भारत में 3 लाख स्कूलों में सिर्फ़ एक टीचर — क्या ये बच्चे पढ़ रहे हैं या बस हाज़िरी भर रहे हैं?

Singh Anchala

भारत के क़रीब तीन लाख प्राइमरी स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक है जो तमाम कक्षाओं को अकेले सँभालता है। UDISE+ डेटा और ASER रिपोर्ट दोनों बताते हैं कि ऐसे स्कूलों में बच्चों की बुनियादी पढ़ने-लिखने की क्षमता गम्भीर रूप से प्रभावित होती है।

एक कमरा। एक ब्लैकबोर्ड। पहली से पाँचवीं तक की पाँच कक्षाएँ। और उन सबको पढ़ाने वाला सिर्फ़ एक इंसान — जो शिक्षक भी है, प्रिंसिपल भी, चपरासी भी, और MDM का हिसाब-किताब रखने वाला क्लर्क भी। यह किसी एक गाँव की कहानी नहीं — यह भारत के क़रीब तीन लाख सरकारी प्राइमरी स्कूलों का रोज़ाना है।

शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ डेटा (2024-25) के अनुसार देश में लगभग 2.97 लाख ऐसे स्कूल हैं जहाँ सिर्फ़ एक शिक्षक तैनात है। इनमें से अधिकांश हिंदी पट्टी के ग्रामीण इलाक़ों में हैं — उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़। ज़रा सोचिए: जब एक टीचर दूसरी क्लास को गिनती सिखा रहा होता है, तो चौथी क्लास के बच्चे क्या कर रहे होते हैं? ज़्यादातर — बस बैठे होते हैं, या खिड़की से बाहर झाँक रहे होते हैं।

ASER 2023 रिपोर्ट (प्रथम एजुकेशन फ़ाउंडेशन) का एक आँकड़ा रीढ़ में सिहरन पैदा करता है: ग्रामीण भारत में कक्षा पाँच के 42% बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते। जब आप इस आँकड़े को एकल-शिक्षक स्कूलों के नक़्शे पर रखते हैं, तो दोनों लगभग एक-दूसरे पर चढ़ जाते हैं। संयोग? शायद नहीं।

एक टीचर, छह भूमिकाएँ — और सबसे पीछे छूटती है पढ़ाई

राजस्थान के बाड़मेर ज़िले के एक प्राइमरी स्कूल में तैनात शिक्षक (नाम बदला हुआ) ने एक मीडिया रिपोर्ट में बताया कि वे सुबह आठ बजे से दोपहर दो बजे तक स्कूल में रहते हैं, लेकिन असल में पढ़ाई के लिए बमुश्किल दो घंटे मिलते हैं। बाक़ी समय — मिड-डे मील की व्यवस्था, उपस्थिति रजिस्टर भरना, विभागीय सर्वे, चुनावी ड्यूटी, और कभी-कभी पल्स पोलियो अभियान। यही कहानी झारखंड के गुमला से लेकर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर तक दोहराई जाती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने स्पष्ट कहा था कि शिक्षक-छात्र अनुपात 1:30 से बेहतर होना चाहिए और किसी स्कूल में एक से कम शिक्षक की स्थिति बिलकुल नहीं होनी चाहिए। लेकिन छह साल बाद भी, शिक्षा मंत्रालय के अपने आँकड़े बताते हैं कि लगभग 10 लाख शिक्षक पद ख़ाली पड़े हैं — और भर्ती प्रक्रिया अदालती मामलों, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती में फँसी है।

इनसाइड टॉक

शिक्षा विभाग के हलकों में एक बात ख़ामोशी से स्वीकार की जाती है: दूरदराज़ पोस्टिंग से बचने के लिए शिक्षक तबादले में "सेटिंग" करते हैं, और जो नहीं कर पाते वे अकेले रह जाते हैं। ट्रेड में चर्चा यह भी है कि कई राज्यों में शिक्षक भर्ती परीक्षा की तैयारी कराने वाला कोचिंग उद्योग इतना बड़ा हो गया है कि भर्ती में देरी कुछ लोगों के लिए "बिज़नेस मॉडल" बन चुकी है। एक सेवानिवृत्त शिक्षा सचिव ने हाल ही में एक सेमिनार में कहा कि "समस्या पैसे की नहीं, प्राथमिकता की है — सरकारें सड़क बनाने में जितनी तेज़ी दिखाती हैं, शिक्षक भर्ती में उसका दसवाँ हिस्सा भी नहीं।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषकों के अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

असली सवाल — बच्चे सीख क्या रहे हैं?

UNICEF इंडिया की 2024 रिपोर्ट के अनुसार भारत में 6-14 आयु वर्ग के लगभग 97% बच्चे स्कूल में नामांकित हैं — यह संख्या गर्व करने लायक़ है। लेकिन नामांकन और सीखना दो बिलकुल अलग चीज़ें हैं। जब एक शिक्षक पाँच कक्षाओं को "मल्टी-ग्रेड टीचिंग" के नाम पर एक साथ बिठाता है, तो हक़ीक़त यह होती है कि सबसे होशियार बच्चा बोर होता है और सबसे कमज़ोर बच्चा और पिछड़ता जाता है।

विश्व बैंक ने इसे "learning poverty" (सीखने की ग़रीबी) कहा है — जहाँ बच्चा स्कूल तो जाता है, पर दस साल की उम्र में एक सरल कहानी नहीं पढ़ पाता। भारत में यह दर 55% से ऊपर है। जो कोण बाक़ी मीडिया से छूट गया, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है: यह सिर्फ़ शिक्षक की कमी का मसला नहीं है — यह एक पूरी पीढ़ी को "हाज़िरी-शिक्षित" बनाने का मसला है, जहाँ काग़ज़ पर सब पढ़े-लिखे हैं, असल में कोई कुछ नहीं सीखा।

आगे क्या — राज्यों की चाल और केंद्र की चुप्पी

कुछ राज्यों ने हाल में पहल की है। राजस्थान सरकार ने 2025 में 26,000 शिक्षक भर्ती की घोषणा की, मध्य प्रदेश ने कॉन्ट्रैक्ट शिक्षकों (गेस्ट टीचर्स) को नियमित करने का वादा दोहराया। लेकिन विश्लेषकों का अनुमान है कि मौजूदा रफ़्तार से सभी रिक्तियाँ भरने में एक दशक और लग सकता है। NEP 2020 के तहत स्कूलों को "क्लस्टर" में जोड़ने की योजना काग़ज़ पर है, पर ज़मीन पर अभी तक पायलट चरण से आगे नहीं बढ़ी।

केंद्र सरकार समग्र शिक्षा अभियान के तहत फ़ंडिंग देती है, लेकिन शिक्षक भर्ती राज्य का विषय है — और यही वह दरार है जिसमें लाखों बच्चों का भविष्य गिर रहा है। संसद में सवाल उठते हैं, जवाब आँकड़ों में दिए जाते हैं, और आँकड़ों के पीछे वह बच्चा छिपा रहता है जो पाँचवीं पास करके भी अपना नाम ठीक से नहीं लिख पाता।

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अगली बार जब कोई नेता मंच से कहे कि "शिक्षा हमारी प्राथमिकता है", तो बस एक सवाल पूछिएगा — अगर प्राथमिकता है, तो तीन लाख स्कूलों में दूसरा टीचर कब आएगा? क्योंकि जब तक वह दूसरा टीचर नहीं आता, उन स्कूलों में हाज़िरी लग रही है — पढ़ाई नहीं।

इस रिपोर्ट में उद्धृत आरोप और दावे नामित स्रोतों के हवाले से हैं; न्यायालय द्वारा निर्णय होने तक ये अप्रमाणित हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • UDISE+ 2024-25 के अनुसार भारत में लगभग 2.97 लाख स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक तैनात है — अधिकतर हिंदी पट्टी के ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • ASER 2023: कक्षा पाँच के 42% ग्रामीण बच्चे कक्षा दो का पाठ ठीक से नहीं पढ़ सकते — एकल-शिक्षक स्कूलों के मानचित्र से यह सीधे मेल खाता है।
  • NEP 2020 का 1:30 शिक्षक-छात्र अनुपात लक्ष्य छह साल बाद भी ज़मीन पर पूरा नहीं हुआ; लगभग 10 लाख शिक्षक पद ख़ाली हैं।
  • विश्व बैंक के अनुसार भारत में 55% से अधिक बच्चे 'learning poverty' के शिकार हैं — स्कूल जाते हैं पर 10 साल की उम्र में सरल पाठ नहीं पढ़ पाते।
  • मौजूदा भर्ती रफ़्तार से सभी रिक्तियाँ भरने में एक दशक और लग सकता है — यह बच्चों की एक पूरी पीढ़ी की क़ीमत पर होगा।

आँकड़ों में

  • UDISE+ 2024-25: भारत में लगभग 2.97 लाख एकल-शिक्षक प्राइमरी स्कूल
  • ASER 2023: कक्षा 5 के 42% ग्रामीण बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते
  • शिक्षा मंत्रालय: देश भर में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त
  • UNICEF India 2024: 6-14 आयु वर्ग में 97% नामांकन दर, पर सीखने के परिणाम गम्भीर रूप से कमज़ोर
  • विश्व बैंक: भारत में learning poverty दर 55% से ऊपर

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: भारत के लगभग तीन लाख प्राइमरी स्कूलों के अकेले शिक्षक और उनके लाखों छात्र।
  • क्या: एक शिक्षक पर पाँच-छह कक्षाओं का पूरा बोझ, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता गम्भीर रूप से गिर रही है।
  • कब: 2024-25 UDISE+ और 2023 ASER रिपोर्ट के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार यह संकट जारी है, जुलाई 2026 तक स्थिति में कोई बड़ा सुधार दर्ज नहीं।
  • कहाँ: मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के ग्रामीण इलाक़ों में।
  • क्यों: शिक्षकों की भर्ती में दशकों की देरी, तबादला नीति की विसंगतियाँ और दूरदराज़ पोस्टिंग से शिक्षकों का पलायन — ये प्रमुख कारण हैं।
  • कैसे: रिक्तियाँ वर्षों से नहीं भरी जातीं, जो शिक्षक हैं वे प्रशासनिक कामों में उलझा दिए जाते हैं, और NEP 2020 का 1:30 अनुपात लक्ष्य ज़मीन पर लागू नहीं हो पा रहा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में कितने स्कूलों में सिर्फ़ एक शिक्षक है?

UDISE+ 2024-25 डेटा के अनुसार भारत में लगभग 2.97 लाख प्राइमरी स्कूलों में केवल एक शिक्षक तैनात है। ये मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

एकल शिक्षक स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है?

ASER 2023 रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के 42% बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते। एक शिक्षक पर पाँच कक्षाओं का बोझ होने से न व्यक्तिगत ध्यान मिलता है, न गुणवत्तापूर्ण शिक्षण। विश्व बैंक इसे learning poverty कहता है।

NEP 2020 में शिक्षक-छात्र अनुपात का क्या लक्ष्य है?

NEP 2020 ने शिक्षक-छात्र अनुपात 1:30 या उससे बेहतर रखने का लक्ष्य रखा था और कहा था कि कोई भी स्कूल एकल-शिक्षक स्थिति में नहीं होना चाहिए। छह साल बाद भी यह लक्ष्य बड़े पैमाने पर अधूरा है।

भारत में कितने शिक्षक पद ख़ाली हैं?

शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार देश भर में लगभग 10 लाख शिक्षक पद रिक्त हैं। भर्ती प्रक्रिया अदालती मामलों, ब्यूरोक्रेसी और राज्य स्तर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी में फँसी है।

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