ग्रैमी विजेता राकेश चौरसिया को बॉलीवुड में क्या दिखा — जब सब रीमिक्स को कोस रहे हैं, तब शास्त्रीय बांसुरी फ़िल्मों की ओर क्यों दौड़ रही है?

ग्रैमी विजेता बांसुरी वादक राकेश चौरसिया ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि वे बॉलीवुड के लिए बजाना पसंद करते हैं। रीमिक्स-संतृप्त दौर में यह बयान संकेत देता है कि फ़िल्म इंडस्ट्री ऑर्गेनिक मेलोडी की ओर लौट रही है और शास्त्रीय कलाकारों को नए सिरे से बुला रही है।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: ग्रैमी विजेता बांसुरी वादक राकेश चौरसिया — दिवंगत पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के भतीजे और शिष्य।
  • क्या: राकेश चौरसिया ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए बजाना पसंद करते हैं और शास्त्रीय संगीत का सिनेमा से रिश्ता गहरा हो रहा है।
  • कब: 2025-2026 के दौरान, जब रीमिक्स कल्चर पर बहस चरम पर है।
  • कहाँ: भारत — बॉलीवुड फ़िल्म संगीत उद्योग, मुंबई।
  • क्यों: क्योंकि बॉलीवुड अब ऑर्गेनिक, इंस्ट्रूमेंटल साउंड की ओर लौट रहा है और शास्त्रीय कलाकारों को फ़िल्म स्कोर में जगह मिल रही है, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार।
  • कैसे: फ़िल्म कंपोज़र्स बैकग्राउंड स्कोर और थीम ट्रैक्स में लाइव शास्त्रीय वाद्यों — ख़ासकर बांसुरी — का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, जिससे चौरसिया जैसे कलाकारों की डिमांड बढ़ी है।

राकेश चौरसिया बॉलीवुड के लिए बांसुरी बजाना पसंद करते हैं — यह बयान सुनने में साधारण लगता है, लेकिन ज़रा ग़ौर कीजिए कि यह किसने कहा है। एक ग्रैमी अवॉर्ड जीतने वाला कलाकार, जिसके पास दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कॉन्सर्ट हॉल खुले हैं, जिसका नाम हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की रॉयल्टी में गिना जाता है — वह कह रहा है कि उसे बॉलीवुड से 'प्यार' है। उस इंडस्ट्री से, जिसे आधा इंटरनेट रोज़ रीमिक्स और ऑटो-ट्यून के लिए कोसता है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक ताज़ा इंटरव्यू में चौरसिया ने खुलकर कहा — "I love playing for Bollywood." यह सिर्फ़ एक म्यूज़िशियन की पसंद नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत है जो बॉलीवुड के रिकॉर्डिंग स्टूडियोज़ में ख़ामोशी से हो रहा है।

मुख्य बातें एक नज़र में

  • राकेश चौरसिया ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि वे बॉलीवुड के लिए बजाना पसंद करते हैं — यह शास्त्रीय दिग्गजों का सिनेमा से बढ़ते रिश्ते का संकेत है।
  • बॉलीवुड में रीमिक्स कल्चर 'गानों' तक सीमित है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर में शास्त्रीय वाद्यों और लाइव इंस्ट्रूमेंट्स की माँग ख़ामोशी से बढ़ रही है।
  • शास्त्रीय कलाकारों और बॉलीवुड के बीच एक 'legitimacy exchange' काम करता है — बॉलीवुड को क्रेडिबिलिटी मिलती है, कलाकार को करोड़ों की ऑडियंस।
  • OTT प्लेटफ़ॉर्म्स ने शास्त्रीय संगीत के लिए और जगह बनाई है — वेब सीरीज़ स्कोर में ऑर्गेनिक साउंड का ट्रेंड तेज़ हुआ है।

रीमिक्स की थकान और शास्त्रीय की चुपचाप वापसी

पिछले एक दशक में बॉलीवुड ने जो किया, उसे संगीत प्रेमी 'रीमिक्स महामारी' कहते हैं। किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आर.डी. बर्मन — हर दिग्गज की धरोहर को रीमिक्स की चक्की में पीसा गया। फ़ैन्स ने सोशल मीडिया पर तहलका मचाया, ट्रेंड चले — "Stop Ruining Classics"। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ठीक इसी दौर में, बैकग्राउंड स्कोर और थीम म्यूज़िक में एक उलटी धारा बह रही थी। संजय लीला भंसाली की फ़िल्मों से लेकर कई इंडिपेंडेंट प्रोजेक्ट्स तक — लाइव इंस्ट्रूमेंट्स, ख़ासकर बांसुरी और सितार, धीरे-धीरे लौटे।

चौरसिया का यह बयान इसी ट्रेंड की पुष्टि करता है। जब गाने रीमिक्स हो रहे थे, तब बैकग्राउंड स्कोर में असली, ऑर्गेनिक, शास्त्रीय ध्वनियों की माँग बढ़ रही थी। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कई बड़े कंपोज़र्स अब अपने स्कोर में सिंथेसाइज़्ड बांसुरी की जगह लाइव बांसुरी रिकॉर्ड करवाना पसंद कर रहे हैं — और चौरसिया जैसे नामों की बुकिंग कैलेंडर इसका सबूत है।

चौरसिया का विरासत-कनेक्शन: चाचा से चला आया फ़िल्मी प्रेम

यह समझने के लिए कि राकेश चौरसिया बॉलीवुड को 'प्यार' क्यों कहते हैं, ज़रा एक क़दम पीछे जाइए। उनके चाचा — दिवंगत पंडित हरिप्रसाद चौरसिया — ने 'सिलसिला', 'लमहे', 'चाँदनी' जैसी फ़िल्मों में बांसुरी से जो जादू रचा, वह आज भी गूँजता है। शिवकुमार शर्मा के साथ मिलकर शिव-हरि जोड़ी ने साबित किया था कि शास्त्रीय दिग्गज और कमर्शियल सिनेमा एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि एक-दूसरे को ऊँचा उठाने वाले हैं। राकेश चौरसिया ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया — ग्रैमी जीती, दुनियाभर में बजाया, लेकिन बॉलीवुड से नाता नहीं तोड़ा।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, चौरसिया फ़िल्मों के लिए बजाने को 'creative joy' मानते हैं — वह कहते हैं कि सिनेमा उन्हें ऐसे दर्शकों तक पहुँचाता है जो शायद कभी किसी शास्त्रीय कॉन्सर्ट में न जाएँ। यह बात छोटी लगती है, लेकिन इसमें एक बड़ा सच छिपा है — शास्त्रीय संगीत को ज़िंदा रहने के लिए नई ऑडियंस चाहिए, और बॉलीवुड वह दरवाज़ा है जो सबसे चौड़ा खुलता है।

इनसाइड टॉक

इंडस्ट्री की बात यह है कि चौरसिया जैसे शास्त्रीय कलाकारों का बॉलीवुड-प्रेम सिर्फ़ कला का मामला नहीं — इसमें अर्थशास्त्र भी है। शास्त्रीय संगीत का लाइव कॉन्सर्ट मार्केट भारत में सीमित है — टिकट बिक्री, स्पॉन्सरशिप, और सरकारी फ़ेस्टिवल्स मिलाकर भी यह हॉलीवुड या K-Pop जैसी इकोनॉमी नहीं बना पाता। ट्रेड विश्लेषकों का अनुमान है कि एक बड़ी बॉलीवुड फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर प्रोजेक्ट किसी शास्त्रीय कलाकार को कई कॉन्सर्ट्स जितनी कमाई दे सकता है — और साथ में करोड़ों श्रोताओं तक पहुँच का बोनस अलग।

फ़ैन्स मानते हैं कि असली बात यह है — जब एक ग्रैमी विजेता बॉलीवुड के लिए बजाता है, तो वह सिर्फ़ पैसे के लिए नहीं, बल्कि एक 'legitimacy exchange' होता है। बॉलीवुड को शास्त्रीय क्रेडिबिलिटी मिलती है, और शास्त्रीय कलाकार को मास रीच। दोनों को फ़ायदा। यही वजह है कि अब उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, शंकर महादेवन, और चौरसिया जैसे नाम फ़िल्म प्रोजेक्ट्स को ना नहीं कहते।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और ट्रेड अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

रीमिक्स बनाम मेलोडी — असली लड़ाई कहाँ है?

यहाँ एक बारीक बात समझिए जो इस बहस में अक्सर छूट जाती है — दर्शक जब रीमिक्स को कोसते हैं, तो वे दरअसल 'गानों' की बात करते हैं, प्लेलिस्ट वाले ट्रैक्स जो यूट्यूब और स्पॉटिफ़ाई पर चलते हैं। लेकिन चौरसिया जैसे कलाकारों का काम ज़्यादातर बैकग्राउंड स्कोर, थीम म्यूज़िक, और इमोशनल क्यूज़ में होता है — वह संगीत जो आप सीन देखते वक़्त महसूस करते हैं लेकिन शायद अलग से न सुनें। यह बॉलीवुड का वह हिस्सा है जहाँ शास्त्रीय संगीत की ज़रूरत कभी ख़त्म नहीं हुई — बस चर्चा में नहीं आता।

इंडिया हेराल्ड का सीधा आकलन यह है कि बॉलीवुड में दो समानांतर दुनियाएँ चल रही हैं: एक 'गानों की दुनिया' जहाँ रीमिक्स, EDM, और ट्रैप बीट्स का राज है; और दूसरी 'स्कोर की दुनिया' जहाँ ऑर्गेनिक, लाइव इंस्ट्रूमेंट्स और शास्त्रीय कलाकारों की क़द्र बढ़ रही है। चौरसिया का बयान दूसरी दुनिया से आता है — और यही वह दुनिया है जो आने वाले सालों में बॉलीवुड के संगीत को 'बचा' सकती है।

आगे क्या — शास्त्रीय दिग्गजों का बॉलीवुड सीज़न?

अगर ट्रेंड ऐसा ही रहा, तो उम्मीद कीजिए कि आने वाले दो-तीन सालों में और भी शास्त्रीय दिग्गज बॉलीवुड की ओर रुख़ करेंगे — सिर्फ़ बैकग्राउंड स्कोर में नहीं, बल्कि ओरिजिनल गानों में भी। OTT प्लेटफ़ॉर्म्स ने यह राह और चौड़ी की है — वेब सीरीज़ के स्कोर में शास्त्रीय वाद्यों का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है क्योंकि वहाँ क्रिएटिव फ़्रीडम ज़्यादा है।

लेकिन एक सवाल खुला रहता है: क्या यह 'legitimacy exchange' दोनों तरफ़ से ईमानदार रहेगा? या बॉलीवुड शास्त्रीय नामों को सिर्फ़ प्रेस नोट में 'featuring' के लिए इस्तेमाल करेगा और असली क्रिएटिव स्पेस देने से बचेगा? चौरसिया का जवाब फ़िलहाल उत्साहित करने वाला है — लेकिन शास्त्रीय संगीत प्रेमियों को यह देखते रहना होगा कि बांसुरी की आवाज़ पर्दे पर कितनी देर टिकती है, और कितनी देर में अगला EDM ड्रॉप उसे दबा देता है।

एक ग्रैमी जीतने वाले कलाकार ने बॉलीवुड को प्यार का इज़हार किया — अब देखना यह है कि बॉलीवुड उस प्यार का जवाब बांसुरी की सुरीली तान से देता है, या फिर उसी पुराने ढर्रे पर बेस ड्रॉप से।

आँकड़ों में

  • पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और शिवकुमार शर्मा की शिव-हरि जोड़ी ने 'सिलसिला', 'लमहे', 'चाँदनी' सहित दर्जनभर से ज़्यादा फ़िल्मों का संगीत दिया — यह परंपरा राकेश चौरसिया आगे बढ़ा रहे हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)।
  • ट्रेड अनुमान के मुताबिक़ एक बड़ी बॉलीवुड फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर प्रोजेक्ट शास्त्रीय कलाकार को कई लाइव कॉन्सर्ट्स जितनी कमाई दे सकता है।

मुख्य बातें

  • ग्रैमी विजेता राकेश चौरसिया ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि वे बॉलीवुड के लिए बजाना पसंद करते हैं — यह शास्त्रीय दिग्गजों का सिनेमा से बढ़ते रिश्ते का संकेत है।
  • बॉलीवुड में रीमिक्स कल्चर 'गानों' तक सीमित है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर में शास्त्रीय वाद्यों और लाइव इंस्ट्रूमेंट्स की माँग ख़ामोशी से बढ़ रही है।
  • शास्त्रीय कलाकारों और बॉलीवुड के बीच एक 'legitimacy exchange' काम करता है — बॉलीवुड को क्रेडिबिलिटी मिलती है, कलाकार को करोड़ों की ऑडियंस।
  • OTT प्लेटफ़ॉर्म्स ने शास्त्रीय संगीत के लिए और जगह बनाई है — वेब सीरीज़ स्कोर में ऑर्गेनिक साउंड का ट्रेंड तेज़ हुआ है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राकेश चौरसिया कौन हैं?

राकेश चौरसिया ग्रैमी अवॉर्ड विजेता भारतीय बांसुरी वादक हैं। वे दिवंगत पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के भतीजे और शिष्य हैं। उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए भी बांसुरी बजाई है।

राकेश चौरसिया कौन-सी बांसुरी बजाते हैं?

राकेश चौरसिया बांस से बनी भारतीय बांसुरी (बंसुरी) बजाते हैं, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रमुख वाद्य है। उनकी बांसुरी की विशेषता उसकी गहरी, समृद्ध ध्वनि है।

क्या बॉलीवुड में शास्त्रीय संगीत की वापसी हो रही है?

ट्रेड हलकों में चर्चा है कि बॉलीवुड के बैकग्राउंड स्कोर और OTT सीरीज़ में शास्त्रीय वाद्यों — ख़ासकर बांसुरी, सितार — की माँग बढ़ रही है। राकेश चौरसिया का बयान इस ट्रेंड की पुष्टि करता है, हालाँकि गानों में रीमिक्स कल्चर अभी भी हावी है।

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