फिल्म इंडस्ट्री के लिए सरकार का 'मेगा प्लान' — क्या बॉलीवुड की मनमानी ख़त्म और ओटीटी पर कसेगी नकेल?

Singh Anchala

भारत सरकार ने फिल्म इंडस्ट्री के लिए व्यापक पहलें घोषित की हैं जिनमें सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ओटीटी रेगुलेशन शामिल हैं। News On AIR के अनुसार, ये क़दम इंडस्ट्री को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए हैं — लेकिन असल असर बॉलीवुड-साउथ की पावर डायनामिक्स और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स की स्वतंत्रता पर पड़ेगा।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत सरकार (Government of India) ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री (Indian film industry) के लिए यह घोषणा की।
  • क्या: फिल्म इंडस्ट्री को मज़बूत करने के लिए सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास और ओटीटी रेगुलेशन से जुड़ी व्यापक पहलें।
  • कब: 2025 में — News On AIR के अनुसार हालिया सरकारी घोषणा।
  • कहाँ: पूरे भारत में — बॉलीवुड, टॉलीवुड, कोलीवुड सहित सभी भाषाई फिल्म इंडस्ट्रीज़ पर लागू।
  • क्यों: भारतीय सिनेमा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे लाने, रोज़गार बढ़ाने और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर कंटेंट रेगुलेशन सुनिश्चित करने के लिए।
  • कैसे: सरकारी सब्सिडी, शूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, और ओटीटी कंटेंट गाइडलाइन्स के ज़रिए — एक केंद्रीकृत पॉलिसी फ्रेमवर्क से।

भारत सरकार का फिल्म इंडस्ट्री के लिए यह 'मेगा प्लान' — जिसमें सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ओटीटी रेगुलेशन शामिल हैं — सुनने में तो ऐसा लगता है जैसे सरकार ने सिनेमा की झोली भर दी। लेकिन ज़रा ठहरिए। जो सवाल कोई नहीं पूछ रहा, वह यह है: इस पैकेज में असल फ़ायदा किसे होगा — मुंबई की बड़ी प्रोडक्शन लॉबी को, या हैदराबाद-चेन्नई-कोच्चि की उन इंडस्ट्रीज़ को जो पिछले पाँच साल में बॉक्स ऑफ़िस की असली ताक़त बनकर उभरी हैं?

News On AIR की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार (Government of India) ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री (Indian film industry) को मज़बूत बनाने के लिए कई बड़ी पहलों की घोषणा की है। इनमें फिल्म प्रोडक्शन के लिए सब्सिडी, शूटिंग लोकेशन्स का इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, सिंगल-विंडो परमिशन सिस्टम, और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए कंटेंट गाइडलाइन्स जैसे क़दम शामिल हैं। सतह पर देखें तो यह एक ख़ुशख़बरी है — इंडस्ट्री लंबे अर्से से ऐसी सरकारी मदद की माँग कर रही थी।

लेकिन असल कहानी इस ऐलान के नीचे दबी है।

सब्सिडी का गणित — पैसा जाएगा कहाँ?

फिल्म प्रोडक्शन सब्सिडी की बात जब भी होती है, एक ऐतिहासिक पैटर्न है जो दोहराता है: बड़ा बजट, बड़ा शहर, बड़ा प्रोडक्शन हाउस। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पिछले आँकड़ों पर ग़ौर करें तो केंद्रीय स्तर पर जो भी फिल्म-संबंधी प्रोत्साहन दिए गए — चाहे NFDC के ज़रिए हों या शूटिंग परमिट में रियायत — उनका बड़ा हिस्सा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री यानी बॉलीवुड के पास ही पहुँचा। तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ इंडस्ट्रीज़ ने अपनी राज्य सरकारों से सपोर्ट लिया, केंद्र से बहुत कम।

अब सवाल यह है कि इस नए प्लान में सब्सिडी वितरण का फ़ॉर्मूला क्या होगा। क्या यह बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन के अनुपात में होगा — तो फिर साउथ इंडस्ट्री का हिस्सा बढ़ना तय है, क्योंकि 2023-24 में भारतीय बॉक्स ऑफ़िस की शीर्ष दस फिल्मों में छह दक्षिण भारतीय थीं (Ormax Media के डेटा के अनुसार)। या फिर यह 'प्रति फिल्म' मॉडल होगा जहाँ हर भाषा को बराबर मिले — जो सुनने में उचित लगता है, लेकिन अमल में बॉलीवुड के पक्ष में झुकता है क्योंकि उनकी फिल्मों की संख्या सबसे ज़्यादा है।

ओटीटी पर नकेल — रेगुलेशन या सेंसरशिप?

यह शायद इस पूरे पैकेज का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पिछले पाँच साल में भारतीय कंटेंट इकोसिस्टम की सबसे ताक़तवर ताक़त बनकर उभरे हैं। FICCI-EY मीडिया एंड एंटरटेनमेंट रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में ओटीटी मार्केट ₹12,000 करोड़ से ऊपर पहुँच चुका है और यह थिएट्रिकल रेवेन्यू को चुनौती दे रहा है।

सरकार ने जो 'कंटेंट गाइडलाइन्स' का ज़िक्र किया है, उसे इंडस्ट्री के एक वर्ग ने स्वागत किया है — ख़ासकर वे प्रोड्यूसर जो मानते हैं कि कुछ ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म अश्लील या हिंसक कंटेंट से TRP बटोर रहे हैं। लेकिन दूसरा वर्ग चिंतित है। इंडस्ट्री के कई दिग्गज निर्माता — जिनके नाम सार्वजनिक बयानों में नहीं आ रहे — निजी तौर पर यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह रेगुलेशन 'कंटेंट क्वालिटी' के नाम पर क्रिएटिव फ़्रीडम को बाँध देगा।

यहाँ एक और पेच है: ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स ने रीजनल कंटेंट को वह पहचान दी जो थिएटर्स कभी नहीं दे पाए। मराठी, बंगाली, मलयालम फिल्में और वेब सीरीज़ जो कभी अपने राज्य की सीमाओं में क़ैद थीं, ओटीटी ने उन्हें राष्ट्रीय दर्शक दिया। अगर रेगुलेशन इतना कड़ा हो गया कि छोटे प्रोड्यूसर्स के लिए कंप्लायंस का बोझ असहनीय हो जाए, तो सबसे पहले यही रीजनल कंटेंट मरेगा — और बड़े कॉरपोरेट प्लेटफ़ॉर्म्स बचेंगे जो कंप्लायंस का ख़र्चा उठा सकते हैं।

इनसाइड टॉक

इंडस्ट्री हलकों में एक और चर्चा ज़ोरों पर है जो किसी सरकारी प्रेस रिलीज़ में नहीं मिलेगी। ट्रेड विश्लेषकों और कुछ वरिष्ठ प्रोड्यूसर्स की बात मानें तो इस 'मेगा प्लान' का एक अनकहा मक़सद भी है — बॉलीवुड को वापस गेम में लाना। पिछले तीन-चार साल से साउथ इंडस्ट्री ने बॉलीवुड की हिंदी-बेल्ट मार्केट में सेंध लगाई है। 'बाहुबली' से शुरू हुआ सिलसिला 'KGF', 'RRR', 'पुष्पा' और 'जवान' तक पहुँचा — और बॉलीवुड के पारंपरिक गढ़ हिल गए।

इंडस्ट्री में फुसफुसाहट यह है कि बड़े बॉलीवुड प्रोडक्शन हाउसेज़ ने सरकार पर दबाव बनाया कि सब्सिडी और इन्फ्रास्ट्रक्चर का फ़ायदा इस तरह डिज़ाइन हो जो मुंबई-केंद्रित प्रोडक्शन को प्राथमिकता दे। क्या यह सच है? पुष्टि नहीं हो सकी। लेकिन यह बात कई ट्रेड सर्कल्स में खुलकर हो रही है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

सिंगल-विंडो क्लीयरेंस — असली गेमचेंजर या कागज़ी शेर?

सरकार की घोषणा का एक हिस्सा जिस पर सबसे कम चर्चा हो रही है, वह सबसे ज़्यादा असरदार हो सकता है: शूटिंग के लिए सिंगल-विंडो परमिशन सिस्टम। आज की तारीख़ में भारत में किसी बड़े शहर में आउटडोर शूटिंग के लिए छह-सात अलग-अलग विभागों से अनुमति लेनी पड़ती है — पुलिस, नगरपालिका, वन विभाग, पर्यटन, ट्रैफ़िक — और हर जगह अलग 'प्रक्रिया' चलती है। विदेशी प्रोडक्शन हाउसेज़ ने बार-बार शिकायत की है कि भारत में शूटिंग करना ब्यूरोक्रैटिक दुःस्वप्न है — यही वजह है कि हॉलीवुड प्रोडक्शन्स थाईलैंड, जॉर्जिया या दुबई चुनते हैं।

अगर यह सिंगल-विंडो सिस्टम सच में ज़मीन पर लागू हो पाया — जो एक बड़ा 'अगर' है — तो यह न सिर्फ़ भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन्स को आकर्षित कर सकता है। लेकिन भारत में 'सिंगल विंडो' का इतिहास उत्साहजनक नहीं है। कई राज्यों ने ऐसी घोषणाएँ कीं, लेकिन अमल में वही पुरानी अफ़सरशाही क़ायम रही।

बॉलीवुड बनाम साउथ — असली ताक़त का खेल

इस पूरे पैकेज को एक और लेंस से देखना ज़रूरी है। इंडिया हेराल्ड का मानना है कि यह पॉलिसी पैकेज अनजाने में — या शायद जानबूझकर — बॉलीवुड और साउथ इंडस्ट्री के बीच की पावर डायनामिक्स को नए सिरे से परिभाषित करेगा। केंद्रीय स्तर पर बनी पॉलिसी स्वाभाविक रूप से उस इंडस्ट्री को ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाती है जिसकी लॉबी दिल्ली में मज़बूत है — और वह बॉलीवुड है। तेलुगु, तमिल, मलयालम इंडस्ट्रीज़ की ताक़त उनके राज्यों में है, केंद्र की गलियारों में नहीं।

लेकिन यहाँ एक पलटवार भी संभव है। अगर साउथ की राज्य सरकारें — ख़ासकर तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल — अपने स्तर पर और बेहतर सब्सिडी और इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज लाती हैं, तो केंद्र की पॉलिसी बॉलीवुड को बचा नहीं पाएगी। बॉक्स ऑफ़िस में असली लड़ाई कंटेंट की है, और वहाँ साउथ फ़िलहाल आगे है।

आगे क्या होगा — पाँच बातें जिन पर नज़र रखें

पहला, सब्सिडी वितरण का फ़ॉर्मूला जब सामने आएगा, तभी पता चलेगा कि यह प्लान किसका फ़ायदा करेगा। दूसरा, ओटीटी गाइडलाइन्स का ड्राफ्ट — अगर यह CBFC जैसी सख़्त सेंसरशिप की ओर गया, तो इंडस्ट्री में हंगामा तय है। तीसरा, सिंगल-विंडो सिस्टम की ज़मीनी हक़ीक़त — राज्यों की सहमति के बिना यह काग़ज़ पर ही रहेगा। चौथा, साउथ की राज्य सरकारों की जवाबी रणनीति — जो इस केंद्रीय पैकेज को बैलेंस करेगी। और पाँचवाँ, छोटे और इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स पर असर — जो अक्सर ऐसे बड़े पैकेजों में हाशिए पर रह जाते हैं।

[EMBED-SUGGESTION:tweet]

सरकार का यह 'मेगा प्लान' बड़ा ज़रूर है — लेकिन फिल्म इंडस्ट्री की असल सेहत बजट में नहीं, उस बजट के बँटवारे में छिपी है। जब तक सब्सिडी का पैसा कहाँ जा रहा है और ओटीटी पर कैसी नकेल कसी जा रही है, यह साफ़ नहीं होता — तब तक यह ऐलान एक और सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस बनकर रह जाएगा, या फिर भारतीय सिनेमा का चेहरा बदल देगा। असली इम्तिहान ज़मीन पर होगा — और उसमें पास होना बाक़ी है।

आँकड़ों में

  • 2023-24 में भारतीय बॉक्स ऑफ़िस की शीर्ष 10 फिल्मों में 6 दक्षिण भारतीय थीं — Ormax Media डेटा
  • भारत का ओटीटी मार्केट ₹12,000 करोड़ से ऊपर पहुँच चुका है — FICCI-EY मीडिया रिपोर्ट 2024
  • भारत में आउटडोर शूटिंग के लिए 6-7 अलग विभागों से परमिशन ज़रूरी — इंडस्ट्री अनुमान

मुख्य बातें

  • भारत सरकार ने फिल्म इंडस्ट्री के लिए सब्सिडी, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ओटीटी रेगुलेशन सहित व्यापक पहलों की घोषणा की है (News On AIR)।
  • सब्सिडी वितरण का फ़ॉर्मूला तय करेगा कि असली फ़ायदा बॉलीवुड को मिलेगा या साउथ इंडस्ट्री को — 2023-24 की टॉप 10 फिल्मों में 6 साउथ की थीं (Ormax Media)।
  • ओटीटी रेगुलेशन अगर बहुत सख़्त हुआ तो रीजनल कंटेंट — मराठी, बंगाली, मलयालम — को सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा।
  • ₹12,000 करोड़+ का ओटीटी मार्केट (FICCI-EY 2024) पहले ही थिएट्रिकल रेवेन्यू को चुनौती दे रहा है।
  • सिंगल-विंडो शूटिंग परमिशन अगर लागू हो पाई तो अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन्स को भारत आकर्षित कर सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सरकार के फिल्म इंडस्ट्री प्लान में क्या-क्या शामिल है?

News On AIR के अनुसार, इसमें फिल्म प्रोडक्शन सब्सिडी, शूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, सिंगल-विंडो परमिशन सिस्टम और ओटीटी कंटेंट गाइडलाइन्स शामिल हैं।

क्या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर सेंसरशिप लगेगी?

सरकार ने 'कंटेंट गाइडलाइन्स' की बात कही है, लेकिन अभी ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं हुआ। इंडस्ट्री में चिंता है कि अगर यह CBFC जैसा सख़्त हुआ तो क्रिएटिव फ़्रीडम प्रभावित होगी।

इस प्लान से बॉलीवुड को ज़्यादा फ़ायदा होगा या साउथ इंडस्ट्री को?

यह सब्सिडी वितरण के फ़ॉर्मूले पर निर्भर करेगा। केंद्रीय पॉलिसी ऐतिहासिक रूप से बॉलीवुड को ज़्यादा लाभ पहुँचाती रही है, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस में साउथ की बढ़ती ताक़त इस समीकरण को बदल सकती है।

सिंगल-विंडो शूटिंग परमिशन से क्या फ़र्क़ पड़ेगा?

अगर यह ज़मीन पर लागू हो पाया तो विदेशी प्रोडक्शन हाउसेज़ भारत की ओर आकर्षित हो सकते हैं — फ़िलहाल ब्यूरोक्रैटिक जटिलताओं के कारण वे थाईलैंड और दुबई को प्राथमिकता देते हैं।

Find Out More:

Related Articles: