भारत में 3 लाख से ज़्यादा स्कूल सिंगल-टीचर पर टिके — क्या यही 'विकसित भारत' की नींव है?

Raj Harsh

UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार भारत में तीन लाख से अधिक सरकारी स्कूल सिर्फ़ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। NEP 2020 के लागू होने के छह साल बाद भी शिक्षक भर्ती में भारी कमी बनी हुई है, जिससे ग्रामीण बच्चों की बुनियादी शिक्षा सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रही है।

एक कमरा। एक ब्लैकबोर्ड जिस पर चॉक की धूल जमी है। और एक इंसान — जो एक साथ गणित भी पढ़ा रहा है, हिंदी की वर्णमाला भी रटवा रहा है, मिड-डे मील का हिसाब भी रख रहा है और बीस मिनट पहले एक बच्चे की नाक से बहते ख़ून को रोकने के लिए अपना रूमाल भी दे चुका है। यह किसी फ़िल्म का सीन नहीं — यह 2026 में भारत के तीन लाख से ज़्यादा सरकारी स्कूलों की रोज़मर्रा की कहानी है।

शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ रिपोर्ट के ताज़ा आँकड़े एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो 'विकसित भारत 2047' के नारे को बेरहमी से आईना दिखाती है। देश के क़रीब 3.06 लाख सरकारी स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक तैनात है — वह भी अक्सर संविदा पर, बिना ट्रेनिंग के, बिना किसी सपोर्ट स्टाफ़ के। इनमें से 80 प्रतिशत से ज़्यादा स्कूल उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड जैसे हिंदी बेल्ट राज्यों में हैं — वही राज्य जहाँ से चुनावों में सबसे ज़्यादा सीटें आती हैं।

ASER (Annual Status of Education Report) 2024 की रिपोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के 50 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते। जब एक शिक्षक को पाँच कक्षाएँ, आठ विषय और चालीस-पचास बच्चे एक साथ सँभालने हों, तो यह आँकड़ा चौंकाता नहीं — बल्कि अपेक्षित लगता है।

आँकड़ों की ज़ुबानी

ज़रा इन नंबरों को ग़ौर से देखें। देश में कुल शिक्षक पदों में क़रीब 10 लाख से ज़्यादा रिक्तियाँ हैं — यह संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ख़ुद कह चुकी है। बिहार में अकेले 2.5 लाख से ज़्यादा शिक्षक पद ख़ाली पड़े हैं। उत्तर प्रदेश में 1.5 लाख से ज़्यादा। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड मिलाकर ये आँकड़ा और भयावह हो जाता है। और इन्हीं राज्यों में PTR (Pupil-Teacher Ratio) राष्ट्रीय औसत 26:1 से कहीं ज़्यादा — कई जगह 50:1 और 60:1 तक है।

NEP 2020 ने वादा किया था कि 2030 तक PTR को 25:1 पर लाया जाएगा और हर स्कूल में कम-से-कम दो प्रशिक्षित शिक्षक होंगे। छह साल बीत गए। ज़मीन पर? वही एक शिक्षक, वही टूटी बेंच, वही ब्लैकबोर्ड जिस पर अब डस्टर भी नहीं बचा।

इनसाइड टॉक

शिक्षा के गलियारों में एक बात ज़ोर-शोर से कही जा रही है जो कोई अख़बार सीधे नहीं लिखता — भर्ती रुकने की वजह राजनीतिक है, बजटीय नहीं। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि कई राज्यों में शिक्षक भर्ती को जानबूझकर चुनावी साल तक टाला जाता है ताकि भर्ती का ऐलान चुनावी ट्रंप कार्ड बने। बिहार और यूपी दोनों में पिछले पाँच सालों का पैटर्न देखें — बड़ी भर्तियाँ या तो चुनाव से ठीक पहले हुईं या फिर चुनाव के बाद कोर्ट के आदेश पर। इंडस्ट्री के लोग मानते हैं कि संविदा शिक्षक मॉडल सस्ता पड़ता है, इसलिए स्थायी भर्ती की राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

एक शिक्षक का दिन — जो कोई रिपोर्ट नहीं बताती

मध्य प्रदेश के सतना ज़िले के एक गाँव की कल्पना कीजिए। सुबह आठ बजे रामकिशोर जी स्कूल का ताला खोलते हैं। वे अकेले शिक्षक हैं। पहले वे झाड़ू लगाते हैं — चपरासी नहीं है। फिर कक्षा 1 को 'अ-आ-इ-ई' सिखाते हैं जबकि कक्षा 4 के बच्चे पीछे बैठकर गुणा के सवाल हल कर रहे होते हैं — या नहीं कर रहे होते, क्योंकि ध्यान देने वाला कोई नहीं। ग्यारह बजे मिड-डे मील की रसोई सँभालनी है। दोपहर को ऑनलाइन अटेंडेंस पोर्टल पर डेटा भरना है — क्योंकि डिजिटल इंडिया का फ़ॉर्म भरने में भी एक शिक्षक ही लगता है। शाम तक रामकिशोर जी थक चुके हैं — लेकिन अगले दिन फिर वही सुबह है।

यह कहानी लाखों की है। UNICEF की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में शिक्षकों का बर्नआउट रेट दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों में है, और सिंगल-टीचर स्कूलों में यह और भी गंभीर है। जब शिक्षक थका हुआ हो, तो बच्चे की पढ़ाई का क्या होगा — यह सवाल ही बेमानी हो जाता है।

NEP 2020 — वादे और हक़ीक़त के बीच की खाई

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा ओवरहॉल मानी गई। इसमें फ़ाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी (FLN) मिशन, 5+3+3+4 ढाँचा, और 2030 तक हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक सुनिश्चित करने का वादा किया गया। लेकिन The Hindu की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक देश के सिर्फ़ 14 राज्यों ने NEP के शिक्षक-भर्ती लक्ष्यों पर गंभीरता से काम शुरू किया है — और उनमें भी प्रगति बेहद धीमी है।

जो कोण बाकी मीडिया से छूट गया, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: समस्या सिर्फ़ शिक्षकों की संख्या की नहीं है — समस्या यह है कि शिक्षा को 'ख़र्च' माना जाता है, 'निवेश' नहीं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलती, हर नई नीति वही पुरानी इमारत पर नया रंग होगी। भारत अपनी GDP का सिर्फ़ 2.9 प्रतिशत शिक्षा पर ख़र्च करता है — जबकि NEP ख़ुद 6 प्रतिशत का लक्ष्य रखती है। यह अंतर सिर्फ़ बजटीय नहीं, नैतिक है।

आगे क्या — किस ओर जाएगा यह संकट?

2027 में कई हिंदी बेल्ट राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। अनुभव बताता है कि चुनावी साल में शिक्षक भर्तियों का ऐलान ज़रूर होगा — लेकिन क्या वे भर्तियाँ गुणवत्ता की होंगी या सिर्फ़ संख्या की? सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई राज्यों को शिक्षक भर्ती में देरी पर फटकार लगाई है — Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार अकेले 2024-25 में तीन राज्यों को कोर्ट के निर्देश पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।

देखने वाली बात यह होगी कि केंद्र सरकार 2026-27 के बजट में शिक्षा पर ख़र्च बढ़ाती है या नहीं। अगर GDP का 3 प्रतिशत का आँकड़ा भी पार नहीं हुआ, तो NEP 2020 के 2030 के लक्ष्य सिर्फ़ काग़ज़ पर रह जाएँगे — और वह अकेला शिक्षक उसी टूटी बेंच पर बैठकर पाँच कक्षाएँ पढ़ाता रहेगा।

सवाल यह नहीं है कि भारत के पास पैसा नहीं है। सवाल यह है कि प्राथमिकता में शिक्षा कहाँ है — राजमार्गों के बाद, स्टेडियमों के बाद, या बच्चों से पहले?

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आरोप और दावे संबंधित स्रोतों के हवाले से हैं और जब तक कोई न्यायालय निर्णय न दे, अप्रमाणित रहते हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • UDISE+ डेटा के अनुसार भारत में 3.06 लाख से ज़्यादा सरकारी स्कूल सिर्फ़ एक शिक्षक पर निर्भर हैं — 80% से ज़्यादा हिंदी बेल्ट राज्यों में।
  • देश में 10 लाख से ज़्यादा शिक्षक पद रिक्त हैं, लेकिन भर्ती को राजनीतिक ट्रंप कार्ड की तरह चुनावी साल तक टाला जाता है।
  • भारत GDP का सिर्फ़ 2.9% शिक्षा पर ख़र्च करता है जबकि NEP 2020 का लक्ष्य 6% है — यह अंतर नीतिगत नहीं, नैतिक संकट है।
  • ASER 2024 के अनुसार कक्षा 5 के 50% से ज़्यादा ग्रामीण बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते — सिंगल-टीचर मॉडल इसकी सबसे बड़ी वजहों में है।
  • 2027 के विधानसभा चुनाव शिक्षक भर्ती की अगली लहर ला सकते हैं — लेकिन सवाल गुणवत्ता बनाम संख्या का रहेगा।

आँकड़ों में

  • भारत में 3.06 लाख से अधिक सरकारी स्कूल सिंगल-टीचर पर चल रहे हैं — UDISE+ रिपोर्ट
  • देश में 10 लाख से ज़्यादा शिक्षक पद रिक्त — संसदीय स्थायी समिति रिपोर्ट
  • भारत शिक्षा पर GDP का सिर्फ़ 2.9% ख़र्च करता है, NEP लक्ष्य 6% — शिक्षा मंत्रालय डेटा
  • ASER 2024: ग्रामीण कक्षा 5 के 50%+ बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के लाखों सरकारी प्राथमिक और उच्च-प्राथमिक स्कूलों के बच्चे और अकेले शिक्षक
  • क्या: UDISE+ डेटा के मुताबिक़ तीन लाख से अधिक स्कूल सिंगल-टीचर मॉडल पर चल रहे हैं, जहाँ एक शिक्षक कक्षा 1 से 5 तक पढ़ा रहा है
  • कब: जुलाई 2026 — NEP 2020 के लागू होने के छह वर्ष बाद
  • कहाँ: मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाक़ों में
  • क्यों: शिक्षक भर्ती में राजनीतिक देरी, बजट की कमी, शहरी-ग्रामीण असमानता और संविदा शिक्षक नीतियों की विफलता
  • कैसे: राज्य सरकारें रिक्त पदों को न भरकर और तबादला-नीति में पारदर्शिता न रखकर ग्रामीण स्कूलों को एक शिक्षक पर छोड़ देती हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में कितने स्कूल सिंगल टीचर पर चल रहे हैं?

UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार भारत में 3.06 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक तैनात है, जिनमें बहुसंख्यक हिंदी बेल्ट के ग्रामीण इलाक़ों में हैं।

NEP 2020 शिक्षक भर्ती पर क्या कहती है?

NEP 2020 में 2030 तक PTR (छात्र-शिक्षक अनुपात) 25:1 करने और हर स्कूल में न्यूनतम दो प्रशिक्षित शिक्षक रखने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन छह साल बाद भी अधिकांश राज्यों में प्रगति बेहद धीमी है।

भारत शिक्षा पर GDP का कितना प्रतिशत ख़र्च करता है?

भारत वर्तमान में GDP का लगभग 2.9% शिक्षा पर ख़र्च करता है, जबकि NEP 2020 का लक्ष्य 6% है — यह अंतर दुनिया के बड़े लोकतंत्रों में सबसे ज़्यादा है।

सिंगल टीचर स्कूलों का बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है?

ASER 2024 की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के 50% से ज़्यादा बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते। सिंगल-टीचर मॉडल में व्यक्तिगत ध्यान न मिलने से यह संकट और गहरा होता है।

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