NEP 2020 के पाँच साल — स्कूलों में बदला क्या और कागज़ पर क्या रह गया?

Singh Anchala

NEP 2020 को पाँच साल पूरे हो रहे हैं। 5+3+3+4 ढाँचा, मातृभाषा में शिक्षा और मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट जैसे बड़े वादे हुए थे। ज़मीन पर कुछ राज्यों ने बदलाव शुरू किए, मगर शिक्षक प्रशिक्षण, फंडिंग और एकसमान लागू करने में गंभीर कमियाँ बनी हुई हैं।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय, राज्य सरकारें, NCERT, स्कूल शिक्षक और छात्र
  • क्या: NEP 2020 के पाँच साल पूरे होने पर इसके ज़मीनी असर का मूल्यांकन — क्या बदला, क्या अटका रहा
  • कब: जुलाई 2025 में NEP की घोषणा के पाँच साल पूरे; लागू करने की समयसीमा 2025-2030 के बीच थी
  • कहाँ: पूरे भारत में, विशेषकर हिंदी बेल्ट के राज्यों — उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार — में असर
  • क्यों: भारत की शिक्षा व्यवस्था में 34 साल पुरानी पॉलिसी (1986) को बदलने और 21वीं सदी के हिसाब से ढालने के लिए
  • कैसे: नई पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (NCF 2023), 5+3+3+4 संरचना, मातृभाषा में शिक्षा, मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट, और GDP के 6% शिक्षा पर खर्च के वादे के ज़रिए

एक सरकारी प्राइमरी स्कूल — कहीं मध्य प्रदेश के एक क़स्बे में। दीवार पर चमकीले रंगों में लिखा है: "खेल-खेल में सीखो।" अंदर जाइए तो तीसरी कक्षा के बच्चे वही पुरानी किताब रटकर सुना रहे हैं जो उनके बड़े भाई-बहनों ने पढ़ी थी। टीचर से पूछिए तो कहते हैं — "नई शिक्षा नीति? सुनी है, पर ट्रेनिंग नहीं मिली।" यह एक स्कूल की कहानी नहीं, लाखों स्कूलों की हक़ीक़त है।

जुलाई 2020 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की घोषणा हुई, तो इसे 34 साल बाद आई क्रांतिकारी नीति कहा गया। पाँच साल बीत चुके हैं। सवाल सीधा है: वादे कितने पूरे हुए, और कितने अभी भी फाइलों में दबे हैं?

कागज़ पर जो बदला — वह दिखता ज़रूर है

कुछ बदलाव निश्चित रूप से हुए हैं और उन्हें नकारना ग़लत होगा। NCERT ने 2023 में नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (NCF) जारी किया, जो फाउंडेशनल स्टेज (3-8 साल) पर केंद्रित है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, 25 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने NEP को "सैद्धांतिक रूप से" स्वीकार किया है। प्री-प्राइमरी शिक्षा — जिसे NEP में "फाउंडेशनल स्टेज" कहा गया — को आँगनवाड़ी से जोड़ने की कोशिश कई राज्यों में शुरू हुई।

उच्च शिक्षा में भी हलचल दिखी। UGC ने मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम के दिशानिर्देश जारी किए। एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (ABC) लॉन्च हुआ, जिसमें शिक्षा मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ करोड़ों छात्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया। चार-वर्षीय अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शुरू हुए।

ज़मीन पर जहाँ पहिया अटका हुआ है

मगर असली तस्वीर इन सरकारी घोषणाओं से कहीं ज़्यादा जटिल है। और यहीं NEP की सबसे बड़ी चुनौतियाँ सामने आती हैं।

फंडिंग का सवाल सबसे बड़ा है। NEP 2020 ने GDP का 6% शिक्षा पर ख़र्च करने का लक्ष्य रखा था। वास्तविकता? भारत अभी भी GDP का लगभग 2.9-3.1% ही शिक्षा पर ख़र्च करता है — यह आँकड़ा Economic Survey और बजट दस्तावेज़ों में बार-बार दोहराया गया है। जब तक यह अंतर नहीं भरता, ज़मीनी बदलाव की उम्मीद करना ऐसा है जैसे बिना ईंधन के रॉकेट उड़ाना हो।

शिक्षक प्रशिक्षण — सबसे कमज़ोर कड़ी। NEP ने शिक्षकों के लिए चार-वर्षीय इंटीग्रेटेड B.Ed. की बात कही थी, जो 2030 तक अनिवार्य होना था। ASER (Annual Status of Education Report) जैसी स्वतंत्र रिपोर्टें बार-बार बताती हैं कि ग्रामीण भारत में बुनियादी पढ़ने-लिखने और गणित के स्तर में गिरावट चिंताजनक बनी हुई है। नई पद्धति से पढ़ाने के लिए शिक्षकों को जिस तरह के निरंतर प्रशिक्षण की ज़रूरत है, वह अधिकांश राज्यों में शुरू ही नहीं हुआ। एक शिक्षक जो रट्टा-आधारित व्यवस्था में पला-बढ़ा हो, उससे अचानक "एक्सपेरिएंशियल लर्निंग" करवाने की अपेक्षा करना — बिना ट्रेनिंग, बिना संसाधन — बेमानी है।

मातृभाषा में शिक्षा — इरादा अच्छा, अमल मुश्किल। NEP की सबसे सराही गई बात थी कि कम-से-कम पाँचवीं कक्षा तक, और जहाँ तक संभव हो आठवीं तक, मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई हो। मगर बहुभाषी भारत में "मातृभाषा" तय करना ही एक राजनीतिक बारूदी सुरंग है। हिंदी बेल्ट में भोजपुरी, मैथिली, छत्तीसगढ़ी बोलने वाले परिवार अपने बच्चों को अंग्रेज़ी-माध्यम में भेजना चाहते हैं — क्योंकि वे जानते हैं कि नौकरी के बाज़ार में अंग्रेज़ी का सिक्का चलता है। अभिभावकों की इस व्यावहारिक चिंता को नीति-निर्माताओं ने अभी तक ठीक से संबोधित नहीं किया।

इनसाइड टॉक

शिक्षा जगत के हलकों में एक बात बार-बार सुनाई देती है: "NEP एक शानदार दस्तावेज़ है — पर यह बना उस देश के लिए है जो भारत बनना चाहता है, न कि उस देश के लिए जो भारत अभी है।" ट्रेड विश्लेषक और शिक्षा नीति विशेषज्ञ निजी बातचीत में मानते हैं कि केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल की कमी इसकी सबसे बड़ी अड़चन है। शिक्षा समवर्ती सूची में है — केंद्र नीति बना सकता है, लागू करना राज्यों के हाथ में है। कई राज्यों में, ख़ासकर विपक्ष-शासित राज्यों में, NEP को "केंद्र की थोपी हुई नीति" के तौर पर देखा जाता है। इंडस्ट्री की बात यह भी है कि निजी स्कूल चेन NEP के "लचीलेपन" का इस्तेमाल फीस बढ़ाने के बहाने के तौर पर कर रही हैं — "NEP-अलाइन्ड करिकुलम" का टैग लगाकर प्रीमियम वसूला जा रहा है, जबकि क्लासरूम में बदलाव न के बराबर है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

वह आँकड़ा जो सब कुछ बयान करता है

UDISE+ (Unified District Information System for Education) के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 10 लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं — सिर्फ़ सरकारी स्कूलों में। जब शिक्षक ही नहीं हैं, तो NEP की बात करना ऐसा है जैसे बिना ड्राइवर के गाड़ी में GPS लगा दिया जाए। ASER 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के लगभग आधे बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते। यह लर्निंग क्राइसिस NEP से पहले भी थी और पाँच साल बाद भी उतनी ही गंभीर है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिसी रीड यह है कि NEP 2020 की असली परीक्षा अगले तीन-चार साल में होगी — जब 2030 की डेडलाइन नज़दीक आएगी और कई बड़े वादों का हिसाब माँगा जाएगा। अगर GDP का 6% शिक्षा बजट का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, अगर शिक्षकों की भर्ती और ट्रेनिंग में क्रांतिकारी तेज़ी नहीं आई, तो NEP एक और "अच्छी नीयत, अधूरा अमल" की कहानी बनकर रह जाएगी। देखने वाली बात यह होगी कि 2025-26 के केंद्रीय बजट में शिक्षा का हिस्सा बढ़ता है या नहीं — वही असली लिटमस टेस्ट होगा।

आगे क्या देखें — भविष्य की दिशा

कुछ संकेत उम्मीद जगाते हैं। डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर — DIKSHA प्लेटफॉर्म, PM eVIDYA — ने महामारी के बाद स्कूली शिक्षा में टेक्नोलॉजी की पहुँच बढ़ाई है। राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क (NCrF) अगर ठीक से लागू हो तो स्किल एजुकेशन और फॉर्मल एजुकेशन के बीच की दीवार गिर सकती है — जो लाखों युवाओं के लिए गेम-चेंजर होगा।

मगर सबसे ज़रूरी बात वह है जो कोई सरकारी प्रेस रिलीज़ नहीं कहेगी: NEP की सफलता या विफलता का फ़ैसला दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में नहीं, उस सरकारी स्कूल के क्लासरूम में होगा जहाँ एक अकेला शिक्षक तीन कक्षाओं को एक साथ पढ़ा रहा है। जब तक वह शिक्षक सशक्त नहीं होता — प्रशिक्षित, सम्मानित और संसाधनों से लैस — तब तक NEP एक सुंदर ब्लूप्रिंट रहेगी, इमारत नहीं।

और पाठक, यह सवाल सिर्फ़ नीति-निर्माताओं का नहीं है — यह आपका भी है। क्या आपके बच्चे के स्कूल में कुछ बदला? क्या क्लासरूम में वाक़ई "खेल-खेल में सीखो" हो रहा है, या सिर्फ़ दीवार पर लिखा है? यही असली रिपोर्ट कार्ड है — और यह हर माता-पिता के हाथ में है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

आँकड़ों में

  • भारत शिक्षा पर GDP का लगभग 2.9-3.1% ख़र्च करता है — NEP का लक्ष्य 6% है (Economic Survey)
  • UDISE+ के अनुसार सरकारी स्कूलों में 10 लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं
  • ASER 2024: ग्रामीण भारत में कक्षा 5 के लगभग आधे बच्चे कक्षा 2 स्तर का पाठ नहीं पढ़ पाते
  • 25 से अधिक राज्यों ने NEP को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया (शिक्षा मंत्रालय)

मुख्य बातें

  • NEP 2020 के पाँच साल में NCF 2023, ABC, मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट जैसे संरचनात्मक बदलाव हुए, मगर ज़मीनी अमल अधूरा है
  • शिक्षा पर GDP का 6% ख़र्च का लक्ष्य अभी दूर — वास्तविक ख़र्च लगभग 3% के आसपास बना हुआ है (Economic Survey/बजट दस्तावेज़)
  • UDISE+ के मुताबिक़ 10 लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त; ASER 2024 बताती है कि लर्निंग क्राइसिस जस की तस है
  • असली लिटमस टेस्ट 2025-26 का केंद्रीय बजट और 2030 की डेडलाइन होगी — तब तक शिक्षक प्रशिक्षण और फंडिंग में तेज़ी न आई तो NEP अधूरी रहेगी

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

NEP 2020 के पाँच साल में सबसे बड़ा बदलाव क्या हुआ?

सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव नई पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (NCF 2023), एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (ABC), और मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट सिस्टम का आना रहा। हालाँकि ज़मीनी स्तर पर क्लासरूम शिक्षण में बड़ा बदलाव अभी दिखना बाकी है।

NEP 2020 क्यों पूरी तरह लागू नहीं हो पाई?

तीन मुख्य कारण: शिक्षा बजट GDP के 6% लक्ष्य से आधा है, 10 लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं, और शिक्षा समवर्ती सूची में होने से केंद्र-राज्य तालमेल में कठिनाई है। कई राज्यों ने अभी तक इसे पूरी तरह अपनाया नहीं है।

NEP 2020 में मातृभाषा में शिक्षा का क्या प्रावधान है?

NEP कहती है कि कम-से-कम पाँचवीं कक्षा तक, और जहाँ संभव हो आठवीं तक, मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई हो। मगर बहुभाषी भारत में इसे लागू करना जटिल है — अभिभावक रोज़गार के लिए अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिकता देते हैं।

Find Out More:

Related Articles: