहरी दुश्मन गढ़ने की आदत; भारत ने अफ़ग़ान संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा का हवाला दिया।
- कैसे: भारतीय विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर पाकिस्तान की निंदा की और अफ़ग़ान ज़मीन पर संप्रभुता के उल्लंघन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर किया।
दुनिया के सबसे मुश्किल पड़ोस में एक अजीब तमाशा हो रहा है — जो देश दशकों से तालिबान को 'आतंकी संगठन' कहता रहा, वही आज उसी तालिबान-शासित अफ़ग़ानिस्तान की संप्रभुता का सबसे मुखर रक्षक बनकर खड़ा है। भारत ने पाकिस्तान की अफ़ग़ानिस्तान पर एयरस्ट्राइक को 'खुला आक्रामक कृत्य' (blatant act of aggression) और 'क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा ख़तरा' बताया — और यह शब्दावली वैसी नहीं है जो आप किसी सामान्य कूटनीतिक बयान में सुनते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि ये हमले पाकिस्तान की उस 'पैथोलॉजिकल ज़रूरत' को दर्शाते हैं जिसमें वह बार-बार बाहरी दुश्मन गढ़ता है।
सवाल सीधा है: भारत को इससे क्या लेना-देना? अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन है — वही तालिबान जिसने 1999 में IC-814 को कंधार ले जाने दिया, जिसकी वजह से भारत ने काबुल से अपना दूतावास बंद किया। फिर अचानक यह कूटनीतिक गर्मजोशी कहाँ से आई?
इसका जवाब उस चुपचाप बिछाई जा रही बिसात में है जो पिछले तीन साल से दक्षिण एशिया की भू-राजनीति की शक्ल बदल रही है।
पाकिस्तान ने बम गिराए, भारत ने 'शब्द-बम' दागे
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, पाकिस्तान ने अफ़ग़ान क्षेत्र पर हवाई हमले किए जिनमें दर्जनों लोग मारे गए। इस्लामाबाद ने इन हमलों का औचित्य यह बताया कि कराची में हुए एक हमले के लिए अफ़ग़ान ज़मीन से 'आतंकी तत्व' ज़िम्मेदार थे। यह वही तर्क है जो पाकिस्तान पिछले दो दशकों से अमेरिका के सामने इस्तेमाल करता रहा — 'हम पीड़ित हैं, हमारे पड़ोसी ख़तरनाक हैं।'
लेकिन इस बार फ़र्क़ यह है कि दिल्ली ने इस्लामाबाद की इस कहानी को सीधे-सीधे ख़ारिज कर दिया। द हिंदू के अनुसार, भारत के बयान में पाकिस्तान पर 'बलात आक्रमण' का आरोप लगाया गया और अफ़ग़ान नागरिकों की जान-माल के नुक़सान पर गहरी चिंता जताई गई। यह कूटनीतिक भाषा में वह स्तर है जो आमतौर पर सीधे सैन्य टकराव की स्थिति में इस्तेमाल होती है।
तालिबान कार्ड: दिल्ली की ख़ामोश बिसात
2021 में जब तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा किया, तो भारत ने अपना दूतावास ख़ाली किया और दुनिया ने मान लिया कि अफ़ग़ानिस्तान अब पूरी तरह पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र में चला गया। लेकिन भू-राजनीति में कोई दोस्ती स्थायी नहीं होती — और कोई दुश्मनी भी नहीं।
पिछले तीन सालों में कुछ अहम बातें हुईं। पहला — तालिबान और पाकिस्तानी सेना के बीच रिश्ते ज़हरीले हो गए। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को अफ़ग़ान तालिबान से शह मिल रही है — कम-से-कम इस्लामाबाद ऐसा मानता है। दूसरा — भारत ने चुपचाप काबुल में अपनी मौजूदगी फिर से बढ़ानी शुरू की। तीसरा — और सबसे अहम — भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय सहायता का रास्ता खोला, जो कूटनीतिक संबंध बहाल करने का पहला क़दम होता है।
अब जब पाकिस्तान ने अफ़ग़ान ज़मीन पर बम गिराए, तो भारत को वह मौक़ा मिल गया जो वह शायद तलाश रहा था — पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'आक्रामक' साबित करना और ख़ुद को 'ज़िम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति' के रूप में पेश करना।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि मोदी सरकार ने तालिबान के साथ बैकचैनल संवाद काफ़ी पहले से शुरू कर रखा है — क़तर और UAE इसके माध्यम रहे हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि दिल्ली में एक खुफ़िया गणित काम कर रहा है: अगर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान का टकराव और गहराता है, तो काबुल को एक विश्वसनीय वैकल्पिक सहयोगी की ज़रूरत होगी — और वह सहयोगी कौन? बीजिंग नहीं, क्योंकि चीन उइग़ूर मसले पर तालिबान से नाराज़ है। रूस नहीं, क्योंकि यूक्रेन में उसकी ऊर्जा ख़त्म हो रही है। बचता है भारत — जिसके पास अफ़ग़ानिस्तान में बुनियादी ढाँचे का इतिहास है, चाबहार बंदरगाह का रास्ता है, और पाकिस्तान को घेरने की रणनीतिक ज़रूरत है।
(यह इंडस्ट्री और राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चा पर आधारित विश्लेषण है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत का असली दाँव: संप्रभुता का चैंपियन बनना
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि भारत का यह बयान सिर्फ़ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सुचिंतित रणनीतिक पोज़ीशनिंग है। भारत ने जानबूझकर 'संप्रभुता' का शब्द इस्तेमाल किया — वही शब्द जो वह कश्मीर के मामले में अपने लिए इस्तेमाल करता है। इससे दो काम एक साथ हो रहे हैं। पहला: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को 'दूसरे देशों की संप्रभुता का उल्लंघन करने वाला' साबित करना। दूसरा: अफ़ग़ान तालिबान को यह संदेश देना कि मुश्किल वक़्त में भारत उनके साथ खड़ा है — जो भविष्य में रणनीतिक लाभांश दे सकता है।
ग़ौरतलब यह भी है कि भारत का यह रुख़ उस समय आया है जब भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (IWT) पर भी तनाव चरम पर है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने IWT रुकने पर भारतीय बाँधों पर हमले की धमकी दी थी — जिसे विश्लेषकों ने 'खोखली धमकी' क़रार दिया। यानी भारत एक साथ कई मोर्चों पर पाकिस्तान को दबाव में रख रहा है — पानी, कूटनीति और अब अफ़ग़ानिस्तान।
आगे क्या? — वह सवाल जो सबको पूछना चाहिए
अगर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव और तेज़ होता है — और सब संकेत यही कहते हैं — तो भारत के सामने एक ऐतिहासिक मौक़ा है। लेकिन ख़तरे भी उतने ही बड़े हैं। तालिबान अपनी विचारधारा में वही है जो 2001 में था — महिलाओं के अधिकार, लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार — इन सबके मामले में काबुल की हक़ीक़त कड़वी है। भारत अगर तालिबान से बहुत क़रीब जाता है, तो अपनी 'लोकतंत्र के चैंपियन' वाली छवि पर सवाल उठेंगे।
दूसरी तरफ़, पाकिस्तान का अगला क़दम तय करेगा कि यह तनाव सीमित रहता है या एक बड़े क्षेत्रीय संकट में बदलता है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने अफ़ग़ान सीमा पर और सैनिक तैनाती बढ़ाई है — जो आगे और हमलों का संकेत हो सकता है।
और बीच में खड़ा है भारत — जो इस समय चुप्पी और बयान के बीच की कला साध रहा है। [EMBED-SUGGESTION:tweet]
असल सवाल यह नहीं है कि भारत ने पाकिस्तान की निंदा क्यों की — वह तो स्वाभाविक था। असल सवाल यह है: क्या मोदी सरकार उस तालिबान के साथ खुले गठबंधन तक जाने को तैयार है जिसे अभी भी दुनिया का बड़ा हिस्सा मान्यता नहीं देता? क्योंकि अगर दिल्ली वह दाँव खेलती है, तो दक्षिण एशिया का नक़्शा हमेशा के लिए बदल जाएगा — और इस्लामाबाद पहली बार अपनी ही चाल में चारों तरफ़ से घिरा मिलेगा।
आँकड़ों में
- पाकिस्तानी हवाई हमलों में दर्जनों अफ़ग़ान नागरिक मारे गए — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
- भारत ने 'blatant act of aggression' और 'direct threat to regional peace' शब्दावली इस्तेमाल की — हिंदुस्तान टाइम्स
- पाकिस्तान ने कराची हमले को अफ़ग़ान ज़मीन से जोड़कर एयरस्ट्राइक का औचित्य बताया — द हिंदू
मुख्य बातें
- भारत ने पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक को 'खुला आक्रामक कृत्य' और 'क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा ख़तरा' बताया — हिंदुस्तान टाइम्स
- टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, भारत ने कहा कि ये हमले पाकिस्तान की 'बाहरी दुश्मन गढ़ने की पैथोलॉजिकल ज़रूरत' दर्शाते हैं
- भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (IWT), अफ़ग़ानिस्तान और सीमा — तीन मोर्चों पर एक साथ तनाव चरम पर
- 2021 के बाद भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय सहायता के ज़रिये चुपचाप कूटनीतिक मौजूदगी बहाल करनी शुरू की
- पाकिस्तानी सेना ने अफ़ग़ान सीमा पर और सैनिक तैनाती बढ़ाई — आगे और हमलों का संकेत — टाइम्स ऑफ़ इंडिया
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत ने अफ़ग़ानिस्तान पर पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक की निंदा क्यों की?
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, भारत ने इसे 'खुला आक्रामक कृत्य' और 'क्षेत्रीय शांति के लिए सीधा ख़तरा' बताया। भारत ने अफ़ग़ान संप्रभुता के उल्लंघन और नागरिकों के जान-माल के नुक़सान पर चिंता जताई।
क्या अफ़ग़ानिस्तान भारत का समर्थन करता है या पाकिस्तान का?
2021 में तालिबान सत्ता में आने के बाद अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान रिश्ते बिगड़े हैं। भारत ने मानवीय सहायता के ज़रिये काबुल से दोबारा संपर्क बढ़ाया है। फ़िलहाल तालिबान किसी का खुला सहयोगी नहीं, लेकिन पाकिस्तान से टकराव बढ़ रहा है।
पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान पर एयरस्ट्राइक क्यों की?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, पाकिस्तान ने कराची में हुए हमले के लिए अफ़ग़ान ज़मीन से सक्रिय आतंकी तत्वों को ज़िम्मेदार बताया और उसी आधार पर हवाई हमले किए।
भारत और तालिबान के रिश्ते कैसे हैं?
भारत ने तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन मानवीय सहायता और बैकचैनल कूटनीति के ज़रिये संपर्क बनाए रखा है। विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव से भारत को रणनीतिक अवसर मिल रहा है।