कुरेमल कुल्फी: चावड़ी बाजार की गली से विंबलडन तक — क्या पुरानी दिल्ली का ये फ़ॉर्मूला भारत का अगला ग्लोबल FMCG ब्रांड बना सकता है?

Raj Harsh

कुरेमल कुल्फी, चावड़ी बाजार की 118 साल पुरानी पारिवारिक दुकान, ने 2026 में विंबलडन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी एंट्री ली है। द प्रिंट के अनुसार, परिवार की छठी पीढ़ी ने बिना वेंचर कैपिटल लिए, सिर्फ़ क्वालिटी कंट्रोल और कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स के बूते यह छलांग लगाई।

एक गली इतनी तंग कि दो रिक्शे साथ नहीं गुज़र सकते — उसी गली से निकलकर एक कुल्फी अब उस लॉन पर बिक रही है जहाँ टेनिस की सफ़ेद पोशाक के बिना एंट्री नहीं मिलती। कुरेमल कुल्फी, चावड़ी बाजार, पुरानी दिल्ली — 1906 से चली आ रही यह दुकान 2026 में विंबलडन के ग्लोबल स्टेज पर खड़ी है। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, परिवार की छठी पीढ़ी ने बिना किसी वेंचर कैपिटल फंडिंग या फ्रेंचाइज़ी मॉडल के यह छलांग लगाई है — और यही बात इस कहानी को किसी स्टार्टअप सक्सेस स्टोरी से बुनियादी तौर पर अलग बनाती है।

सवाल यह नहीं है कि कुरेमल कुल्फी अच्छी है या नहीं — दिल्ली का कोई भी खाने का शौकीन यह दशकों से जानता है। असली सवाल यह है: एक ऐसा प्रोडक्ट जो ताज़े आम, फ़ालसे और लीची को भरकर बनाया जाता है, जिसकी शेल्फ़ लाइफ़ घंटों में गिनी जाती है, उसे लंदन के विंबलडन तक कैसे पहुँचाया गया — और वह भी उसी 'असली स्वाद' के साथ?

कोल्ड चेन का वह पुल जो गली को ग्लोब से जोड़ता है

द प्रिंट के अनुसार, कुरेमल के मौजूदा मालिकों ने पिछले कुछ सालों में अपनी सप्लाई चेन को मूलभूत रूप से बदला है। पारंपरिक कुल्फी, जो मटके में जमाई जाती थी, उसकी रेसिपी नहीं बदली — लेकिन उसे स्टोर और ट्रांसपोर्ट करने का तरीक़ा ज़रूर बदला। कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स में निवेश किया गया ताकि माइनस 18 डिग्री सेल्सियस पर प्रोडक्ट इंटरनेशनल शिपिंग झेल सके। यह सुनने में आसान लगता है, लेकिन भारत के ट्रेडिशनल फ़ूड बिज़नेस के लिए यह सबसे बड़ी बाधा रही है — अधिकांश मिठाई और कुल्फी ब्रांड इसी मोड़ पर रुक जाते हैं।

इसे समझिए: भारत का कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के औसत से पीछे है। NCCD (नेशनल सेंटर फ़ॉर कोल्ड चेन डेवलपमेंट) के आँकड़ों के मुताबिक़, भारत में फ़ूड प्रोसेसिंग के लिए ज़रूरी कोल्ड स्टोरेज का सिर्फ़ लगभग 60-70% उपलब्ध है। ऐसे माहौल में एक छोटी पारिवारिक दुकान ने अपना ख़ुद का सिस्टम खड़ा किया — यह उद्यमिता की वह किस्म है जो MBA केस स्टडी में पढ़ाई जाती है, लेकिन असल में चावड़ी बाजार की गली नंबर 6 में ज़िंदा है।

फ्रेंचाइज़ी नहीं, सीधी सप्लाई — और यही इसका 'मोट' है

भारतीय फ़ूड ब्रांड्स ने ग्लोबल होने के लिए आम तौर पर दो रास्ते चुने हैं: या तो फ्रेंचाइज़ी मॉडल (जैसे हल्दीराम्स, बीकानेरवाला) या फिर FMCG पैकेजिंग (जैसे पतंजलि, MTR)। कुरेमल ने दोनों से अलग रास्ता चुना है। द प्रिंट की रिपोर्ट बताती है कि परिवार ने विंबलडन जैसे प्रीमियम इवेंट्स में सीधे सप्लाई का मॉडल अपनाया है — बिचौलिए नहीं, फ्रेंचाइज़ी नहीं, सीधे अपने प्रोडक्ट, अपनी क्वालिटी।

यह मॉडल स्केलेबिलिटी की कीमत पर ब्रांड ऑथेंटिसिटी को बचाता है — और यही इसकी ताक़त भी है, कमज़ोरी भी। जब आप हर बैच पर ख़ुद नज़र रखते हैं, तो 'कुरेमल' का मतलब हमेशा वही रहता है — पर आप हज़ार शहरों में एक साथ नहीं पहुँच सकते। एक तरह से यह लग्ज़री फ़ूड ब्रांड्स का क्लासिक 'स्कार्सिटी प्रीमियम' है: कम मिलता है इसलिए ज़्यादा चाहिए।

इनसाइड टॉक

दिल्ली के फ़ूड इंडस्ट्री सर्कल्स में चर्चा है कि कुरेमल की विंबलडन एंट्री कोई अचानक हुई बात नहीं थी — परिवार ने पिछले तीन-चार सालों से UK और मिडिल ईस्ट के प्रीमियम इवेंट ऑर्गनाइज़र्स के साथ बातचीत चलाई थी। ट्रेड हलकों में यह भी फुसफुसाहट है कि कम-से-कम दो बड़े FMCG ग्रुप्स ने कुरेमल के साथ एक्विज़िशन या JV की बात चलाई, लेकिन परिवार ने 'ब्रांड कंट्रोल' छोड़ने से साफ़ इनकार कर दिया। एक फ़ूड कंसल्टेंट ने कहा, "उनकी ताक़त यही है कि वो बिकने को तैयार नहीं हैं — और इसी वजह से दुनिया उनके पास आ रही है।" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

'पुरानी दिल्ली से ग्लोबल' — सिर्फ़ बिज़नेस नहीं, एक भावनात्मक करेंसी

इस कहानी का एक आयाम ऐसा है जो बैलेंस शीट में नहीं दिखता। 'पुरानी दिल्ली' — यह सिर्फ़ एक पिनकोड नहीं, एक पूरी भावनात्मक दुनिया है। जब एक ऐसी जगह से निकला ब्रांड विंबलडन पहुँचता है, तो करोड़ों भारतीयों के मन में वही भाव उमड़ता है जो ओलंपिक में तिरंगा देखकर आता है — 'हम भी कम नहीं हैं'। यह गर्व एक अमूर्त एसेट है जिसकी क़ीमत कोई वैल्यूएशन मॉडल नहीं लगा सकता, लेकिन यही वह ईंधन है जो ब्रांड को सोशल मीडिया पर वायरल बनाता है, बिना एक रुपया ऐड ख़र्च किए।

इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि कुरेमल की असली ग्लोबल स्ट्रैटेजी आगे इवेंट-बेस्ड सप्लाई से आगे बढ़कर प्रीमियम रिटेल में जा सकती है — लेकिन तभी जब वे कोल्ड चेन को और मज़बूत करें और शेल्फ़ लाइफ़ का मसला हल करें बिना केमिकल प्रिज़र्वेटिव्स के। अगर वे यह कर पाए, तो भारत के पास आम पापड़ और मसालों के बाद एक और 'कल्चरल एक्सपोर्ट' होगा — और इस बार वह फ्रोज़न डेज़र्ट कैटेगरी में होगा, जो अभी ग्लोबल लेवल पर लगभग ख़ाली पड़ी है।

ग्लोबल फ्रोज़न डेज़र्ट मार्केट का अनुमानित आकार 2025 तक 100 बिलियन डॉलर से ऊपर माना गया है (विभिन्न इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार)। इसमें आर्टिज़नल और 'क्लीन लेबल' — यानी बिना आर्टिफ़िशियल रंग और फ्लेवर वाले प्रोडक्ट्स — का सेगमेंट सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है। कुरेमल की कुल्फी — ताज़े फल, असली दूध, कोई केमिकल नहीं — इस ट्रेंड के ठीक बीचोबीच बैठती है।

आगे क्या देखें — और कहाँ अटक सकती है कहानी

कुरेमल के सामने सबसे बड़ी चुनौती वही है जो हर आर्टिज़नल फ़ूड ब्रांड के सामने होती है: स्केल करो तो 'सोल' मत खोओ। जैसे ही प्रोडक्शन बढ़ेगा, ताज़े मौसमी फलों की सोर्सिंग — जो अभी शायद सीज़नल मंडियों से होती है — एक लॉजिस्टिक नाइटमेयर बन सकती है। दूसरी बात, अंतरराष्ट्रीय फ़ूड सेफ़्टी रेगुलेशन्स (EU, UK के FSSAI जैसे मानक) का अनुपालन छोटे परिवारिक बिज़नेस के लिए महँगा और जटिल है।

लेकिन अगर कुरेमल ने विंबलडन का दरवाज़ा खोल लिया है, तो US Open, Roland Garros और दुबई एक्सपो जैसे प्लेटफ़ॉर्म अगला पड़ाव हो सकते हैं। आने वाले महीनों में देखने लायक बात यह होगी कि क्या परिवार अपना 'डायरेक्ट सप्लाई' मॉडल बनाए रखता है या किसी ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूटर के साथ हाथ मिलाता है। यही वह मोड़ है जहाँ 'पुरानी दिल्ली की आत्मा' और 'ग्लोबल बिज़नेस की ज़रूरत' के बीच असली टकराव होगा।

और शायद यही वह सवाल है जो इस कहानी को सबसे दिलचस्प बनाता है: क्या भारत के पारंपरिक, पारिवारिक, गली-मोहल्ले के बिज़नेस — जो अक्सर 'छोटे' माने जाते हैं — असल में उस ऑथेंटिसिटी के मालिक हैं जिसे ख़रीदने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अरबों ख़र्च करती हैं? कुरेमल का जवाब, फ़िलहाल, 'हाँ' है — और वह जवाब चावड़ी बाजार से विंबलडन तक गूँज रहा है।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

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मुख्य बातें

  • कुरेमल कुल्फी ने बिना VC फंडिंग या फ्रेंचाइज़ी मॉडल के, सिर्फ़ कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स के बूते विंबलडन जैसे ग्लोबल मंच तक पहुँच बनाई (द प्रिंट)।
  • भारत में कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी ज़रूरत से काफ़ी कम है — ऐसे में एक छोटी दुकान का अपना सिस्टम बनाना अपने आप में उद्यमिता का सबक है।
  • ग्लोबल फ्रोज़न डेज़र्ट मार्केट 100 बिलियन डॉलर से ऊपर है और 'क्लीन लेबल' सेगमेंट सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है — कुरेमल का प्रोडक्ट इसी ट्रेंड में फ़िट बैठता है।
  • 'पुरानी दिल्ली से ग्लोबल' का भावनात्मक पहलू एक अमूर्त ब्रांड एसेट है जो बिना विज्ञापन ख़र्च के वायरलिटी देता है।
  • आगे सबसे बड़ी चुनौती: स्केलिंग करते हुए ऑथेंटिसिटी और गुणवत्ता बनाए रखना।

आँकड़ों में

  • ग्लोबल फ्रोज़न डेज़र्ट मार्केट का अनुमानित आकार 2025 तक 100 बिलियन डॉलर से ऊपर (विभिन्न इंडस्ट्री रिपोर्ट्स)।
  • कुरेमल कुल्फी 1906 से चल रही है — यानी 118+ साल का इतिहास, अब छठी पीढ़ी संभाल रही है (द प्रिंट)।
  • भारत में कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर ज़रूरत का अनुमानित 60-70% ही उपलब्ध (NCCD डेटा)।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: कुरेमल महालालदास कुल्फीवाले — चावड़ी बाजार, पुरानी दिल्ली में 1906 से चल रही छठी पीढ़ी की पारिवारिक कुल्फी दुकान (द प्रिंट)।
  • क्या: इस पारंपरिक कुल्फी ब्रांड ने विंबलडन समेत अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में अपने प्रोडक्ट्स की आपूर्ति शुरू की (द प्रिंट)।
  • कब: 2026 में, विंबलडन सीज़न के दौरान ब्रांड की अंतरराष्ट्रीय डेब्यू की ख़बर सामने आई (द प्रिंट)।
  • कहाँ: मूल दुकान दिल्ली के चावड़ी बाजार में; अंतरराष्ट्रीय एंट्री लंदन के विंबलडन में (द प्रिंट)।
  • क्यों: मौसमी फलों से बनी ताज़ा, केमिकल-फ्री कुल्फी की ग्लोबल डिमांड और प्रीमियम आर्टिज़नल फ़ूड ट्रेंड ने यह रास्ता खोला (द प्रिंट)।
  • कैसे: परिवार ने कोल्ड चेन सप्लाई सिस्टम विकसित किया, प्रोडक्ट की शेल्फ़ लाइफ़ बढ़ाई और बिना फ्रेंचाइज़ी मॉडल अपनाए सीधे इंटरनेशनल इवेंट्स में सप्लाई शुरू की (द प्रिंट)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कुरेमल कुल्फी कब और कहाँ शुरू हुई?

कुरेमल कुल्फी 1906 में दिल्ली के चावड़ी बाजार में शुरू हुई थी। अब इसे परिवार की छठी पीढ़ी चला रही है (द प्रिंट)।

कुरेमल कुल्फी विंबलडन तक कैसे पहुँची?

द प्रिंट के अनुसार, परिवार ने कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स में निवेश कर प्रोडक्ट की शेल्फ़ लाइफ़ बढ़ाई और बिना फ्रेंचाइज़ी मॉडल के सीधे अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में सप्लाई शुरू की।

क्या कुरेमल कुल्फी में प्रिज़र्वेटिव्स या केमिकल्स मिलाए जाते हैं?

ब्रांड का दावा है कि उनकी कुल्फी ताज़े मौसमी फलों और असली दूध से बनती है, बिना आर्टिफ़िशियल रंग या केमिकल प्रिज़र्वेटिव्स के (द प्रिंट)।

क्या कुरेमल ने कोई बाहरी फंडिंग ली है?

उपलब्ध रिपोर्ट्स के अनुसार, कुरेमल ने अब तक कोई वेंचर कैपिटल या बाहरी फंडिंग नहीं ली है — यह पूरी तरह पारिवारिक स्वामित्व वाला बिज़नेस है (द प्रिंट)।

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