'अन्नदाता का हाथ काटोगे?' — नंदिनी रेड्डी की चेतावनी के पीछे साउथ इंडस्ट्री का कौन-सा फीस बुलबुला छिपा है?

टॉलीवुड की जानी-मानी डायरेक्टर नंदिनी रेड्डी ने उन डायरेक्टर्स को आड़े हाथों लिया है जो एक हिट मिलते ही अपनी फीस कई गुना बढ़ा देते हैं। उनका कहना है कि 'अन्नदाता का हाथ मत काटो' — यानी प्रोड्यूसर को निचोड़ना इंडस्ट्री को खोखला कर रहा है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: तेलुगु फिल्म डायरेक्टर नंदिनी रेड्डी, जो 'Oh! Baby', 'Ala Modalaindi' जैसी फिल्मों के लिए जानी जाती हैं
  • क्या: उन्होंने उन डायरेक्टर्स की सख्त आलोचना की जो एक हिट के बाद अपनी फीस (रेम्युनरेशन) कई गुना बढ़ा देते हैं और प्रोड्यूसर पर आर्थिक बोझ डालते हैं
  • कब: जून 2025 में एक इंटरव्यू/मीडिया इंटरैक्शन के दौरान
  • कहाँ: तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री (टॉलीवुड), हैदराबाद
  • क्यों: क्योंकि बढ़ती फीस के कारण प्रोड्यूसर्स आर्थिक संकट में आ रहे हैं और कई प्रोजेक्ट्स शुरू होने से पहले ही रुक जाते हैं — NTV Telugu के अनुसार
  • कैसे: नंदिनी रेड्डी ने तेलुगु मुहावरे 'अन्नं पेट्टे चेय्यिनी नरुकुतारा' (अन्न देने वाले हाथ को काटोगे?) का इस्तेमाल करते हुए डायरेक्टर्स को सीधे चेतावनी दी — NTV Telugu रिपोर्ट के अनुसार

एक मुहावरा है — 'अन्नं पेट्टे चेय्यिनी नरुकुतारा?' यानी जो हाथ तुम्हें अन्न देता है, उसी को काट डालोगे? यह पंचलाइन किसी फिल्म की नहीं, बल्कि उस डायरेक्टर की है जिसने 'Oh! Baby' और 'Ala Modalaindi' जैसी हिट फिल्में दी हैं — नंदिनी रेड्डी। और उनका निशाना है वो डायरेक्टर्स जो एक ब्लॉकबस्टर मिलते ही अपनी फीस इतनी बढ़ा देते हैं कि प्रोड्यूसर का गला ही घुट जाए।

NTV Telugu की रिपोर्ट के अनुसार, नंदिनी रेड्डी ने बेबाकी से कहा कि कुछ डायरेक्टर्स एक हिट के बाद अपनी रेम्युनरेशन इस कदर बढ़ा देते हैं कि प्रोड्यूसर के लिए प्रोजेक्ट को आगे ले जाना ही मुश्किल हो जाता है। उनकी भाषा में कोई लाग-लपेट नहीं थी — सीधा सवाल: जिस प्रोड्यूसर ने तुम्हें मौक़ा दिया, पैसा लगाया, रिस्क उठाया — उसी की जेब काटोगे?

यह बयान सुनने में भले ही एक डायरेक्टर की नसीहत लगे, लेकिन इसके पीछे साउथ इंडस्ट्री का एक ऐसा ज़ख्म है जो सालों से रिस रहा है।

फीस का बुलबुला — जो फूल रहा है, फटेगा किसके मुँह पर?

ट्रेड हलकों में यह बात अब खुलकर होने लगी है कि तेलुगु इंडस्ट्री में पिछले तीन-चार सालों में डायरेक्टर्स की फीस में अभूतपूर्व उछाल आया है। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक़, कुछ डायरेक्टर्स ने एक बड़ी हिट के बाद अपनी फीस 200-300% तक बढ़ा दी। जहाँ पहले एक मिड-रेंज डायरेक्टर 2-3 करोड़ में साइन करता था, वहाँ अब वही 8-10 करोड़ की माँग रखता है — सिर्फ इसलिए कि उसकी आख़िरी फिल्म ने ₹100 करोड़ कमाए।

बॉलीवुड में यह बीमारी पुरानी है। वहाँ तो एक्टर्स की फीस ने प्रोडक्शन बजट का 40-50% तक खा लिया है। लेकिन साउथ में अब डायरेक्टर्स भी उसी रास्ते पर हैं — और यही बात नंदिनी रेड्डी को चुभ रही है। फ़र्क़ यह है कि बॉलीवुड में यह बहस स्टार सैलरी पर केंद्रित रहती है; टॉलीवुड में अब डायरेक्टर ख़ुद स्टार बन गए हैं और उनकी फीस भी वैसी ही हो गई है।

इनसाइड टॉक

इंडस्ट्री के गलियारों में फुसफुसाहट है कि नंदिनी रेड्डी का यह बयान किसी एक डायरेक्टर के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि एक पूरे ट्रेंड के ख़िलाफ़ है। ट्रेड विश्लेषकों का मानना है कि हाल ही में कम-से-कम तीन-चार बड़े प्रोजेक्ट्स सिर्फ इसलिए अटके हुए हैं क्योंकि डायरेक्टर की माँग और प्रोड्यूसर का बजट मेल नहीं खा रहा। एक वरिष्ठ प्रोड्यूसर की बात अगर मानें तो — 'डायरेक्टर कहता है मेरी पिछली फिल्म ₹200 करोड़ की थी, तो मेरी फीस भी उसी हिसाब से होगी। लेकिन अगली फिल्म फ्लॉप हुई तो क्या वो पैसे लौटाएगा?'

फ़ैन्स के बीच भी यह बहस तेज़ है। सोशल मीडिया पर एक तबका नंदिनी रेड्डी की बात से सहमत है — उनका कहना है कि 'मैडम ने सही पकड़ा, ये लोग प्रोड्यूसर को ATM समझ बैठे हैं।' दूसरी तरफ़ कुछ फ़ैन्स का तर्क है कि 'अगर फिल्म कमा रही है तो डायरेक्टर को उसका हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिए?'

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

प्रोड्यूसर बनाम डायरेक्टर — पर्दे के पीछे का असली तनाव

यह समझना ज़रूरी है कि नंदिनी रेड्डी ख़ुद एक ऐसी डायरेक्टर हैं जिन्होंने कभी 'स्टार पावर' का तमगा नहीं पहना। उनकी फिल्में कॉन्टेंट-ड्रिवन रही हैं — बजट में टाइट, स्क्रिप्ट में मज़बूत। एक महिला डायरेक्टर का यह बयान इसलिए और भी वज़नदार है क्योंकि वो उस 'boys' club' से बाहर खड़ी होकर बोल रही हैं जहाँ बड़े-बड़े मेल डायरेक्टर्स अपनी फीस की बातचीत बंद कमरों में करते हैं।

तेलुगु इंडस्ट्री में प्रोड्यूसर्स की लॉबी पहले से ही परेशान है। ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024-25 में टॉलीवुड में कई मिड-बजट फिल्मों ने ठीक-ठाक कमाई की, लेकिन प्रोड्यूसर्स को मुनाफ़ा नहीं हुआ — क्योंकि डायरेक्टर और एक्टर की कंबाइंड फीस ने बजट का बड़ा हिस्सा खा लिया। यह वही सिंड्रोम है जो बॉलीवुड में 2015-2020 के बीच दिखा, जब कई बैनर बंद हो गए।

बॉलीवुड से क्या सीखना चाहिए — और क्या नहीं

बॉलीवुड में 'फीस बबल' का नतीजा सबने देखा। एक दौर आया जब ₹200-300 करोड़ की फिल्में फ्लॉप होने लगीं और प्रोड्यूसर्स ने स्टार्स की फीस पर ब्रेक लगाना शुरू किया। रोहित शेट्टी, राजकुमार हिरानी जैसे डायरेक्टर्स ने प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल अपनाया — यानी फिक्स्ड फीस कम, लेकिन फिल्म कमाए तो हिस्सा ज़्यादा। यह मॉडल प्रोड्यूसर और डायरेक्टर दोनों के लिए फ़ेयर माना गया।

सवाल यह है कि क्या टॉलीवुड भी इस मॉडल की तरफ़ जाएगा? या फिर वहाँ पहले बुलबुला फटेगा, कुछ बड़ी फ्लॉप्स आएँगी, और तब होश आएगा?

इंडिया हेराल्ड का पॉइंट-ब्लैंक रीड

इंडिया हेराल्ड का मानना है कि नंदिनी रेड्डी का बयान सिर्फ एक राय नहीं — यह एक चेतावनी है जो आने वाले दो-तीन सालों में साउथ इंडस्ट्री की शक्ल बदल सकती है। अगर डायरेक्टर्स ने अपनी फीस को 'मार्केट वैल्यू' के नाम पर बेलगाम बढ़ाना जारी रखा, तो प्रोड्यूसर्स का एक बड़ा तबका मिड-बजट फिल्मों से हाथ खींच लेगा। नतीजा? या तो सिर्फ ₹150-200 करोड़ वाली बिग-बजट फिल्में बनेंगी, या फिर OTT-फर्स्ट छोटी फिल्में — बीच का सेगमेंट ख़त्म। और जब बीच का सेगमेंट मरता है, तो नए टैलेंट का रास्ता भी बंद होता है।

आने वाले महीनों में देखने लायक़ होगा कि क्या तेलुगु प्रोड्यूसर्स काउंसिल कोई फ़ॉर्मल गाइडलाइन लाती है या यह बहस बयानों तक सीमित रहती है। अगर बॉलीवुड का इतिहास कोई संकेत है, तो बदलाव तब आएगा जब दो-तीन बड़ी फ्लॉप्स प्रोड्यूसर्स को घुटनों पर ला देंगी — और तब डायरेक्टर्स को ख़ुद प्रॉफिट-शेयरिंग का रास्ता चुनना होगा।

नंदिनी रेड्डी ने जो कहा, उसे यूँ समझिए — अगर अन्नदाता का हाथ काटते रहे, तो एक दिन थाली ही ख़ाली मिलेगी। सवाल बस इतना है: यह समझ कब आएगी — हिट के नशे में, या फ्लॉप के होश में?

आँकड़ों में

  • इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार कुछ टॉलीवुड डायरेक्टर्स ने एक हिट के बाद अपनी फीस 200-300% तक बढ़ाई
  • ट्रेड रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 2024-25 में कई मिड-बजट तेलुगु फिल्मों में प्रोड्यूसर को मुनाफ़ा नहीं हुआ — डायरेक्टर और एक्टर की कंबाइंड फीस ने बजट का बड़ा हिस्सा खाया
  • बॉलीवुड में कुछ बड़ी फिल्मों में एक्टर फीस प्रोडक्शन बजट के 40-50% तक पहुँची

मुख्य बातें

  • नंदिनी रेड्डी ने उन डायरेक्टर्स को चेताया जो एक हिट के बाद फीस 200-300% बढ़ा देते हैं — प्रोड्यूसर को 'अन्नदाता' बताते हुए उनका शोषण न करने की अपील की
  • साउथ इंडस्ट्री में डायरेक्टर फीस का बुलबुला वही ट्रेंड दिखा रहा है जो बॉलीवुड में 2015-2020 के बीच दिखा था — जब कई बैनर बंद हो गए
  • अगर यह ट्रेंड जारी रहा तो मिड-बजट फिल्मों का सेगमेंट ख़त्म हो सकता है — सिर्फ बिग-बजट और OTT-फर्स्ट फिल्में बचेंगी
  • प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल ही संभावित समाधान है — जैसा बॉलीवुड के कुछ बड़े डायरेक्टर्स ने अपनाया
  • एक महिला डायरेक्टर का यह बयान इसलिए और अहम है क्योंकि वो उस 'boys' club' से बाहर खड़ी होकर बोल रही हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नंदिनी रेड्डी ने डायरेक्टर्स की फीस पर क्या कहा?

NTV Telugu की रिपोर्ट के अनुसार, नंदिनी रेड्डी ने कहा कि जो डायरेक्टर्स एक हिट के बाद अपनी फीस बेतहाशा बढ़ा देते हैं, वे प्रोड्यूसर — यानी 'अन्नदाता' — का हाथ काट रहे हैं। उन्होंने तेलुगु मुहावरे 'अन्नं पेट्टे चेय्यिनी नरुकुतारा' का इस्तेमाल किया।

साउथ इंडस्ट्री में डायरेक्टर्स की फीस कितनी बढ़ी है?

इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक़, कुछ डायरेक्टर्स ने एक बड़ी हिट के बाद अपनी फीस 200-300% तक बढ़ा दी है — जहाँ पहले 2-3 करोड़ में साइन होता था, अब 8-10 करोड़ की माँग रखी जा रही है।

क्या बॉलीवुड में भी ऐसा हुआ है?

हाँ, बॉलीवुड में 2015-2020 के बीच स्टार फीस के बुलबुले ने कई प्रोडक्शन हाउस को बंद करने पर मजबूर किया। बाद में प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल अपनाया गया।

प्रॉफिट-शेयरिंग मॉडल क्या है?

इस मॉडल में डायरेक्टर/एक्टर की फिक्स्ड फीस कम रखी जाती है, लेकिन फिल्म की कमाई में उन्हें तय प्रतिशत हिस्सा मिलता है — इससे प्रोड्यूसर पर शुरुआती बोझ कम होता है और डायरेक्टर को भी फिल्म की सफलता से फ़ायदा मिलता है।

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