UCC का विरोध करने वाली ममता ने अपना ड्राफ्टिंग पैनल बनाया — बंगाल के इस कदम का हिंदी बेल्ट पर क्या असर पड़ेगा?

ममता बनर्जी सरकार ने बंगाल में अपना UCC ड्राफ्ट बिल तैयार करने के लिए रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पैनल गठित किया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह कदम केंद्र के UCC से अलग बंगाल का अपना मॉडल पेश करने की कवायद है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और TMC सरकार ने रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई को UCC ड्राफ्टिंग पैनल का प्रमुख नियुक्त किया (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।
  • क्या: बंगाल सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर अपना ड्राफ्ट बिल तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल का गठन किया है (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।
  • कब: यह घोषणा जून 2025 में की गई, 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।
  • कहाँ: पश्चिम बंगाल — पैनल का गठन कोलकाता में राज्य सरकार के स्तर पर हुआ है (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।
  • क्यों: TMC सरकार का कहना है कि केंद्र के UCC से अलग बंगाल का अपना मॉडल होना चाहिए, जो राज्य की सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करे (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।
  • कैसे: रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई के नेतृत्व में पैनल ड्राफ्ट बिल तैयार करेगा, जिसे बाद में बंगाल विधानसभा में पेश किया जा सकता है (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)।

ममता बनर्जी ने सियासी बिसात पर एक ऐसा मोहरा चला है जिसने दोस्त और दुश्मन दोनों को चौंकाया है। जिस यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को उन्होंने बार-बार 'केंद्र की तानाशाही' और 'संघीय ढांचे पर हमला' बताकर खारिज किया, उसी UCC का अपना बंगाली संस्करण बनाने के लिए अब उन्होंने रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई में एक ड्राफ्टिंग पैनल खड़ा कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह पैनल बंगाल का अपना ड्राफ्ट UCC बिल तैयार करेगा — केंद्र के मॉडल से अलग, लेकिन नाम वही।

ध्यान रहे: ममता ने केंद्र सरकार के UCC का विरोध किया है, हर प्रकार के समान नागरिक संहिता का नहीं। उनका तर्क रहा है कि केंद्र का मॉडल राज्यों की विविधता को नज़रअंदाज़ करता है। अब उनका अपना पैनल गठित करना इसी तर्क का विस्तार है — लेकिन सवाल यह है कि इसकी टाइमिंग 2026 के चुनावी कैलेंडर से क्यों जुड़ी है?

गणित साफ़ है: हिंदू वोट बैंक का दरवाज़ा खोलो, मुस्लिम वोट बैंक को बिदकाओ मत

पैनल की अध्यक्षता रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार उन्होंने पहले भी कई सामाजिक सुधार मामलों में प्रगतिशील फ़ैसले दिए हैं। यह चयन अकारण नहीं है। एक सुप्रीम कोर्ट जज का नाम जोड़कर ममता ने पैनल को 'सियासी ड्रामा' की छवि से ऊपर उठाने की कोशिश की है। लेकिन असली खेल इससे कहीं गहरा है।

बंगाल की आबादी में करीब 27-30% मुस्लिम वोट बैंक TMC की रीढ़ रहा है। लेकिन 2024 के लोकसभा नतीजों ने एक चिंताजनक संकेत दिया — BJP ने बंगाल में 12 सीटें जीतीं और हिंदू बहुल ज़िलों में TMC की ज़मीन खिसकी। ममता के सामने दोहरी चुनौती है: मुस्लिम वोट बैंक को बिदकाए बिना हिंदू मतदाता को यह संदेश देना कि TMC 'सिर्फ़ मुस्लिम पार्टी' नहीं है। और UCC का अपना पैनल बनाना इसी संदेश का सबसे चतुर पैकेज है।

BJP का जवाब: 'नक़ल की नक़ल'

BJP ने बंगाल के इस कदम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, BJP नेताओं ने इसे 'ममता की नक़ल' और 'चुनावी ऑप्टिक्स' करार दिया है। BJP का तर्क है कि UCC 'एक देश, एक कानून' का मामला है और हर राज्य का अलग-अलग UCC बनाना इसके मूल उद्देश्य — समानता और एकरूपता — को ही कमज़ोर करता है। BJP ने उत्तराखंड के 2024 में लागू हुए राज्य-स्तरीय UCC को अपना मॉडल बताते हुए कहा है कि केंद्र का UCC ही 'असली UCC' है, बाकी सब 'वोट बैंक की राजनीति' है। हालाँकि, कई विश्लेषकों ने नोट किया है कि BJP को भी बंगाल की इस चाल से सतर्क रहना होगा — क्योंकि अगर ममता का ड्राफ्ट 'प्रगतिशील' दिखा, तो BJP का 'ममता UCC-विरोधी हैं' वाला हमला कमज़ोर पड़ सकता है।

सियासी गलियारों में चर्चा: TMC के भीतर क्या हो रहा है?

कई मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक विश्लेषकों के हवाले से यह चर्चा है कि ममता की असली चिंता BJP का UCC कार्ड नहीं, बल्कि उनकी खुद की पार्टी के भीतर का बदलता मूड हो सकता है। कथित तौर पर TMC के कई विधायक — खासकर दक्षिण बंगाल के हिंदू बहुल हलकों से — पार्टी नेतृत्व पर दबाव बना रहे थे कि UCC पर सिर्फ़ 'विरोध' की पोज़ीशन 2026 में भारी पड़ सकती है। कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों का अनुमान है कि शहरी हिंदू मतदाताओं में UCC को 'बराबरी का कानून' मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है — हालाँकि इसकी पुष्टि किसी सार्वजनिक सर्वे से नहीं हुई है। यह भी संभव माना जा रहा है कि पैनल का गठन दरअसल ममता का 'प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक' है — BJP के 'एक देश, एक कानून' नारे को बेअसर करने के लिए 'हमारा अपना कानून' का जवाब तैयार रखना। (यह राजनीतिक विश्लेषकों की चर्चा और अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

'केंद्र का UCC' बनाम 'बंगाल का UCC' — यह फ़र्क़ क्यों अहम है

ममता की रणनीति का सबसे चालाक हिस्सा यह है कि उन्होंने केंद्र के UCC का विरोध छोड़ा नहीं — उसे रीडिफ़ाइन कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, बंगाल सरकार का तर्क है कि हर राज्य को अपनी सांस्कृतिक विविधता के हिसाब से अपना UCC बनाने का अधिकार होना चाहिए — 'एक साइज़ सबको फ़िट' वाला केंद्रीय मॉडल नहीं चलेगा। यह तर्क संघवाद की भाषा में पैक किया गया है, लेकिन इसका चुनावी मकसद भी स्पष्ट है: BJP को यह कहने का मौका न देना कि 'देखो, ममता UCC के ख़िलाफ़ हैं, यानी वे बराबरी के ख़िलाफ़ हैं।'

यहाँ एक और दिलचस्प बात है। उत्तराखंड ने 2024 में देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC लागू किया था। अब अगर बंगाल भी — वह बंगाल जो विपक्ष का गढ़ माना जाता है — UCC की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो कांग्रेस, RJD, SP जैसी पार्टियों के लिए हिंदी बेल्ट में UCC का विरोध करना और मुश्किल हो जाएगा। जो कोण बाकी मीडिया से छूट गया, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: ममता का यह कदम सिर्फ़ बंगाल की सियासत नहीं बदलेगा — यह UP, बिहार और मध्य प्रदेश में विपक्ष की UCC-विरोधी नैरेटिव को कमज़ोर कर सकता है।

रंजना प्रकाश देसाई: गंभीर कवायद या सिर्फ़ ऑप्टिक्स?

पैनल की साख का सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या यह वाकई कानून बनाने की कवायद है, या चुनाव से पहले 'हम भी UCC पर काम कर रहे हैं' का पोस्टर? एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज को अध्यक्ष बनाना — यह सिर्फ़ ऑप्टिक्स से ज़्यादा है। ममता जानती हैं कि अगर पैनल को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो BJP इसे 'नौटंकी' करार देकर दोगुना हमला करेगी। इसलिए जज देसाई का नाम एक ढाल भी है और तलवार भी।

लेकिन यहीं पर पेंच फँसता है। बंगाल विधानसभा में बिल पास कराने और फिर राज्यपाल की मंज़ूरी लेने का रास्ता लंबा है। बंगाल के राज्यपाल और TMC सरकार के बीच तनावपूर्ण रिश्ते किसी से छुपे नहीं हैं — कई बिल पहले भी राज्यपाल की मेज़ पर अटके हैं। अगर UCC ड्राफ्ट भी वहीं अटक गया, तो ममता कह सकती हैं: 'हमने कोशिश की, केंद्र ने रोका' — और चुनावी फ़ायदा तब भी मिलेगा।

हिंदी बेल्ट के लिए मायने: विपक्ष के पास अब क्या बचेगा?

यही वह बिंदु है जो लखनऊ से लेकर पटना तक के नेता ध्यान से देख रहे हैं। अगर ममता बनर्जी — जो राष्ट्रीय विपक्ष का सबसे मुखर चेहरा हैं — खुद UCC की दिशा में चलने लगती हैं, तो अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और कांग्रेस के लिए 'UCC सांप्रदायिक है' वाली लाइन बेचना कठिन होता जाएगा। BJP के लिए यह सोने पर सुहागा हो सकता है — वे कह सकते हैं कि 'जब ममता भी मान गईं, तो आप क्यों अड़े हैं?'

दूसरी तरफ़, ममता का यह कदम एक और संभावना खोलता है: क्या अन्य गैर-BJP राज्य भी अपना-अपना UCC ड्राफ्ट लेकर आएँगे? अगर ऐसा हुआ, तो UCC 'केंद्र बनाम राज्य' की लड़ाई बन जाएगा — और BJP का 'एक देश, एक कानून' नारा उलटा उन पर भारी पड़ सकता है, क्योंकि हर राज्य कहेगा 'हमारा अपना UCC काफ़ी है।'

आगे क्या देखना है

आने वाले हफ़्तों में तीन चीज़ें तय करेंगी कि ममता का यह दांव कितना गंभीर है:

  • पैनल की डेडलाइन: अगर ड्राफ्ट की समयसीमा 2026 चुनाव से ठीक पहले रखी गई है, तो यह चुनावी कवायद होने के संकेत मज़बूत होंगे।
  • ड्राफ्ट का दायरा: अगर मुस्लिम पर्सनल लॉ को छुआ ही नहीं गया, तो यह कॉस्मेटिक एक्सरसाइज़ मानी जाएगी।
  • मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया: अगर जमीअत या AIMPLB ने विरोध किया और ममता पीछे हटीं, तो असली इरादा साफ़ हो जाएगा।

एक बात तय है: ममता बनर्जी ने UCC की बिसात पर अपना मोहरा चल दिया है। यह मोहरा वज़ीर बनेगा या प्यादा रहेगा — यह 2026 का बंगाल चुनाव तय करेगा। लेकिन हिंदी बेल्ट के विपक्ष को अभी से सोचना होगा: जब बंगाल ने UCC की तरफ़ कदम बढ़ा दिया, तो बाकी विपक्षी दल कब तक सिर्फ़ विरोध की पोज़ीशन पर टिके रहेंगे?

आँकड़ों में

  • बंगाल में करीब 27-30% मुस्लिम आबादी TMC के सबसे बड़े वोट बैंक का आधार है।
  • 2024 लोकसभा चुनाव में BJP ने पश्चिम बंगाल में 12 सीटें जीतीं, जो हिंदू बहुल ज़िलों में TMC की गिरती पकड़ का संकेत था।
  • उत्तराखंड ने 2024 में देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC लागू किया।

मुख्य बातें

  • ममता बनर्जी ने रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में बंगाल का अपना UCC ड्राफ्टिंग पैनल गठित किया — इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह केंद्र के UCC से अलग बंगाल का स्वतंत्र मॉडल होगा।
  • TMC का तर्क: 'एक साइज़ सबको फ़िट' वाला केंद्रीय UCC नहीं चलेगा, हर राज्य को अपनी विविधता के अनुसार अपना कानून बनाने का अधिकार होना चाहिए।
  • 2024 लोकसभा में BJP ने बंगाल में 12 सीटें जीतीं — हिंदू बहुल ज़िलों में TMC की कमज़ोर होती पकड़ का संकेत।
  • BJP ने बंगाल के कदम को 'चुनावी ऑप्टिक्स' और 'नक़ल' करार दिया है, कहा कि हर राज्य का अलग UCC मूल उद्देश्य को कमज़ोर करता है।
  • उत्तराखंड के बाद बंगाल दूसरा राज्य होगा जो UCC की दिशा में आगे बढ़ रहा है — यह हिंदी बेल्ट के विपक्ष की UCC-विरोधी नैरेटिव को कमज़ोर कर सकता है।
  • पैनल की समयसीमा, ड्राफ्ट में पर्सनल लॉ का दायरा और मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया — ये तीन संकेतक बताएँगे कि यह गंभीर कवायद है या चुनावी ऑप्टिक्स।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बंगाल में UCC बिल क्या है?

बंगाल सरकार ने केंद्र के यूनिफॉर्म सिविल कोड से अलग अपना UCC ड्राफ्ट बिल तैयार करने के लिए रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक पैनल गठित किया है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह बंगाल की सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए राज्य-स्तरीय मॉडल होगा।

क्या BJP UCC के पक्ष में है?

हाँ, BJP ने UCC को अपने प्रमुख वादों में शामिल किया है और 'एक देश, एक कानून' का नारा दिया है। उत्तराखंड में BJP सरकार ने 2024 में देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC लागू भी किया। BJP ने बंगाल के अलग UCC पैनल को 'चुनावी ऑप्टिक्स' करार दिया है।

किस राज्य ने हाल ही में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल मंज़ूर किया है?

उत्तराखंड ने 2024 में देश का पहला राज्य-स्तरीय UCC बिल पारित और लागू किया। अब पश्चिम बंगाल ने भी अपना UCC ड्राफ्ट तैयार करने के लिए पैनल गठित किया है।

ममता बनर्जी ने UCC पर अपना रुख क्यों बदला?

ममता ने केंद्र के UCC का विरोध जारी रखा है, लेकिन बंगाल का अपना मॉडल पेश करने के लिए पैनल बनाया है। विश्लेषकों का मानना है कि 2024 लोकसभा में BJP की बंगाल में 12 सीटों की जीत ने TMC को हिंदू वोट बैंक में सेंध का संकेत दिया, और 2026 विधानसभा चुनाव से पहले BJP के UCC कार्ड को बेअसर करने के लिए यह कदम उठाया गया।

बंगाल के UCC पैनल पर BJP की क्या प्रतिक्रिया है?

BJP ने बंगाल के UCC पैनल को 'चुनावी ऑप्टिक्स' और 'नक़ल' करार दिया है। BJP का तर्क है कि UCC 'एक देश, एक कानून' का मामला है और हर राज्य का अलग UCC बनाना इसके मूल उद्देश्य को कमज़ोर करता है।

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