NEP 2020 के छठे साल में 10 लाख शिक्षक पद खाली — क्या मदरबोर्ड ही गायब है तो चिप कहाँ लगेगी?

Raj Harsh

NEP 2020 को लागू हुए छह साल हो रहे हैं, लेकिन UDISE+ डेटा के मुताबिक देश के सरकारी स्कूलों में करीब 10 लाख शिक्षक पद अभी भी रिक्त हैं। बिना शिक्षक के बहुभाषी शिक्षा, कोडिंग और फ़ाउंडेशनल लिटरेसी जैसे NEP के वादे ज़मीन पर नहीं उतर सकते।

एक कक्षा की कल्पना कीजिए जहाँ ब्लैकबोर्ड पर NEP 2020 का रंगीन पोस्टर चिपका है — बहुभाषी शिक्षा, कोडिंग, क्रिटिकल थिंकिंग — लेकिन कक्षा में शिक्षक नहीं है। बिहार के एक ज़िले में पिछले हफ़्ते एक अकेले शिक्षक ने पाँच कक्षाओं को एक साथ बैठाकर पढ़ाया, क्योंकि बाकी चार पद तीन साल से खाली हैं। यह कोई अपवाद नहीं — यह भारत की शिक्षा व्यवस्था का रोज़मर्रा का सच है।

UDISE+ (Unified District Information System for Education Plus) के ताज़ा डेटा के मुताबिक देश के सरकारी और सरकारी-सहायता प्राप्त स्कूलों में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त हैं। इसे दूसरे तरीके से समझें: हर दसवें स्कूल में कम-से-कम एक ऐसी कक्षा है जहाँ पढ़ाने वाला कोई नहीं। ASER (Annual Status of Education Report) 2024 ने बताया था कि ग्रामीण भारत में कक्षा 3 के 25% से ज़्यादा बच्चे अपनी कक्षा-स्तर की किताब नहीं पढ़ सकते। ये दोनों आँकड़े अलग-अलग नहीं हैं — ये एक ही कहानी के दो पन्ने हैं।

NEP 2020 ने फ़ाउंडेशनल लिटरेसी और न्यूमरेसी (FLN) मिशन के तहत 2026-27 तक हर बच्चे को बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणित में दक्ष बनाने का लक्ष्य रखा था। अब वह डेडलाइन एक साल से भी कम दूर है। शिक्षा मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि शिक्षक रिक्तियाँ इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा हैं।

समस्या की जड़: केंद्र का सपना, राज्य की ज़िम्मेदारी

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है — नीति केंद्र बनाता है, अमल राज्य करते हैं। NEP 2020 एक विज़न डॉक्यूमेंट है, कोई कानून नहीं। इसका मतलब यह है कि शिक्षक भर्ती, प्रशिक्षण और तैनाती पूरी तरह राज्य सरकारों पर निर्भर है। और यहीं पूरा तंत्र रुक जाता है। बिहार में शिक्षक भर्ती पर कोर्ट स्टे वर्षों से चला आ रहा है। उत्तर प्रदेश में 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और साल दर साल अटका रहा। मध्य प्रदेश में CAG ऑडिट ने पाया कि स्वीकृत पदों का एक बड़ा हिस्सा बजट आवंटन के अभाव में भरा ही नहीं गया।

संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार कई राज्यों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में औसतन दो से तीन साल की देरी होती है। जब तक भर्ती पूरी होती है, तब तक रिटायरमेंट से नए पद खाली हो जाते हैं। यह एक ऐसा चक्र है जो ख़ुद को खिलाता है।

इनसाइड टॉक

शिक्षा जगत के हलकों में एक कड़वी चर्चा ज़ोरों पर है: NEP 2020 को लेकर केंद्र सरकार का ज़ोर प्रेज़ेंटेशन और पॉलिसी फ़्रेमवर्क पर ज़्यादा है, क्लासरूम डिलीवरी पर कम। ट्रेड में बात यह है कि NIPUN Bharat (नेशनल इनिशिएटिव फ़ॉर प्रोफ़िशिएंसी इन रीडिंग विद अंडरस्टैंडिंग एंड न्यूमरेसी) के लिए फंड तो आवंटित हुआ, लेकिन ज़िला स्तर पर उसका बड़ा हिस्सा ट्रेनिंग वर्कशॉप और स्टेशनरी में ख़र्च हो गया — कक्षा तक पहुँचा ही नहीं। एक वरिष्ठ शिक्षा विश्लेषक की टिप्पणी घूम रही है: "हम शिक्षकों को AI सिखाने की बात कर रहे हैं, जबकि आधे स्कूलों में चॉक ख़रीदने का बजट नहीं है।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

आँकड़ों की असली कहानी

ASER 2024 का एक और आँकड़ा रुकने पर मजबूर करता है: कक्षा 5 के केवल 50.7% बच्चे कक्षा 2 के स्तर की हिंदी पाठ्य-सामग्री पढ़ पाते हैं। यानी आधे बच्चे तीन कक्षा पीछे हैं। इसे NEP की बहुभाषी शिक्षा, कोडिंग-से-कक्षा-6, और इंटीग्रेटेड करिकुलम जैसी महत्वाकांक्षाओं के सामने रखिए — बुनियाद ही नहीं है तो इमारत कैसी?

शिक्षा मंत्रालय के बजट दस्तावेज़ों के अनुसार 2025-26 में शिक्षा पर कुल GDP का लगभग 2.9% ख़र्च हुआ, जबकि NEP 2020 ख़ुद 6% का लक्ष्य रखती है। कोठारी आयोग ने 1966 में यही 6% की सिफ़ारिश की थी — छह दशक बाद भी वह आँकड़ा आधा भी पूरा नहीं हुआ।

इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण: असली समस्या नीति नहीं, नीयत और ढाँचा है

जो कोण बाकी मीडिया से छूट रहा है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: NEP 2020 एक दस्तावेज़ के रूप में शायद भारत की सबसे प्रगतिशील शिक्षा नीति है। समस्या नीति में नहीं — उस ढाँचे में है जो नीति को कक्षा तक ले जाए। जब तक शिक्षक भर्ती को मिशन मोड पर नहीं लाया जाता, जब तक राज्यों को समयबद्ध भर्ती के लिए बाध्य करने वाला कोई केंद्रीय तंत्र नहीं बनता, और जब तक शिक्षा बजट GDP के 4% तक भी नहीं पहुँचता — तब तक NEP एक शानदार ब्लूप्रिंट बना रहेगा जिसकी इमारत कभी नहीं बनेगी।

आने वाले महीनों में देखने लायक़ यह होगा कि क्या केंद्र 2026-27 की FLN डेडलाइन को आगे बढ़ाता है या चुपचाप उसे भुला दिया जाता है। अगर डेडलाइन बढ़ी, तो यह एक और नीतिगत वादे की विश्वसनीयता पर सवाल होगा। अगर नहीं बढ़ी और लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, तो सवाल और भी तीखा होगा: ज़िम्मेदार कौन?

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बिहार के उस अकेले शिक्षक से पूछिए — वह हर सुबह पाँच कक्षाओं को एक साथ सम्हालता है, न कोई शिकायत करता है, न कोई सुनता है। उसके कंधों पर NEP 2020 का पूरा वज़न है, लेकिन उसका नाम किसी पॉलिसी डॉक्यूमेंट में नहीं है। असली सवाल यह नहीं कि नई शिक्षा नीति अच्छी है या बुरी — असली सवाल यह है कि जिस देश में शिक्षक ही नहीं है, वहाँ शिक्षा नीति किसके लिए है?

आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत किए गए हैं; जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, ये अप्रमाणित हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • UDISE+ के अनुसार देश में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त हैं — हर दसवें स्कूल में कम-से-कम एक कक्षा बिना शिक्षक है।
  • NEP 2020 का फ़ाउंडेशनल लिटरेसी लक्ष्य 2026-27 है, लेकिन ASER 2024 के अनुसार कक्षा 5 के आधे बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाते।
  • शिक्षा पर ख़र्च GDP का 2.9% है जबकि NEP ख़ुद 6% की बात करती है — कोठारी आयोग की 1966 की सिफ़ारिश भी पूरी नहीं हुई।
  • शिक्षक भर्ती राज्यों की ज़िम्मेदारी है लेकिन कोर्ट स्टे, बजट कटौती और ब्यूरोक्रेटिक देरी से पद वर्षों खाली रहते हैं।

आँकड़ों में

  • UDISE+ डेटा: देश में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त
  • ASER 2024: कक्षा 5 के केवल 50.7% बच्चे कक्षा 2 स्तर की हिंदी पढ़ सकते हैं
  • शिक्षा बजट GDP का लगभग 2.9% — NEP का लक्ष्य 6%
  • कोठारी आयोग 1966 में 6% GDP की सिफ़ारिश — छह दशक बाद भी अधूरी

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: देश के सरकारी स्कूलों के करोड़ों बच्चे और शिक्षा मंत्रालय — UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार
  • क्या: NEP 2020 के छठे साल में भी लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त हैं और फ़ाउंडेशनल लिटरेसी टारगेट 2026-27 ख़तरे में है — ASER 2024 रिपोर्ट के अनुसार
  • कब: जुलाई 2026, NEP 2020 की छठी वर्षगाँठ के अवसर पर
  • कहाँ: पूरे भारत में, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड के ग्रामीण ज़िलों में — UDISE+ डेटा के अनुसार
  • क्यों: राज्य सरकारों द्वारा भर्ती प्रक्रिया में देरी, बजट की कमी और ट्रेंड शिक्षकों की अनुपलब्धता — शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति रिपोर्ट के अनुसार
  • कैसे: केंद्र नीति बनाता है लेकिन भर्ती राज्यों की ज़िम्मेदारी है; राज्य बजट, न्यायालयीन स्टे और ब्यूरोक्रेटिक देरी से पद वर्षों से खाली पड़े रहते हैं — संसदीय समिति और CAG ऑडिट रिपोर्ट्स के अनुसार

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

NEP 2020 को लागू हुए कितने साल हो गए हैं?

NEP 2020 जुलाई 2020 में स्वीकृत हुई थी, जुलाई 2026 में इसे छह साल पूरे हो रहे हैं। इसके कई प्रावधान अभी भी पूरी तरह लागू नहीं हुए हैं।

भारत में कितने शिक्षक पद खाली हैं?

UDISE+ के ताज़ा डेटा के अनुसार सरकारी और सरकारी-सहायता प्राप्त स्कूलों में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त हैं, सबसे ज़्यादा बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड में।

NEP 2020 का फ़ाउंडेशनल लिटरेसी लक्ष्य क्या है?

NIPUN Bharat मिशन के तहत 2026-27 तक हर बच्चे को कक्षा 3 तक बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणित में दक्ष बनाने का लक्ष्य है, लेकिन शिक्षक कमी और बजट की कमी से यह लक्ष्य ख़तरे में है।

भारत शिक्षा पर GDP का कितना प्रतिशत ख़र्च करता है?

2025-26 के बजट अनुमानों के अनुसार लगभग 2.9%, जबकि NEP 2020 ख़ुद 6% का लक्ष्य रखती है और कोठारी आयोग ने 1966 में भी यही सिफ़ारिश की थी।

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