बिना सेंसर पास ZEE5 पर रिलीज़ हुई 'सतलुज' — क्या यह OTT की आज़ादी पर ताले का पहला बहाना है?
I&B मिनिस्ट्री ने ZEE5 पर आरोप लगाया है कि प्लेटफ़ॉर्म ने दिलजीत दोसांझ अभिनीत फ़िल्म 'सतलुज' को CBFC सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया पूरी किए बिना स्ट्रीम कर दिया। Bollywood Hungama की रिपोर्ट के अनुसार यह मामला OTT प्लेटफ़ॉर्म्स पर सरकारी सेंसरशिप के नए दौर का ट्रिगर बन सकता है।
एक फ़िल्म — जिसे CBFC ने 120 से ज़्यादा कट्स दिए, जिसका नाम बदलवाया, जिसकी रिलीज़ सालों तक अटकी रही — आख़िरकार OTT पर पहुँचती है। और अब सरकार कह रही है कि वह वहाँ पहुँची ही नहीं होनी चाहिए थी। Bollywood Hungama की रिपोर्ट के अनुसार I&B मिनिस्ट्री ने ZEE5 पर गंभीर आरोप लगाया है कि प्लेटफ़ॉर्म ने दिलजीत दोसांझ अभिनीत 'सतलुज' को CBFC सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया पूरी किए बिना स्ट्रीम कर दिया।
यह सिर्फ़ एक फ़िल्म और एक प्लेटफ़ॉर्म का मामला नहीं रहा — यह वह चिनगारी है जो पूरी OTT इंडस्ट्री के 'सेल्फ़-रेगुलेशन' मॉडल को जलाकर राख कर सकती है।
वह 'लूपहोल' जो OTT की जान थी
भारत में अभी तक OTT प्लेटफ़ॉर्म्स एक अजीबोग़रीब क़ानूनी ग्रे-ज़ोन में काम करते रहे हैं। सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट, 1952 सीधे तौर पर थिएट्रिकल रिलीज़ पर लागू होता है — हर फ़िल्म को सिनेमाघर में दिखाने से पहले CBFC का सर्टिफ़िकेट चाहिए। लेकिन OTT? 2023 में संशोधित सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट के बाद भी, स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म्स IT एक्ट, 2021 के इंटरमीडियरी गाइडलाइन्स के तहत एक 'सेल्फ़-रेगुलेशन' ढाँचे में चलते हैं — जहाँ प्लेटफ़ॉर्म ख़ुद अपनी कंटेंट रेटिंग तय करता है और शिकायत-आधारित तंत्र काम करता है। CBFC का सीधा दख़ल नहीं।
रिपोर्ट्स के अनुसार 'सतलुज' का मामला ठीक इसी दरार में फँसा है। फ़िल्म को पहले थिएट्रिकल रिलीज़ के लिए CBFC में जमा किया गया था। CBFC ने भारी-भरकम कट्स लगाए — 120 से ज़्यादा। नाम 'Punjab 95' से बदलकर 'सतलुज' किया गया। लेकिन I&B मिनिस्ट्री का आरोप है कि यह सर्टिफ़िकेशन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी जब ZEE5 ने फ़िल्म को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर लाइव कर दिया।
सीधे शब्दों में कहें तो — CBFC ने जो हरी झंडी दी ही नहीं थी, ZEE5 ने मान लिया कि OTT पर उसकी ज़रूरत ही नहीं।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री के हलकों में इस मामले को लेकर दो बिलकुल अलग कहानियाँ सुनाई दे रही हैं। एक पक्ष — जो ZEE5 के क़रीब माना जाता है — का कहना है कि OTT रिलीज़ के लिए CBFC सर्टिफ़िकेट की अनिवार्यता क़ानूनी रूप से स्पष्ट नहीं है और प्लेटफ़ॉर्म ने सेल्फ़-रेगुलेशन गाइडलाइन्स का पालन किया। दूसरा पक्ष — ट्रेड विश्लेषक और कुछ प्रोड्यूसर्स — फुसफुसा रहे हैं कि ZEE5 जानता था कि 'सतलुज' का कंटेंट विवादास्पद है, CBFC ने इसे इतना काटा था कि मेकर्स ख़ुश नहीं थे, और प्लेटफ़ॉर्म ने जानबूझकर 'अनकट' या 'कम कटा हुआ' वर्ज़न स्ट्रीम किया ताकि दर्शकों को वह मिले जो सिनेमाघर में कभी नहीं दिखता।
फ़ैन्स के बीच तो मूड और भी दिलचस्प है — एक बड़ा वर्ग मान रहा है कि सरकार 'सतलुज' के कंटेंट से नाराज़ है क्योंकि फ़िल्म पंजाब के 1990 के दशक के अंधेरे अध्याय — ख़ासकर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की कहानी — को दिखाती है, और 'सर्टिफ़िकेशन' का मुद्दा असल में बहाना है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
असली सवाल — सेंसरशिप या सिस्टम?
यहीं पर कहानी सिर्फ़ एक फ़िल्म से बड़ी हो जाती है। भारत में OTT प्लेटफ़ॉर्म्स की तेज़ी 2020 के बाद से जिस बुनियाद पर खड़ी है, वह यही है — 'हम CBFC नहीं हैं, हमारा अपना सिस्टम है।' Netflix, Amazon Prime, Disney+ Hotstar, JioCinema — सबने इसी ग्रे-ज़ोन में 'Sacred Games' से लेकर 'Tandav' तक, 'Paatal Lok' से 'IC 814' तक कंटेंट बनाया। कभी विवाद हुआ, शिकायतें आईं, कुछ केसेस में सरकार ने दबाव बनाया — लेकिन CBFC जैसी 'प्री-सेंसरशिप' कभी लागू नहीं हुई।
'सतलुज' का मामला इस पूरे ढाँचे पर पहला ठोस सरकारी हमला है। अगर I&B मिनिस्ट्री का यह आरोप टिकता है कि OTT प्लेटफ़ॉर्म पर भी CBFC सर्टिफ़िकेशन ज़रूरी है — या कम-से-कम उन फ़िल्मों के लिए जो पहले थिएट्रिकल सर्टिफ़िकेशन में गई थीं — तो यह एक ऐसा प्रिसीडेंट बनेगा जो हर OTT प्लेटफ़ॉर्म के बिज़नेस मॉडल को हिला देगा।
इसे इंडिया हेराल्ड का सीधा रीड मानिए — यह 'सतलुज' के बारे में कम और OTT पर 'हार्ड सेंसरशिप' का दरवाज़ा खोलने के बारे में ज़्यादा है। सरकार को एक टेस्ट केस चाहिए था — एक ऐसी फ़िल्म जो पहले से विवादित हो, जिसका CBFC इतिहास तूफ़ानी हो, और जिसके मेकर्स पर 'नियम तोड़ने' का आरोप लगाना आसान हो। 'सतलुज' वह परफ़ेक्ट बहाना है।
OTT इंडस्ट्री में घबराहट की लहर
ट्रेड हलकों में पहले से ही बेचैनी है। अगर CBFC का दायरा OTT तक फैलता है, तो इसका मतलब है कि हर वेब सीरीज़, हर फ़िल्म, हर डॉक्यूमेंट्री — सब कुछ रिलीज़ से पहले सरकारी बोर्ड के सामने जाएगा। वही बोर्ड जिसने 'उड़ता पंजाब' में 94 कट्स माँगे थे, जिसने 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्क़ा' को रोका था, जिसने 'सतलुज' को इतना काटा कि मेकर्स ने थिएट्रिकल रिलीज़ ही छोड़ दी।
एक वरिष्ठ OTT एक्ज़ीक्यूटिव — जो नाम न छापने की शर्त पर बात करते हैं — का कहना है कि इंडस्ट्री में अभी दो ख़ेमे हैं: एक जो मानता है कि यह सिर्फ़ ZEE5 का मामला है और बाक़ी प्लेटफ़ॉर्म्स पर असर नहीं पड़ेगा, और दूसरा जो मान रहा है कि यह 'पहला पत्थर' है — आने वाले दिनों में ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज़ (रेगुलेशन) बिल, 2024 के तहत OTT पर पूर्ण सरकारी नियंत्रण का रास्ता इसी केस से होकर जाएगा।
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ZEE5 का पक्ष — और जो अभी तक नहीं बोला गया
ZEE5 की ओर से इस मामले पर अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सार्वजनिक नहीं हुआ है। Bollywood Hungama की रिपोर्ट के अनुसार प्लेटफ़ॉर्म ने I&B मिनिस्ट्री के नोटिस का जवाब दिया है, लेकिन उस जवाब का ब्योरा सार्वजनिक नहीं है। क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ZEE5 का बचाव इसी बिंदु पर टिकेगा कि मौजूदा IT एक्ट गाइडलाइन्स के तहत OTT रिलीज़ के लिए CBFC सर्टिफ़िकेट अनिवार्य नहीं है — और अगर सरकार इसे बदलना चाहती है, तो उसे पहले क़ानून बदलना होगा।
लेकिन यही वह जगह है जहाँ खेल पलटता है। ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज़ (रेगुलेशन) बिल, जो 2024 से लंबित है, ठीक यही करने का प्रावधान रखता है — OTT को 'ब्रॉडकास्टिंग' की परिभाषा में लाना और उस पर वैसा ही सरकारी नियंत्रण लागू करना जैसा टीवी चैनलों पर है। 'सतलुज' का विवाद इस बिल को संसद में लाने के लिए सरकार को एक रेडीमेड तर्क देता है — 'देखिए, बिना सेंसर के क्या होता है।'
आगे क्या — OTT की आज़ादी का इम्तिहान
अगले कुछ हफ़्तों में जो होगा वह सिर्फ़ ZEE5 और 'सतलुज' तक सीमित नहीं रहेगा। अगर I&B मिनिस्ट्री इस केस को आगे बढ़ाती है और CBFC सर्टिफ़िकेशन को OTT के लिए भी अनिवार्य ठहराने की दिशा में क़दम उठाती है, तो Netflix, Amazon, JioCinema — सबको अपना पूरा कंटेंट पाइपलाइन मॉडल बदलना होगा। प्रोडक्शन लागत बढ़ेगी, रिलीज़ टाइमलाइन खिंचेगी, और सबसे बड़ी बात — वह 'बोल्ड कंटेंट' जो OTT की पहचान बना, उसका भविष्य सीधे CBFC की कैंची पर निर्भर हो जाएगा।
और अगर यह केस सिर्फ़ एक नोटिस पर ठंडा पड़ जाता है — तो भी संदेश साफ़ है: सरकार के पास अब एक पूर्व-उदाहरण है, एक तर्क है, और एक फ़ाइल है। अगली बार जब कोई OTT प्लेटफ़ॉर्म कुछ 'असुविधाजनक' दिखाएगा, यह फ़ाइल खुलेगी।
'सतलुज' ने पंजाब की एक दबी हुई कहानी बताने की कोशिश की। विडंबना यह है कि अब ख़ुद फ़िल्म की कहानी उसी सवाल का आईना बन गई है — भारत में कौन तय करेगा कि जनता क्या देखे?
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मुख्य बातें
- I&B मिनिस्ट्री का आरोप है कि ZEE5 ने 'सतलुज' को CBFC सर्टिफ़िकेशन पूरा किए बिना स्ट्रीम किया — Bollywood Hungama की रिपोर्ट के अनुसार
- भारत में OTT प्लेटफ़ॉर्म्स अभी IT एक्ट के सेल्फ़-रेगुलेशन ढाँचे में काम करते हैं, CBFC का सीधा दख़ल नहीं — यही वह ग्रे-ज़ोन है जिसे सरकार ख़त्म करना चाहती है
- ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज़ (रेगुलेशन) बिल, 2024 OTT को ब्रॉडकास्टिंग की परिभाषा में लाने का प्रावधान रखता है — 'सतलुज' विवाद इसे संसद में लाने का रेडीमेड तर्क बन सकता है
- अगर CBFC का दायरा OTT तक फैलता है, तो Netflix, Amazon, JioCinema समेत सभी प्लेटफ़ॉर्म्स का कंटेंट मॉडल बदलना होगा
आँकड़ों में
- CBFC ने 'सतलुज' (पहले 'Punjab 95') में 120 से ज़्यादा कट्स लगाए — Bollywood Hungama रिपोर्ट के अनुसार
- ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज़ (रेगुलेशन) बिल 2024 से लंबित है जो OTT को ब्रॉडकास्टिंग परिभाषा में लाने का प्रावधान रखता है